उमा भारती का अविमुक्तेश्वरानंद विवाद पर बयान: प्रशासन ने अधिकारों की सीमा लांघी

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  • उमा भारती ने अविमुक्तेश्वरानंद और यूपी सरकार के बीच सकारात्मक समाधान की बात कही
  • शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगना प्रशासनिक मर्यादा के खिलाफ बताया
  • कहा—यह अधिकार केवल शंकराचार्य परंपरा और विद्वत परिषद का
  • गंगा स्नान से रोके जाने के बाद विवाद ने पकड़ा तूल

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली |28 जनवरी: अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर चल रहे विवाद पर भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच इस पूरे मामले में कोई सकारात्मक समाधान अवश्य निकलेगा।

प्रशासनिक कार्रवाई पर आपत्ति

उमा भारती ने कहा कि किसी संत से शंकराचार्य की उपाधि को लेकर सबूत मांगना प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह अधिकार केवल शंकराचार्यों की परंपरा और विद्वत परिषद को है, न कि किसी प्रशासनिक इकाई को।

मर्यादा और अधिकारों का उल्लंघन

बीजेपी नेता के अनुसार, नोटिस जारी कर इस तरह की जानकारी मांगना प्रशासन द्वारा अपनी मर्यादा और अधिकारों की सीमा का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों में प्रशासन को अत्यधिक सतर्कता और सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिए।

क्या है पूरा विवाद

हाल ही में गंगा स्नान से जुड़े एक घटनाक्रम के बाद मेला प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस जारी किया था। नोटिस में उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया कि वह ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य की उपाधि का उपयोग किस आधार पर कर रहे हैं।

आरोप है कि मौनी अमावस्या के अवसर पर जब अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तब पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद उन्होंने अपने शिविर के बाहर धरना शुरू किया और मेला प्रशासन व पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से माफी की मांग की।

समाधान की उम्मीद

उमा भारती ने कहा कि यह मामला संवाद और समझदारी से सुलझाया जा सकता है और सरकार तथा संत समाज के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

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