- कोर वोट बैंक की अति-प्रतिनिधित्व (Over-Representation): RJD ने अपने MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को मज़बूत किया है, जबकि BJP ने सवर्ण (ऊंची जाति) मतदाताओं, विशेषकर राजपूतों और भूमिहारों पर प्रमुखता से दाँव लगाया है। दोनों ही समूहों ने अपनी आबादी के अनुपात से कहीं अधिक टिकट बांटे हैं।
- अन्य पिछड़ी जातियों (EBCs) और दलितों की उपेक्षा: RJD ने अति पिछड़ी जातियों (EBC) और दलितों को कम टिकट दिए हैं, जबकि BJP ने भी अपने सहयोगी दल JDU के बाहर इस वर्ग को सीमित प्रतिनिधित्व दिया है, जिससे इन दोनों निर्णायक वोट बैंकों की नाराज़गी का खतरा पैदा हुआ है।
- चुनाव जीतने की व्यावहारिकता (Winnability) बनाम सामाजिक न्याय: दोनों ही दलों ने सामाजिक न्याय या जातिगत जनगणना के अनुपात में प्रतिनिधित्व जैसे बड़े नारों के बजाय ‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता) को सर्वोपरि रखा, जिसने उनके टिकट वितरण फॉर्मूले को एक-दूसरे के समान बना दिया है।
समग्र समाचार सेवा
पटना, 01 नवंबर: बिहार की राजनीति हमेशा से जातिगत समीकरणों पर टिकी रही है, और यह बात विधानसभा चुनावों के टिकट वितरण में एक बार फिर स्पष्ट हो गई है। हैरानी की बात यह है कि राज्य के दो प्रमुख राजनीतिक ध्रुव—राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाला महागठबंधन और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)—ने अपने-अपने उम्मीदवारों को चुनने में लगभग एक-दूसरे की नकल (Mirroring) की है। दोनों दलों ने अपने कोर वोट बैंक को प्राथमिकता दी है, भले ही इसके लिए सामाजिक न्याय या प्रतिनिधित्व के बड़े दावों को नज़रअंदाज़ करना पड़ा हो।
RJD का ‘MY’ दाँव: केवल कोर पर फोकस?
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का टिकट वितरण फॉर्मूला सीधे तौर पर उसके पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर केंद्रित रहा है।
यादव और मुस्लिम केंद्रित रणनीति:
RJD ने अपने कुल टिकटों में से लगभग 36% टिकट यादव उम्मीदवारों को दिए हैं, जबकि राज्य की आबादी में उनकी हिस्सेदारी लगभग 14-15% है। इसी तरह, मुस्लिम उम्मीदवारों को भी उनकी संख्या के अनुपात में बड़ा हिस्सा मिला है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार यह संख्या यादवों से कम है।
आलोचना और जोखिम: यह अति-प्रतिनिधित्व (Over-Representation) RJD की हालिया सामाजिक न्याय की राजनीति और ‘जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के नारे के विपरीत है। इस रणनीति से दो बड़े जोखिम पैदा होते हैं:
EBCs (अति पिछड़ी जातियां) की नाराज़गी: EBC समुदाय, जो बिहार की राजनीति में एक निर्णायक शक्ति है, को RJD से उसकी उम्मीदों के मुताबिक टिकट नहीं मिले हैं। यह वर्ग लंबे समय से नीतीश कुमार (JDU) का कोर वोट बैंक रहा है, और RJD की उपेक्षा इस वर्ग को NDA की ओर पूरी तरह धकेल सकती है।
सवर्णों का पूर्ण बहिष्कार: RJD ने सवर्ण समुदाय को लगभग पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया है, जिससे इस वर्ग के वोट NDA के पास एकजुट हो सकते हैं।
RJD ने ‘तेजस्वी की EBC गारंटी’ जैसे नारे दिए, लेकिन टिकट वितरण में इस वर्ग पर कम भरोसा जताना यह दर्शाता है कि पार्टी अभी भी अपने पुराने, मज़बूत कोर वोट बैंक से बाहर निकलकर जोखिम लेने को तैयार नहीं है।
BJP का ‘सवर्ण’ और ‘OBC’ संतुलन
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने टिकट वितरण में अपने पारंपरिक ‘सवर्ण’ (ऊंची जाति) वोट बैंक पर मज़बूती से दाँव लगाया है, जबकि OBC (पिछड़ी जाति) और EBC को भी साधने की कोशिश की है।
सवर्णों पर मज़बूत भरोसा:
BJP ने अपनी पहली सूची में ही लगभग 50% टिकट सवर्ण उम्मीदवारों को दिए, जिनमें राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ शामिल हैं। उदाहरण के लिए, रिपोर्ट्स के अनुसार राजपूतों को 15 और भूमिहारों को 11 सीटें दी गई हैं। यह दिखाता है कि BJP बिहार में अभी भी सवर्णों को अपना स्थाई (Core) वोट बैंक मानती है और उनके प्रतिनिधित्व में कोई कटौती नहीं करना चाहती।
OBC/EBC को साधने का प्रयास: हालांकि, बिहार की राजनीतिक सच्चाई को देखते हुए BJP ने OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) और EBC (अति पिछड़ा वर्ग) को भी महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व दिया है।
OBC उम्मीदवारों को 20 से अधिक टिकट दिए गए हैं, जिनमें वैश्य समुदाय को सबसे अधिक प्राथमिकता मिली है, जो BJP का पारंपरिक समर्थन आधार रहा है।
यह रणनीति दोहरी है: सवर्णों को संतुष्ट रखना और OBC/EBC के बड़े हिस्से को NDA की ओर आकर्षित करना।
आलोचना और जोखिम: BJP की सबसे बड़ी चुनौती उसके गठबंधन सहयोगी JDU से अलग EBC वोट को खींचना है। यदि JDU अपने कोटे में EBC को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देता है, तो BJP की अपनी EBC सीटों की संख्या फीकी पड़ सकती है। इसके अलावा, BJP ने भी दलित समुदाय को उसकी आबादी के अनुपात में कम ही प्रतिनिधित्व दिया है।
क्यों है टिकट वितरण फॉर्मूले में समानता?
