पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आदिवासी मतदाता लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस समीकरण को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। एक ओर ममता की सरकार ने आदिवासी और पिछड़े समुदायों के लिए नए विकास बोर्डों की घोषणा की, तो दूसरी ओर भाजपा ने राष्ट्रपति से जुड़े एक प्रोटोकॉल विवाद को “आदिवासी सम्मान” के मुद्दे में बदल दिया।
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि चुनावी राजनीति अब सिर्फ विकास योजनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि पहचान, सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का खेल बन चुकी है।
विकास बोर्ड: सिर्फ योजना या राजनीतिक संदेश?
13 मार्च को ममता बनर्जी ने मुण्डा, कोड़ा, डोम, कुम्भकार और सदगोप समुदायों के लिए पांच नए बोर्डों की घोषणा की। ये बोर्ड मुख्य रूप से पुरुलिया, बांकुड़ा, झारग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिलों में काम करेंगे, जहां आदिवासी आबादी निर्णायक है।
सरकार का दावा है कि ये बोर्ड शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण को बढ़ावा देंगे। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सिर्फ विकास का नहीं, बल्कि एक स्पष्ट चुनावी संदेश है—इन समुदायों को यह अहसास दिलाना कि सरकार उनकी पहचान और संस्कृति को मान्यता दे रही है।
ममता बनर्जी ने अपने बयान में “मुख्यधारा में शामिल करने” की बात कही, जो यह संकेत देता है कि सरकार इन समुदायों को अलग-थलग नहीं बल्कि सशक्त और प्रतिनिधित्वयुक्त बनाना चाहती है।
बीजेपी की रणनीति: सम्मान बनाम उपेक्षा
दूसरी तरफ बीजेपी ने एक अलग नैरेटिव खड़ा किया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो खुद एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आती हैं, से जुड़े एक प्रोटोकॉल विवाद को पार्टी ने “आदिवासी अस्मिता” के मुद्दे में बदल दिया।
बीजेपी का तर्क है कि अगर देश की राष्ट्रपति, जो आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं, उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं होता, तो यह पूरे समुदाय के प्रति उपेक्षा का संकेत है।
इस तरह बीजेपी ने एक प्रशासनिक या प्रोटोकॉल से जुड़ी घटना को भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दे में बदल दिया—जो चुनावी राजनीति में अक्सर बेहद प्रभावी साबित होता है।
करीबी मुकाबले वाले क्षेत्र, बड़ा असर
पश्चिमी बंगाल के जिन इलाकों में ये बोर्ड बनाए गए हैं, वहां पिछले कई चुनावों में मुकाबला बेहद करीबी रहा है। कई सीटों पर जीत का अंतर 5,000 वोट से भी कम रहा है।
ऐसे में आदिवासी वोट बैंक का थोड़ा सा झुकाव भी चुनावी परिणाम बदल सकता है। यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल—तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी—इस वर्ग को लेकर बेहद सतर्क और आक्रामक रणनीति अपना रहे हैं।
पहचान की राजनीति बनाम प्रत्यक्ष लाभ
यहां दिलचस्प बात यह है कि दोनों पार्टियों की रणनीति अलग-अलग दिशा में जा रही है।
ममता बनर्जी की रणनीति: योजनाओं, बोर्डों और संस्थागत ढांचे के जरिए “प्रतिनिधित्व और विकास” पर जोर
बीजेपी की रणनीति: “सम्मान और अस्मिता” के मुद्दे को केंद्र में रखना
मतदाता के सामने अब दो सवाल हैं—क्या वे बैंक खाते में आए लाभ को प्राथमिकता देंगे या सम्मान और पहचान के सवाल को?
क्या असर पड़ेगा?
राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो यह मुकाबला बेहद दिलचस्प है। अगर ममता सरकार की योजनाएं ज़मीनी स्तर पर असर दिखाती हैं, तो यह तृणमूल के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन अगर बीजेपी का “सम्मान” वाला नैरेटिव भावनात्मक रूप से असर डालता है, तो समीकरण बदल सकते हैं।
आदिवासी समाज अब सिर्फ “वोट बैंक” नहीं रहा, बल्कि वह अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर अधिक जागरूक हो चुका है। यही वजह है कि उसे साधना अब पहले जितना आसान नहीं है।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल में आदिवासी राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां विकास, पहचान और सम्मान तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण हो गए हैं।
ममता बनर्जी और भाजपा के बीच यह मुकाबला सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि विचारधारा और रणनीति का भी है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि मतदाता किसे प्राथमिकता देते हैं—खाली कुर्सियों का प्रतीकात्मक संदेश या बैंक खाते में दिखने वाला वास्तविक लाभ।