पश्चिम बंगाल में “ममता की दीवार” पर लिखी इबारत
दिपु दास की हत्या, कोलकाता का विरोध और बंगाल पुलिस पर उठते सवाल
पूनम शर्मा
बांग्लादेश में हिंदू युवक दिपु चंद्र दास की निर्मम हत्या के बाद उठा जनाक्रोश अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। यह आक्रोश भारत की आत्मा से जुड़ा है, इसलिए स्वाभाविक है कि उसकी गूँज दिल्ली, अगरतला और अब कोलकाता तक पहुँची। लेकिन कोलकाता में जो दृश्य सामने आया, उसने एक नए और गंभीर सवाल को जन्म दे दिया—क्या पश्चिम बंगाल की पुलिस अब जनता की नहीं, सत्ता की ढाल बन चुकी है?
दिपु दास: एक हत्या, जो केवल बांग्लादेश की नहीं रही
दिपु दास की हत्या को केवल एक आपराधिक घटना बताकर टालना सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। धर्म के नाम पर की गई हिंसा, और वह भी अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध, पूरे उपमहाद्वीप को झकझोरती है। भारत और बांग्लादेश के बीच साझा इतिहास, संस्कृति और रिश्तों के कारण यह पीड़ा भारतीय समाज में भी उतनी ही तीव्र है। यही कारण है कि विरोध राष्ट्रीय स्वर में बदल गया।
कोलकाता में संतों का नेतृत्व, और पुलिस का बल
कोलकाता में संतों के नेतृत्व में निकला हिंदुओं का विशाल प्रदर्शन किसी राजनीतिक दल का जुलूस नहीं था। यह एक नैतिक प्रतिरोध था—शांत, प्रतीकात्मक और आस्था से जुड़ा। लेकिन इस विरोध का सामना जिस तरह से बंगाल पुलिस ने किया, उसने पूरे घटनाक्रम को विवाद के केंद्र में ला दिया।
संतों पर लाठीचार्ज जैसी कार्रवाई के आरोप केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं उठाते, बल्कि यह बताते हैं कि राज्य सत्ता असहमति से कितनी असहज है।
“बांग्लादेश की पुलिस” का आरोप: भावनात्मक नारा या गहरी पीड़ा?
प्रदर्शन के दौरान उठा नारा—कि “बांग्लादेश की पुलिस अब पश्चिम बंगाल की पुलिस बन गई है”—सिर्फ एक नारा नहीं था। यह उस गहरी पीड़ा और अविश्वास का प्रतीक है, जो आम नागरिकों के मन में पनप रहा है।
जब लोग यह महसूस करने लगते हैं कि पुलिस जनता की सुरक्षा के बजाय राजनीतिक सत्ता की रक्षा में अधिक तत्पर है, तब लोकतंत्र की जड़ें हिलने लगती हैं।
बंगाल पुलिस: कानून का रक्षक या सत्ता का औज़ार?
भारतीय संविधान पुलिस को कानून का रक्षक बनाता है, किसी सरकार का निजी बल नहीं। लेकिन हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल में बार-बार ऐसे दृश्य सामने आए हैं, जहाँ पुलिस की भूमिका निष्पक्ष नहीं, बल्कि चयनात्मक दिखाई देती है। आज जब संतों जैसे अहिंसक समूह पर कठोरता दिखाई जाती है, तो सवाल उठता है—क्या यही कठोरता राज्य में बढ़ती हिंसा और अराजकता पर भी दिखाई जाती है?
ममता बनर्जी और “दीवार” की राजनीति
“ममता की दीवार” अब एक राजनीतिक प्रतीक बन चुकी है—एक ऐसी सत्ता-संरचना का प्रतीक, जो आलोचना को चुनौती नहीं, बल्कि खतरा मानती है।
लेकिन इतिहास गवाह है कि दीवारें हमेशा के लिए नहीं होतीं। जब जनभावना उफान पर आती है, तो सबसे ऊँची दीवार पर भी इबारत लिखी जाती है। आज कोलकाता की सड़कों पर वही इबारत दिखाई दे रही है—असंतोष की, अविश्वास की और न्याय की माँग की।
संतों पर बल: राज्य की नैतिक हार
भारत की परंपरा में संत केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं होते; वे समाज की नैतिक चेतना होते हैं। जब ऐसे लोगों पर पुलिस बल प्रयोग करती है, तो वह केवल कानून का प्रयोग नहीं होता, बल्कि राज्य की नैतिक हार भी होती है। यह संदेश जाता है कि सत्ता संवाद से नहीं, दमन से जवाब देना चाहती है।
लोकतंत्र की कसौटी पर बंगाल
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र वह व्यवस्था है, जहाँ असहमति को जगह मिले, विरोध को सुना जाए और आस्था का सम्मान हो।
आज पश्चिम बंगाल इस कसौटी पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शन सही था या गलत—सवाल यह है कि राज्य की प्रतिक्रिया लोकतांत्रिक थी या नहीं।
आगे का रास्ता: पुलिस को राजनीति से मुक्त करना होगा
यदि पश्चिम बंगाल में शांति और विश्वास बहाल करना है, तो पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करना होगा। पुलिस का काम विरोध को कुचलना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित और शांतिपूर्ण बनाना है। राज्य सरकार को यह समझना होगा कि हर विरोध सरकार गिराने की साजिश नहीं होता। कई बार वह केवल न्याय की पुकार होता है।
निष्कर्ष: दीवारें गिरती हैं, आवाज़ें रहती हैं
आज बंगाल में जो हो रहा है, वह केवल एक दिन का घटनाक्रम नहीं है। यह एक चेतावनी है। ममता की दीवार पर इबारत लिखी जा चुकी है।अब यह राज्य पर निर्भर करता है कि वह इस इबारत को पढ़कर संवाद का रास्ता चुने, या दीवार को और ऊँचा करने की भूल करे। इतिहास बताता है—दीवारें गिर जाती हैं, लेकिन जनता की आवाज़ हमेशा बची रहती है।