शैक्षणिक नेतृत्व को सेल्फ-क्रेडिट और ब्लेम-शिफ्टिंग के ‘आई-सिंड्रोम’ को खत्म करना होगा: प्रो. एम.एम. गोयल
समग्र समाचार सेवा
प्रयागराज, 10 मार्च। “शैक्षणिक नेतृत्व को सफलता पर श्रेय लेने और विफलता पर दूसरों को दोष देने के ‘आई-सिंड्रोम’ को हटाना होगा ” I ये शब्द पूर्व कुलपति डॉ. मदन मोहन गोयल ,नीडोनोमिक्स स्कूल ऑफ थॉट के प्रवर्तक एवं कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर ने कहे । वह यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (एमएमटीटीसी ईश्वर सरन पीजी कॉलेज, प्रयागराज (इलाहाबाद विश्वविद्यालय का एक घटक कॉलेज) द्वारा आयोजित एनईपी ओरिएंटेशन एंड सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम (ऑनलाइन मोड) के प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे। उनका विषय “संस्थागत प्रबंधन में नीडो-गवर्नेंस हेतु शैक्षणिक नेतृत्व” था । प्रो. आनंद शंकर सिंह निदेशक एमएमटीटीसी ने स्वागत भाषण दिया I कार्यक्रम संयोजक डॉ. विवेका नंद त्रिपाठी ने प्रो एम.एम. गोयल की उपलब्धियों पर एक प्रशस्ति पत्र प्रस्तुत किया। कार्यक्रम सह संयोजक डॉ. अंजना श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
प्रो. गोयल का माननाहै कि शैक्षणिक नेतृत्व को रसोई में काम करने वाली महिला से प्रेशर कुकर के माहौल में काम करना सीखना चाहिए।
नीडोनोमिस्ट गोयल ने बताया कि शैक्षणिक नेतृत्व की प्रभावशीलता और दक्षता को बढ़ाने हेतु हमें गीता-आधारित नीडोनोमिक्स को समझना और अपनाना होगा।
उनका का मानना है कि संस्थागत प्रबंधन में नीडो-गवर्नेंस के लिए शैक्षणिक नेतृत्व में आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता (एसआई) की आवश्यकता होती है ।
प्रो. गोयल ने कहा कि नीडो-हैप्पीनेस के साथ विकसित भारत में आदर्श पुरुष (मर्यादा पुरूषोत्तम राम) को उत्तरदायित्व, जवाबदेही और नैतिकता (आरएएम) के साथ समझना होगा।
प्रो. गोयल ने समझाया कि शिक्षकों के सहयोग और समर्थन के साथ शैक्षणिक नेतृत्व की एक नई कहानी लिखने के लिए हमें स्ट्रीट स्मार्ट (सरल, नैतिक, कार्य-उन्मुख, उत्तरदायी और पारदर्शी) बनने के लिए साहसी, साहसी और उत्साही होना चाहिए ।