पूनम शर्मा
दशकों तक भारत के सबसे होशियार, सबसे प्रतिभाशाली युवा अपनी मातृभूमि को पीछे छोड़ते रहे। अमेरिका जाने का सपना था — बेहतर जीवन, उच्च वेतन, अत्याधुनिक रिसर्च लैब और ग्लोबल पहचान। लाखों भारतीय छात्र और पेशेवर अमेरिका की ओर निकल पड़े, जो आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा “ब्रेन ड्रेन” बन गया। पहले यह एक धीमी धारा थी, फिर बाढ़ और फिर एक सामाजिक आदर्श: प्रवेश परीक्षा पास करो, IIT या AIIMS से डिग्री लो और अमेरिका उड़ जाओ — वापसी की कोई योजना नहीं।
यह कोई अपराध नहीं था। कौन नहीं चाहेगा एक ऐसा देश जहां सड़कों पर गड्ढे न हों, विज्ञान में निवेश हो, और काम के बदले डॉलर में सैलरी मिले? लेकिन जब पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय अमेरिका में बसने लगे, तो उनके मन में एक और भावना घर करने लगी — यह विश्वास कि भारत कभी अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता। कि पश्चिमी दुनिया ही आख़िरी मंज़िल है — बौद्धिक रूप से, आर्थिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से। और जो भारत में रह गया, वो “कमतर” है। वो “काबिल” नहीं था।
यह सोच केवल बाहर रहने वालों तक सीमित नहीं रही। भारत के मध्यवर्गीय समाज ने भी इसे अपना लिया। बच्चों की नैतिकता या देश के लिए योगदान पर नहीं, बल्कि फॉरेन डिग्री, यूएस वीज़ा या ग्रीन कार्ड पर गर्व किया जाने लगा। ‘फॉरेन रिटर्न’ टैग एक सामाजिक स्टेटस सिंबल बन गया। शादी-ब्याह, ज़मीन-जायदाद के सौदे और यहाँ तक कि राजनीतिक चंदे भी इस आधार पर तय होने लगे कि सामने वाले ने अमेरिका की धरती छुई है या नहीं।
लेकिन अब कुछ बदला है।
भारत आज पहले से कहीं अधिक ऊँचाई पर खड़ा है। वह देश जो कभी आर्थिक रूप से कमज़ोर था, आज दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत की तकनीकी ताक़त, अंतरिक्ष अभियान, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और कोविड वैक्सीन डिप्लोमेसी ने दुनिया को उसका लोहा मानने पर मजबूर किया है। भारत अब वैश्विक मंच पर पश्चिमी ताक़तों की परछाईं में खड़ा नहीं होता — वह अपनी शर्तों पर बात करता है। चाहे WTO के नियमों की बात हो, रूसी तेल पर रुख हो या इंडो-पैसिफिक में रणनीति — नई दिल्ली अब बिना माफ़ी के अपनी संप्रभुता पर अडिग रहती है।
उधर, पश्चिम — खासकर अमेरिका — जहाँ भारतीय कभी अपने सपनों की तलाश में गए थे, अब खुद संकट में है। नस्लभेद, बढ़ती असमानता,महँगे घर, राजनीतिक ध्रुवीकरण और ट्रंप युग की नई संरक्षणवादी नीतियां — सबने अमेरिकी सपना खोखला कर दिया है। भारतीय निर्यात पर फिर से भारी टैरिफ लगे हैं। जिन भारतीयों ने कभी वहां जाकर स्थिरता और समृद्धि पाई थी, आज वहीं रंगभेद, नौकरी की असुरक्षा और अप्रवासी विरोध का सामना कर रहे हैं।
एनआरआई आज दो दुनिया के बीच फंसे हैं।
पासपोर्ट भले अमेरिकी हो, लेकिन दिल आज भी दीपावली, चुनाव और इंडिया-पाकिस्तान मैच पर भारत के साथ धड़कता है। लेकिन जब भारत और अमेरिका किसी ट्रेड या भू-राजनीतिक विवाद में आमने-सामने होते हैं, तो यह सवाल उठता है — किसके साथ हैं वे? दिल और दिमाग की यह लड़ाई अब पहले से कहीं अधिक तीखी हो चुकी है।
और सच तो यह है कि संकट के समय उन्हें शरण भारत ही देगा। भारत, जिससे उन्होंने मुँह मोड़ा था, वही उनका अंतिम सहारा बनता है जब विदेशी जमीनें परायी होने लगती हैं। चाहे नौकरी जाने का डर हो, रंगभेदी हमले हों, या अप्रवासी नीति बदल जाए — वे कभी भी “अजनबी” बना दिए जा सकते हैं।
आज की दुनिया पोस्ट-ग्लोबल है — विखंडित, अनिश्चित और उथल-पुथल से भरी।
ऐसे में भारतीयों का वापसी की ओर झुकाव अब सिर्फ संभावना नहीं, वास्तविकता बनती जा रही है। और इस बार भारत तैयार है। ‘रिवर्स ब्रेन ड्रेन’ हो रहा है — तकनीकी विशेषज्ञ, स्टार्टअप फाउंडर, वैज्ञानिक और प्रोफेशनल्स वापसी कर रहे हैं। केवल कौशल ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और अनुभव के साथ। सरकार की पहलें — स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, PLI स्कीम — इस वापसी को गति दे रही हैं।
अब भारत वह देश नहीं रहा, जहां सपने केवल अमेरिका जाकर ही साकार हो सकते हैं। अब यहीं सपने बनते हैं — यहीं साकार होते हैं।
अब भारतीय समाज को भी मानसिक बदलाव की ज़रूरत है।
‘विदेश’ अब स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ नहीं है। विदेश जाकर नाम कमाना ही सफलता का पर्याय नहीं होना चाहिए। यह विदेश के खिलाफ़ दीवार नहीं खड़ी करना है, बल्कि अपने घर को इतना सुरक्षित, समर्थ और आकर्षक बनाना है कि कोई भी वहां से भागने की सोच तक न पाए।
हां, भारत को अभी बहुत आगे जाना है — बुनियादी ढांचा, शिक्षा, न्यायिक सुधार, और रोजगार की दिशा में काम शेष है। लेकिन अब भारत किसी की स्वीकृति का मोहताज नहीं। अब वह खुद को साबित करने के बजाय दूसरों से सवाल पूछता है।
अब बारी है एनआरआई समुदाय की — उन्हें तय करना होगा।
भारत अब “कमज़ोर छोटा भाई” नहीं रहा, वह अब बराबरी में है — कभी-कभी चुनौती भी देता है। वैश्विक तनाव बढ़ने पर वे दो राहे पर खड़े होंगे — और दो नावों में सवारी अब नहीं चलेगी। आज की दुनिया में, नागरिकता एक दस्तावेज़ नहीं, एक निर्णायक पहचान बन चुकी है।
और अंततः — वापसी निश्चित है।
चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या वैचारिक — लौटना तय है। वह धरती जिसने उन्हें भाषा, मूल्य और पहचान दी — वही उन्हें शरण देगी जब दुनिया ठंडी और कठोर हो जाएगी।
और शायद, अब समय आ गया है कि हम उन्हें ‘लौटे हुए’ नहीं, बस ‘अपने’ कहकर अपनाएं — बिना किसी उपसर्ग, बिना किसी शर्त।