पूनम शर्मा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा शब्द दोहराया जो लंबे समय से उनकी आर्थिक भाषाशैली में अनुपस्थित था — “स्वदेशी”। यह कोई सामान्य भाषण नहीं था। न ‘आत्मनिर्भर भारत’, न ‘मेक इन इंडिया’, न ‘वोकल फॉर लोकल’—बल्कि सीधा गांधी युग का स्वदेशी का आह्वान, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा को दर्शाया था। लेकिन इस बार इसका स्वरूप बदला हुआ था—यह भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक था।
अमेरिका के दबाव के बीच आया स्वदेशी का संदेश
यह वक्तव्य ऐसे समय पर आया जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ कई वस्तुओं पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है और सस्ते रूसी तेल और रक्षा उपकरणों की खरीद पर चेतावनी दी है। दक्षिण ब्लॉक और उत्तर ब्लॉक में हलचल थी। अमेरिकी लॉबियों ने प्रचार करना शुरू कर दिया था कि “भारत को अमेरिका की ज़रूरत है, अमेरिका को भारत की नहीं”। ऐसे समय में मोदी का स्वदेशी आह्वान एक मजबूत जवाब के रूप में सामने आया—देशवासियों के लिए भी, व्यापारिक साझेदारों के लिए भी और अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए भी।
स्वदेशी: सिर्फ भावना नहीं, अब रणनीति
मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में आर्थिक भाषणों में “स्वदेशी” की जगह तकनीकी विकास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे शब्दों को प्राथमिकता दी। लेकिन अब जब दुनिया भर में संरक्षणवाद (protectionism) लौट रहा है—अमेरिका का Inflation Reduction Act, यूरोप की चीन से डिकपलिंग, जर्मनी द्वारा चिप निर्माण में सब्सिडी—तो भारत ने भी अपनी पुरानी विरासत को नई राजनीतिक शक्ति में बदलना शुरू कर दिया है।
स्वदेशी को अब घरेलू खपत तक सीमित नहीं रखा जा रहा। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ब्रह्मोस मिसाइल उत्पादन की बात की, सस्ते तेल के स्रोत की स्वतंत्रता का बचाव किया और इसे भारत की आर्थिक सुरक्षा नीति का हिस्सा बताया। यह ऊर्जा, रक्षा और व्यापार नीति को एक साझा ढांचे में जोड़ने की कवायद है।
व्यापार वार्ताओं में नया संकेत
भारत इस समय अमेरिका, यूरोपीय संघ और जीसीसी (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) के साथ व्यापार वार्ताओं के बेहद नाजुक चरण में है। इन वार्ताओं में डेटा संप्रभुता, स्थानीय सामग्री, और मूल उत्पत्ति जैसे जटिल मुद्दे शामिल हैं। अमेरिका के साथ वार्ता लगभग ठहराव पर है। ऐसे में मोदी का “हर नया सामान स्वदेशी होना चाहिए” वाला बयान न केवल घरेलू उद्योग को प्रोत्साहित करता है, बल्कि विदेशी व्यापार साझेदारों को भारत की नई सीमाओं का संकेत भी देता है।
MSME सेक्टर और स्वदेशी का सहारा
भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) लंबे समय से चीन और ASEAN देशों से सस्ते उत्पादों के कारण दबाव में हैं। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ये MSME भारत की GDP में करीब 30 प्रतिशत योगदान करते हैं। लेकिन RCEP से बाहर निकलने के बाद भी, सस्ते आयात से इनका संकट बना हुआ है। स्वदेशी का आह्वान इन उद्योगों को संरक्षण देने के लिए एक नैतिक कवच प्रदान करता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता
भारत का डेटा लोकलाइजेशन पर जोर और विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नियामकीय शिकंजा अब स्वदेशी के दायरे में आ गया है। यूरोपीय संघ और अमेरिका, भारत से डिजिटल डेटा के मुक्त प्रवाह की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब भारत इसे अपनी डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ रहा है।
रुपये में व्यापार और डॉलर निर्भरता का अंत?
मोदी सरकार ने पिछले एक वर्ष में रूस, यूएई और अफ्रीकी देशों के साथ रुपये में व्यापार को धीरे-धीरे बढ़ाया है। यद्यपि अभी यह कुल व्यापार का छोटा हिस्सा है, लेकिन यह संकेत है कि भारत डॉलर पर निर्भरता घटाकर द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देना चाहता है। यह स्वदेशी वित्तीय ढांचे की ओर एक छोटा लेकिन निर्णायक कदम है।
राजनीतिक दृष्टिकोण: अमेरिकी दबाव को संप्रभुता में बदला
मोदी का यह भाषण न केवल अमेरिका के टैरिफ धमकी को जवाब देता है, बल्कि इसे भारतीय जनता के बीच ‘राष्ट्रीय आत्मसम्मान’ के मुद्दे में बदलता है। यह विपक्ष को भी एक दुविधा में डालता है—वे स्वदेशी का विरोध करके विदेशी कंपनियों के पक्ष में नहीं जा सकते।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
हालांकि, इस नीति की असली परीक्षा इसके कार्यान्वयन में होगी। क्या यह स्वदेशी एक भावनात्मक नारा ही रहेगा, या फिर सरकार स्थानीय सामग्री की अनिवार्यता जैसी नीतियाँ लाएगी? क्या विदेशी उपभोक्ता वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए जाएंगे? या यह केवल एक चुनावी संदेश भर है?
अगर यह नीति बनती है, तो इसे पुराने लाइसेंस राज जैसी अक्षमता और भाई-भतीजावाद से बचना होगा। लेकिन अगर यह केवल एक राजनीतिक संकेत है, तो भी यह निवेशकों और व्यापारिक साझेदारों को भारत की दिशा का स्पष्ट संदेश देता है—अब भारत का आर्थिक मॉडल बाहरी दबावों से नहीं, आंतरिक प्राथमिकताओं से चलेगा।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री मोदी का ‘स्वदेशी’ आह्वान अब एक वैचारिक प्रतिरोध नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्निर्माण है। यह भारत की वैश्विक भूमिका को फिर से परिभाषित करने का प्रयास है। यह बताता है कि भारत अब अपने आर्थिक भविष्य को खुद आकार देगा—और ‘स्वदेशी’ एक बार फिर सिर्फ आज़ादी का नहीं, बल्कि ताकत का प्रतीक बन गया है।