अवैध घुसपैठ पर सहानुभूति से असम संकट में

असम में अल्पसंख्यकों को मिला सबसे अधिक लाभ, लेकिन अवैध घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति बढ़ा रही जनसंख्या संकट

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पूनम शर्मा
असम के ऊपरी जिलों—विशेष रूप से शिवसागर, जोरहाट और गोलाघाट—में हाल ही में घटित घटनाओं ने एक बार फिर राज्य की जनसांख्यिकी और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी बहस को तेज कर दिया है। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के नेताओं ने पुलिस महानिरीक्षक (IGP) अखिलेश सिंह से मिलकर शिकायत दर्ज कराई कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को कुछ संगठनों और कथित सतर्कता समूहों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन इन आरोपों की तह में जाएँ  तो तस्वीर कुछ और ही उभरकर आती है।

अल्पसंख्यकों को असम में मिले हैं अधिकतम संवैधानिक लाभ

सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि असम में रहने वाले अल्पसंख्यकों को देश के अन्य किसी राज्य की तुलना में कहीं अधिक संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक लाभ मिले हैं। चाहे वह सरकारी योजनाओं में आरक्षण हो, अल्पसंख्यक कल्याण योजनाएँ  हों, धार्मिक संस्थानों को अनुदान हो, या फिर सामाजिक सुरक्षा—असम सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के लिए निरंतर प्रयास किए हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में यह देखा जा रहा है कि इस सहूलियत का लाभ उठाने के लिए अवैध घुसपैठिए भी बड़ी संख्या में राज्य में प्रवेश कर चुके हैं, जो असम की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट बनते जा रहे हैं।

अवैध घुसपैठ और ‘धार्मिक सहानुभूति’ का खतरनाक गठजोड़

AIUDF जैसे दल जब अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात करते हैं, तो उनका संकेत साफतौर पर मियां समुदाय या अवैध बांग्लादेशी मूल के प्रवासियों की ओर होता है, जिन्हें ‘मजदूर’ या ‘स्थायी निवासी’ बताकर स्थानीयता का भ्रम फैलाया जा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि असम में 1951 और 1971 के वोटर लिस्ट में जिनके नाम नहीं हैं, उन्हें अवैध प्रवासी माना जाता है, और उनके खिलाफ कार्रवाई करना राज्य सरकार और केंद्र सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

दुर्भाग्यवश, धर्म के आधार पर कुछ स्थानीय संगठन और नेता इन अवैध प्रवासियों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, जिससे यह मामला सांप्रदायिक रंग ले लेता है। यह रुझान न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि असम की मूल संस्कृति और संसाधनों पर सीधा हमला भी है।

जनसंख्या असंतुलन और भूमि पर कब्जा

एक और गंभीर चिंता का विषय है कि इन अवैध प्रवासियों की वजह से असम के कई जिलों में जनसंख्या का अनुपात तेजी से बदल रहा है। कई गाँवों  में अब मूल असमिया जनजातियों और हिंदू परिवारों की संख्या अल्पसंख्यक हो चुकी है। इन प्रवासियों द्वारा सरकारी और वन भूमि पर कब्जा, नदी किनारे बसावट और अवैध मस्जिदों का निर्माण, राज्य में तनाव का कारण बन रहे हैं।

स्थानीय निवासी पराश दास ने एकदम सटीक कहा, “सरकार चार साल तक सोती रही, और अब जब चुनाव नजदीक हैं तो हिंदू-मुस्लिम का खेल फिर शुरू हो गया है। कोई भी मूल असमी, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, अपनी ज़मीन नहीं खोना चाहता।”

समाधान क्या है?

राज्य में शांति और सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रशासन अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजे। इसके लिए 1951 और 1971 की वोटर लिस्ट को आधार बनाकर कानूनी प्रक्रिया तेज करनी होगी।

इसके साथ ही, असम के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) प्रणाली को लागू करने की माँग अब ज़ोर पकड़ रही है। बीर  लाचित सेना और कई अन्य संगठनों ने ILP की माँग  को दोहराया है, ताकि राज्य की जनसांख्यिकी संरक्षित रह सके और बाहरी लोगों के अतिक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

असम को चाहिए छठी अनुसूची जैसी विशेष सुरक्षा

कई बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता अब यह माँग  कर रहे हैं कि पूरे असम को छठी अनुसूची के तहत लाया जाए, जिससे राज्य की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान को संवैधानिक सुरक्षा मिल सके। इस माँग  को अब केवल छह जनजातियों तक सीमित न रखकर पूरे असम के लिए उठाया जा रहा है।

राजनेताओं की भूमिका

AIUDF ने केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और सिवसागर विधायक अखिल गोगोई से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने की माँग  की है। लेकिन इन नेताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ नागरिकता, संवैधानिक अधिकार और कानूनी पहचान के आधार पर लोगों की सहायता करें।

क्योंकि अगर राजनीति के केंद्र में केवल धर्म रहेगा, तो असम का भविष्य न केवल जनसांख्यिकीय संकट से घिरेगा, बल्कि सांस्कृतिक विनाश की ओर भी अग्रसर होगा।

निष्कर्ष

असम में अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशीलता और सहानुभूति बनी रहनी चाहिए, लेकिन वह संवैधानिक दायरे में होनी चाहिए। अवैध घुसपैठियों के प्रति अंधी सहानुभूति न केवल असम बल्कि भारत के भविष्य के लिए भी घातक हो सकती है। यह वक्त है जब असम को नये सिरे से अपनी पहचान, सुरक्षा और संस्कृति की रक्षा के लिए संगठित होकर ठोस कदम उठाने होंगे।

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