चीन, तिब्बत और एस. जयशंकर: जब कूटनीति में अधिक मायने रखती है चुप्पी

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  • भारत-चीन संबंधों में विरोधाभास: एक ओर व्यापार और अंतरराष्ट्रीय मंचों (SCO, BRICS) पर सहयोग है, वहीं दूसरी ओर तिब्बत, अरुणाचल और सीमा विवादों पर गहरा अविश्वास कायम है।
  • तिब्बत भारत के लिए एक रणनीतिक कार्ड: भारत ने तिब्बती निर्वासित सरकार को शरण दी है लेकिन औपचारिक मान्यता नहीं दी, ताकि जरूरत पड़ने पर तिब्बत को चीन के खिलाफ दबाव के उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जा सके।
  • एस. जयशंकर की संतुलित कूटनीति: जयशंकर बिना सीधा टकराव लिए चीन को संदेश देते हैं — उनकी चुप्पी, भंगिमा और सीमित बयानबाज़ी खुद में कूटनीतिक संकेत होती है।
  • चीन की दोहरी रणनीति: चीन एक तरफ भारत से दोस्ती का दिखावा करता है, दूसरी तरफ पाकिस्तान के ज़रिए भारत को घेरने की कोशिश करता है, लेकिन भारत को नज़रअंदाज़ करने की हैसियत में नहीं है।

पूनम शर्मा
चीन और तिब्बत को लेकर भारत की स्थिति हमेशा एक संतुलन साधने जैसी रही है — और इस संतुलन की रस्सी पर इस समय भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर चल रहे हैं। जब दुनिया दलाई लामा के 90वें जन्मदिवस की ओर देख रही थी, तब तिब्बतियों के निर्वासित संगठन ने बड़ा संकेत दे दिया कि भविष्य में उनके उत्तराधिकारी का निर्णय उनका खुद का संगठन करेगा। इस पर भारत में बैठे कुछ लोगों ने समर्थन भी कर दिया, लेकिन इसने चीन को असहज कर दिया।

चीनी नेतृत्व की प्रतिक्रिया में दो विरोधाभासी स्वर उभरे। एक ओर वे कहते हैं कि तिब्बत उनका “आंतरिक मामला” है और कोई बाहरी देश हस्तक्षेप न करे — इशारा सीधा भारत की ओर था। दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्री की यात्रा से पहले चीन की तरफ से गर्मजोशी के कुछ संकेत भी देखने को मिले, जैसे एस. जयशंकर को रिसीव करने खुद वाइस प्रेसिडेंट आना।

यह वही चीन है जिसने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ‘कूटनीतिक चटाई’ तक नहीं दी थी, लेकिन भारत के विदेश मंत्री को वाइस प्रेसिडेंट रिसीव करते हैं। यह भारत और चीन के रिश्तों में दिखने वाली सार्वजनिक गर्मजोशी है, लेकिन असल कूटनीति इससे कहीं गहरी और जटिल है।

भारत और चीन के बीच व्यापारिक सहयोग है, लेकिन रणनीतिक अविश्वास भी बराबर कायम है। भारत SCO का हिस्सा है, BRICS का भी, लेकिन तिब्बत, अरुणाचल, लद्दाख और नेपाल सीमा पर भारत की सतर्कता कभी कम नहीं होती। दूसरी ओर चीन की सोच अब भी ‘ग्रेटर चाइना एम्पायर’ की है — जिसमें वह तिब्बत, ताइवान और दक्षिण चीन सागर को अपनी “ऐतिहासिक विरासत” मानता है।

भारत के लिए तिब्बत एक संवेदनशील मुद्दा है। धर्मशाला में दलाई लामा की निर्वासित सरकार को भारत शरण देता है, लेकिन आधिकारिक मान्यता की सीमा में चीन की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सतर्कता बरतता है। यह वही कूटनीति है जिसमें चीन पाकिस्तान के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करता है और भारत तिब्बत कार्ड को मेज़ पर रखे हुए है — न पूरी तरह खेलता है, न पूरी तरह छोड़ता है।

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चीन की यह दोहरी रणनीति

एक ओर सहयोग की मुद्रा, दूसरी ओर दबाव की राजनीति – भारत को मजबूर करती है कि वह हर कूटनीतिक बातचीत में अपने सारे कार्ड मेज़ पर नहीं डाले। तिब्बत हो, अरुणाचल हो या गलवान, भारत जानता है कि हर बयान का असर सीमा पर होता है।

डॉ. एस. जयशंकर की कूटनीतिक शैली भी इसी समझ पर आधारित है। वे सीधे नहीं बोलते, लेकिन संकेत स्पष्ट होते हैं। चीन यह भलीभांति समझता है कि भारत केवल व्यापारिक शक्ति नहीं, एक वैश्विक सॉफ्ट पावर भी है — तकनीक से लेकर सॉफ्टवेयर तक, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति मजबूत हुई है। यही कारण है कि चीन भले ही पाकिस्तान को “बेटर फ्रेंड” दिखाए, लेकिन भारत को “इग्नोर” नहीं कर सकता।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती — स्थायी होते हैं राष्ट्रीय हित। चीन भारत को कभी पूरी तरह अपने खेमे में नहीं खींच सकता और भारत चीन पर कभी पूरी तरह विश्वास नहीं कर सकता। ऐसे में जयशंकर जैसे कूटनीतिज्ञ का संयम और परिपक्वता भारत की सबसे बड़ी ताकत बनती है।

अंततः सवाल यह है — क्या तिब्बत भारत के लिए सिर्फ एक “कार्ड” है, या एक नैतिक जिम्मेदारी भी? और क्या चीन के साथ संबंधों में भारत को कठोर रुख अपनाना चाहिए या रणनीतिक धैर्य बनाए रखना चाहिए? इसका उत्तर शायद जयशंकर की उसी यात्रा में छिपा है, जहाँ बात कम होगी, लेकिन हर मुस्कान और चुप्पी अपने आप में संदेश दे रही होगी।

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