जब आतंक अपने घर लौटा: पाक मौलानाओं ने TTP कमांडर की जनाज़ा-नमाज़ पढ़ने से किया इनकार

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,5 मई ।
जब भारत में खून बहता है, तब पाकिस्तान के मौलाना आतंकियों को “शहीद” बताकर उनकी मौत पर आंसू बहाते हैं। लेकिन जब वही बंदूकें उनके अपने लोगों पर चलती हैं, तो ज़मीर जाग जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ है पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में, जहां एक मारे गए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) कमांडर की मौत पर उसके अपने धर्मगुरुओं ने उसे अंतिम दुआ तक नसीब नहीं होने दी।

उत्तरी वज़ीरिस्तान में पाकिस्तान की सेना के साथ मुठभेड़ में मारे गए TTP कमांडर मिन्हाज की लाश से ज़्यादा, उसका अंतिम विदाई दृश्य सुर्खियों में रहा — क्योंकि स्थानीय मौलानाओं ने उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ने से साफ इनकार कर दिया।

“जिसने मासूमों का कत्ल किया, जो अपनी मिट्टी के खिलाफ लड़ा — हम उस पर रहमत नहीं मांग सकते,”
– एक स्थानीय मौलवी ने मीडिया से बात करते हुए कहा।

जिस आतंकवादी को एक ज़माने में “मजहबी मुजाहिद” कहकर सिर आंखों पर बिठाया जाता था, उसे आज मिट्टी में दफनाया गया — बिना भीड़, बिना नारे और बिना दुआ के। अंतिम यात्रा भी खामोश और शर्मनाक रही।

भारत दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार रहा है। पुलवामा, उरी, मुंबई — इन हमलों के ज़ख्म आज भी ताज़ा हैं। इन हमलों के बाद पाकिस्तान में आतंकी कमांडरों की शान में महफिलें सजाई जाती थीं। मौलाना उनकी शहादत पर फातेहा पढ़ते थे, और सोशल मीडिया उन्हें हीरो बनाकर पेश करता था।

लेकिन अब जब TTP की गोलियां पाकिस्तानियों के सीने छलनी करने लगीं, तब वही मौलाना खामोश हो गए। जिनके लिए ‘जिहाद’ कभी गर्व का विषय था, आज वह ‘गुनाह’ जैसा लगने लगा है।

मिन्हाज के जनाज़े में मुश्किल से 10-20 लोग पहुंचे। न कोई धार्मिक नेता, न कोई हमदर्द, न कोई उलेमा। जो कभी बंदूकें लहराकर वीडियो बनवाता था, वो अब खामोशी में दफन कर दिया गया — अपने ही घर में बेगाना बनकर।

स्थानीय कबायली नेताओं ने भी माना कि वज़ीरिस्तान में पहली बार किसी आतंकी के जनाज़े का ऐसा सामाजिक बहिष्कार देखा गया है।

पाकिस्तान ने वर्षों तक आतंक के साथ खेला — उन्हें शरण दी, प्रशिक्षण दिया, भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया और फिर आंखें मूंद लीं। अब वही आतंक उसके घर लौट आया है, और ताबूतों की गिनती बढ़ती जा रही है।

यह घटना सिर्फ एक आतंकी की अस्वीकृति नहीं है — यह पाकिस्तान के उस दोहरे चरित्र का आईना है, जो अब खुद के ही सवालों से जूझ रहा है:
“क्या यह सब वाकई worth it था?”

वज़ीरिस्तान में जो हुआ, वह पाकिस्तान की ‘आत्मा’ का एक बिखरता हुआ चित्र है — जहां एक तरफ धार्मिक उन्माद है, तो दूसरी तरफ अपने ही पाले हुए आतंक से डर। मिन्हाज की गुमनाम मौत इस सच्चाई की गवाही देती है कि जो ज़हर दूसरों के लिए पालोगे, वो एक दिन तुम्हें ही निगल जाएगा।

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