समग्र समाचार सेवा ब्रसेल्स/बर्लिन/लंदन, 2 जून :यूरोपीय संघ की एकीकृत सेना (European Army) बनाने की योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। भले ही यह विचार दशकों से यूरोप की सुरक्षा रणनीति में चर्चा का विषय रहा हो, लेकिन आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में इसकी व्यावहारिकता पर गंभीर संदेह जताए जा रहे हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि आखिर इतनी विशाल सेना के लिए “मैनपावर” कहां से आएगा? यूरोप की जनसंख्या अमेरिका से कहीं अधिक है, लेकिन इसके बावजूद लगभग हर प्रमुख देश — ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और पूर्वी यूरोपीय राष्ट्र — सैन्य भर्ती संकट से जूझ रहे हैं। मौजूदा सेनाओं में प्रशिक्षित कर्मियों की भारी कमी है और जो हैं, वे भी लंबे समय तक सेवा में नहीं टिक पा रहे हैं।
सेना कागज़ों पर, मैदान में नहीं
कई सैन्य यूनिट्स केवल कागजों पर मौजूद हैं, जबकि जमीन पर वे सक्रिय नहीं हैं। चेक सेना प्रमुख जनरल कारेल रेहका ने कहा, “अगर हमारे पास पर्याप्त और प्रेरित लोग नहीं हैं, तो आधुनिक उपकरणों पर खर्च किया गया धन भी व्यर्थ है।”
तकनीकी और भाषा बाधाएँ भी सामने
भले ही यूरोप किसी प्रकार से संयुक्त सेना का ढांचा तैयार कर ले, लेकिन वहां भी बड़ी बाधाएं हैं। विभिन्न देशों की भाषाएं, सैन्य परंपराएं और उपकरणों का मानकीकरण (standardization) किसी भी संयुक्त अभियान के संचालन को जटिल बना देता है।
जनता का समर्थन भी नहीं
सर्वे बताते हैं कि यूरोपीय नागरिकों का बड़ा हिस्सा किसी साझा सेना में विश्वास नहीं रखता। ऐसे में, न केवल राजनीतिक सहमति बल्कि सामाजिक समर्थन भी इस योजना के लिए कमजोर होता जा रहा है। बजट की तंगी, सैनिकों की कमी और एकता के अभाव में, यूरोपीय सेना का विचार आज भी एक “आदर्श कल्पना” बनकर ही रह गया है।