पूनम शर्मा
नेपाल में हाल ही में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने पूरे क्षेत्र का ध्यान खींचा है। सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध और उसके बाद भड़के जनाक्रोश ने न केवल काठमांडू बल्कि अन्य शहरों को भी अशांत कर दिया। 19 युवाओं की मौत और सैकड़ों के घायल होने की खबरों के बीच भारत ने बेहद संतुलित और संवेदनशील प्रतिक्रिया दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि वह हालात पर कड़ी नज़र रख रहा है, साथ ही नेपाल को “करीबी मित्र और पड़ोसी” बताते हुए शांति और संवाद के रास्ते अपनाने का आग्रह किया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: गहरी जड़ें और साझा सरोकार
भारत और नेपाल का रिश्ता केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। यह वह संबंध है जो सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है। भगवान राम और माता सीता का रिश्ता हो या साझा खुली सीमाएँ—दोनों देशों के लोगों का आपसी संपर्क और निकटता अद्वितीय है। दशकों से भारत ने नेपाल की राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक विकास में सहयोग दिया है। चाहे 2015 के भूकंप के समय राहत कार्य हों या हाल के वर्षों में ऊर्जा, सड़क और स्वास्थ्य क्षेत्र में सहायता—भारत हमेशा नेपाल के साथ खड़ा रहा है।
वर्तमान संकट पर भारत का संतुलित दृष्टिकोण
नेपाल में सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध को युवा पीढ़ी ने सीधे अपने अभिव्यक्ति के अधिकार पर हमले के रूप में देखा। यही कारण है कि “जेन-ज़ी” के नाम से प्रसिद्ध युवाओं का आक्रोश सड़कों पर उतर आया। हिंसा के बाद जब भारत ने बयान जारी किया तो उसमें कहीं भी राजनीतिक हस्तक्षेप का भाव नहीं था। इसके विपरीत, भारत ने मृतकों के प्रति संवेदना और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना व्यक्त की।
विदेश मंत्रालय का यह कहना कि “हम उम्मीद करते हैं कि सभी पक्ष संयम बरतेंगे और मुद्दों का समाधान संवाद के माध्यम से करेंगे,” इस बात का संकेत है कि भारत नेपाल की संप्रभुता का सम्मान करते हुए उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचना चाहता है, परंतु एक मित्र पड़ोसी के रूप में शांति और स्थिरता की कामना करता है।
संकट के बीच भारत की भूमिका
यह पहली बार नहीं है जब नेपाल के अंदर राजनीतिक अस्थिरता या जनाक्रोश देखने को मिला हो। लेकिन हर बार भारत ने संयम और धैर्य के साथ प्रतिक्रिया दी है। भारत जानता है कि नेपाल की स्थिरता सीधे-सीधे क्षेत्रीय शांति और सीमाई सुरक्षा से जुड़ी है। भारत के लिए नेपाल सिर्फ पड़ोसी नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम देश है। इसलिए भारत हमेशा ऐसी परिस्थितियों में नेपाल को स्थिरता की ओर बढ़ने की सलाह और सहयोग देता आया है।
जन-जन का रिश्ता: राजनीति से परे
भारत और नेपाल के बीच के रिश्ते केवल सरकारों तक सीमित नहीं हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं, जबकि भारतीय पर्यटक और व्यापारी नेपाल से गहरे जुड़े हुए हैं। यह संबंध दोनों समाजों को जोड़ता है और किसी भी राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद यह रिश्ता अडिग बना रहता है। यही कारण है कि जब नेपाल में संकट की स्थिति पैदा होती है तो भारत में भी लोग चिंता महसूस करते हैं।
भारत का भविष्य का दृष्टिकोण
आज जब नेपाल में असंतोष और अशांति का माहौल है, भारत ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह देकर एक व्यावहारिक कदम उठाया है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है भारत का यह रुख कि वह हमेशा नेपाल की जनता और सरकार के साथ खड़ा रहेगा। इतिहास साक्षी है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी भारत ने नेपाल का हाथ थामा है—और यह परंपरा आज भी कायम है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि पड़ोसी पहले हैं (“Neighbourhood First Policy”) और इस नीति में नेपाल की जगह सबसे अहम है। भारत की यही सोच नेपाल के मौजूदा संकट पर उसकी प्रतिक्रिया में भी झलकती है।
निष्कर्ष
नेपाल इस समय एक संक्रमणकाल से गुजर रहा है—युवा पीढ़ी अधिकारों और पारदर्शिता की मांग कर रही है, जबकि सरकार व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठा रही है। ऐसे में भारत का संतुलित और संवेदनशील रुख दोनों देशों के रिश्ते की मजबूती को दर्शाता है। भारत-नेपाल की मित्रता सिर्फ औपचारिक कूटनीति नहीं है, बल्कि यह साझा संस्कृति, इतिहास और परस्पर सहयोग की कहानी है।
आज की घटनाओं ने यह एक बार फिर साबित किया है कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, भारत का समर्थन और सहयोग नेपाल के साथ था, है और हमेशा रहेगा।