फ्रांस के पीएम सेबेस्टियन लेकोर्नू ने एक महीने से कम में दिया इस्तीफा

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पूनम शर्मा
फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने अपने पद संभालने के एक महीने से भी कम समय में इस्तीफा दे दिया है। रविवार को उन्होंने नई कैबिनेट की घोषणा की थी, और उसके 24 घंटे के भीतर ही सोमवार को उन्होंने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंप दिया। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि मैक्रों ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।

चौथे प्रधानमंत्री, चौथा संकट

लेकोर्नू ने अपने पूर्ववर्ती फ्रांस्वा बायरू की जगह ली थी और वह पिछले एक वर्ष में फ्रांस के चौथे प्रधानमंत्री बने थे। वे मैक्रों के करीबी सहयोगी माने जाते थे, लेकिन उन्होंने कहा कि “सरकार चलाने के लिए अब परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं” क्योंकि वे सर्वसम्मति कायम करने में विफल रहे।

अपने इस्तीफे के संबोधन में लेकोर्नू ने कहा, “थोड़ी निःस्वार्थता, थोड़ी विनम्रता और देश को दल से ऊपर रखने का भाव अगर होता, तो यह काम कर सकता था।”

विपक्ष का हमला, चुनाव की माँग

प्रधानमंत्री के इस्तीफे के तुरंत बाद विपक्ष ने राष्ट्रपति मैक्रों पर निशाना साधा। दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली की नेता मरीन ले पेन ने कहा, “अब सवाल यह है कि क्या राष्ट्रपति अब भी संसद भंग करने से बच सकते हैं? हम अब अंत की राह पर हैं। एकमात्र विवेकपूर्ण रास्ता है—नए आम चुनाव।”

वामपंथी दल फ्रांस अनबाउड ने भी मैक्रों के इस्तीफे की मांग की। वहीं, अन्य वामपंथी नेताओं ने समाजवादी, हरित और कम्युनिस्ट दलों के साथ मिलकर एक साझा गठबंधन बनाने का आह्वान किया।

आर्थिक बाजार में उथल-पुथल

इस राजनीतिक हलचल का असर तुरंत बाजार पर भी पड़ा। फ्रांस के प्रमुख शेयर सूचकांक CAC-40 में लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ गई है क्योंकि देश के सामने पहले से ही कर्ज संकट गहराता जा रहा है।

नव नियुक्त मंत्री, जिन्हें अभी औपचारिक रूप से पदभार भी नहीं मिला था, अब “केयरटेकर” यानी अंतरिम मंत्री बनकर रह गए हैं। नवनियुक्त पर्यावरण मंत्री एग्नेस पानियर-रुनाशे ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा, “यह पूरा तमाशा निराशाजनक है।”

मंत्री चयन पर विवाद

लेकोर्नू की कैबिनेट को सभी राजनीतिक वर्गों से आलोचना झेलनी पड़ी। खासकर उनके निर्णय पर जब उन्होंने पूर्व वित्त मंत्री ब्रूनो ले मेर को रक्षा मंत्री बनाया। आलोचकों का कहना है कि उनके कार्यकाल में ही देश का सार्वजनिक घाटा तेजी से बढ़ा था।

फ्रांस की कुल सार्वजनिक ऋण राशि 2025 की पहली तिमाही में 3.346 ट्रिलियन यूरो (करीब 3.9 ट्रिलियन डॉलर) पहुंच गई थी, जो जीडीपी का लगभग 114 प्रतिशत है। केवल ब्याज भुगतान ही सरकार के कुल व्यय का 7 प्रतिशत हिस्सा ले रहा है।

अस्थिर राजनीति और टूटे समीकरण

पिछले वर्ष मैक्रों द्वारा बुलाए गए त्वरित चुनावों के बाद से फ्रांसीसी संसद बुरी तरह बंटी हुई है। नेशनल असेंबली में दक्षिणपंथी और वामपंथी दलों के पास कुल 320 सीटें हैं, जबकि सत्तारूढ़ केंद्रपंथी और सहयोगी दलों के पास सिर्फ 210 सीटें हैं।

लेकोर्नू ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सभी दलों और ट्रेड यूनियनों से संवाद कर आम सहमति बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने यह भी वादा किया था कि वे अपने पूर्ववर्तियों की तरह संविधान की विशेष धारा का उपयोग कर बजट को बिना मतदान के पारित नहीं करेंगे, बल्कि संसद में बहस और समझौते के माध्यम से आगे बढ़ेंगे।

अब क्या आगे ?

लेकोर्नू के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति मैक्रों एक बार फिर नई सरकार के गठन की चुनौती का सामना कर रहे हैं। देश में आर्थिक अस्थिरता, बढ़ता कर्ज, और राजनीतिक ध्रुवीकरण पहले से ही चरम पर है। ऐसे में यह संकट न केवल उनकी साख पर सवाल खड़ा करता है बल्कि फ्रांस की लोकतांत्रिक स्थिरता पर भी गहरी छाया डालता है।

संक्षेप में, फ्रांस आज एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहां जनता, संसद और राष्ट्रपति के बीच विश्वास की डोर कमजोर पड़ चुकी है। यह इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक तंत्र की थकान का प्रतीक बन गया है।

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