RJD और BJP के टिकट वितरण फॉर्मूले में यह समानता आश्चर्यजनक नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक मजबूरी का परिणाम है।
वोट बैंक की ध्रुवीकरण की रणनीति:
RJD जानती है कि बिना MY वोट के उसकी जीत असंभव है। इसलिए, वह ‘MY’ को अधिकतम प्रतिनिधित्व देकर इस कोर को मज़बूत और एकजुट रखना चाहती है, भले ही इससे अन्य वर्ग नाराज़ हों।
BJP जानती है कि सवर्ण वोट उसका सबसे विश्वसनीय और एकजुट आधार है। इसलिए, वह सवर्णों को अधिकतम टिकट देकर उन्हें सुरक्षित करती है, क्योंकि यह वोटबैंक RJD के ‘MY’ समीकरण के खिलाफ ध्रुवीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह दोनों ही दलों के लिए ‘शून्य-जोखिम’ (Zero-Risk) वाली रणनीति है, जहां वे अपने सबसे मज़बूत किले को पहले मज़बूत करते हैं।
‘विनेबिलिटी’ की निर्णायक भूमिका:
बिहार में जाति ही अक्सर ‘विनेबिलिटी’ का निर्धारण करती है। जिस क्षेत्र में जिस जाति का प्रभाव होता है, दोनों ही पार्टियाँ उसी जाति के उम्मीदवारों को टिकट देने को प्राथमिकता देती हैं, भले ही वह उनके सामाजिक न्याय के नारों के विपरीत हो।
RJD का तर्क है कि MY उम्मीदवार, अन्य समुदायों के उम्मीदवारों की तुलना में, उनके मौजूदा प्रभाव क्षेत्रों में जीत की अधिक संभावना रखते हैं। यही तर्क BJP सवर्ण बहुल सीटों पर लागू करती है। इस व्यावहारिक सोच ने दोनों के टिकट वितरण को एक-दूसरे के समान बना दिया है।
जातिगत जनगणना के दबाव का अभाव:
जातिगत जनगणना के आंकड़े होने के बावजूद, RJD और कांग्रेस दोनों ने ही आबादी के अनुपात में भागीदारी का फॉर्मूला टिकट वितरण में पूरी तरह लागू नहीं किया है। इससे स्पष्ट होता है कि चुनावी जीत (Electoral Victory) की तात्कालिक ज़रूरत, सैद्धांतिक सामाजिक न्याय के नारों पर भारी पड़ गई है।
निष्कर्ष: बिहार की चुनावी बिसात पर जाति ही मोहरा
RJD और BJP, दो वैचारिक ध्रुवों पर खड़े होने के बावजूद, टिकट वितरण के मामले में एक ही जातीय-केंद्रित रणनीति अपना रहे हैं। RJD अपने MY कोर को अति-प्रतिनिधित्व दे रहा है, जबकि BJP अपने सवर्ण और OBC आधार को साध रहा है। यह समानता इस बात की पुष्टि करती है कि बिहार में राजनीति की धुरी, सैद्धांतिक विचारधारा से ज़्यादा, समीकरण साधने की व्यावहारिकता पर टिकी है।
दोनों ही दलों ने अपने सबसे भरोसेमंद वोट बैंक को साधकर ‘पहले अपना गढ़ सुरक्षित करें’ का फॉर्मूला अपनाया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि RJD द्वारा EBCs और दलितों की कथित उपेक्षा तथा BJP द्वारा अपने सहयोगी JDU पर दबाव बनाने की रणनीति, अंततः इन निर्णायक वोट बैंकों को किस खेमे की ओर धकेलती है। बिहार की चुनावी बिसात पर, जाति अभी भी सबसे बड़ा ‘मोहरा’ है।