पूनम शर्मा
एक साधारण ट्वीट और राजनीतिक बवंडर की शुरुआत
बात शुरू हुई थी ईरान में आए एक मुश्किल भरे समय से, जब COVID-19 महामारी के दौरान ईरान को समर्थन की आवश्यकता थी। ऐसे समय में, भारत ने एक मानवीय भाव दिखाते हुए ईरान को सहायता प्रदान की। इसी संदर्भ में, ईरानी दूतावास ने भारत में दानदाताओं को धन्यवाद देने के लिए सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट किए। इनमें से एक पोस्ट में कश्मीर के लोगों द्वारा दिए गए दान का उल्लेख था, जिसमें “विद हार्दिक ग्रेटिट्यूड फ्रॉम द काइंडली पीपल ऑफ कश्मीर” (कश्मीर के दयालु लोगों की ओर से हार्दिक आभार) लिखा था। एक अन्य पोस्ट में तो स्पष्ट रूप से “थैंक यू इंडिया” (धन्यवाद भारत) की बात कही गई थी।
यह एक सीधा और कूटनीतिक रूप से सही बयान था, क्योंकि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए। हालांकि, यह सादगी और कूटनीतिक सच्चाई कुछ ही घंटों में भयानक राजनीति का शिकार हो गई। पाकिस्तान के लोग और उनके साथ कुछ भारतीय ट्विटर अकाउंट्स ने कश्मीर पर ईरानी दूतावास के ट्वीट को लेकर ऑनलाइन हंगामा मचाना शुरू कर दिया। वही पुराना नारा, “कश्मीर इज नॉट इंडिया” (कश्मीर भारत का नहीं है), फिर से सोशल मीडिया पर गूंजने लगा। देखते ही देखते, सोशल मीडिया पर भारी दबाव बनाया गया।
सोशल मीडिया दबाव और ईरानी दूतावास का यू-टर्न
इस दबाव का असर यह हुआ कि ईरानी दूतावास ने अपना मूल पोस्ट डिलीट कर दिया। यह घटनाक्रम अत्यंत निराशाजनक था। कृतज्ञता भी ऐसी जो राजनीतिक दबाव के सामने झुक जाए, यह स्वीकार्य नहीं है। इसका मतलब यह है कि एक ओर तो पाकिस्तान समर्थक अकाउंट्स को यह भी बर्दाश्त नहीं हो रहा कि कश्मीरी भारतीय ईरान को दान दें, क्योंकि जैसे ही कश्मीर का नाम आता है, उनके पुराने एजेंडे सक्रिय हो जाते हैं। इन लोगों के लिए शायद मानवता की वास्तविक स्थिति से अधिक एक राजनीतिक और धार्मिक पहचान महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि दान जैसे मानवीय कृत्य पर भी राजनीति शुरू हो गई।
भारत की संप्रभुता पर सवाल और कूटनीतिक संदेश
इस घटना ने जहां एक ओर कुछ ईरान-भारत मैत्री दिखाने की कोशिश की, वहीं जब बात भारत की क्षेत्रीय अखंडता को स्वीकार करने की आती है तो समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। भारत के लिए, जम्मू और कश्मीर कोई बहस का मुद्दा नहीं है। भारतीय संविधान के अनुसार, यह भारत का एक अविभाज्य अंग है। यह एक स्थापित और निर्विवाद राजनीतिक वास्तविकता है। जब नई दिल्ली में स्थित कोई विदेशी दूतावास इस वास्तविकता को नजरअंदाज करता है या दबाव में आकर उसे कमजोर करता है, तो यह केवल एक ट्वीट को डिलीट करने से कहीं बढ़कर एक नकारात्मक संदेश देता है।
भारत को यह भी याद है कि ईरान के सर्वोच्च नेता, आयतुल्लाह खामेनेई, पहले भी पाकिस्तान के कश्मीर पर दिए गए बयानों का समर्थन कर चुके हैं। अब ईरानी दूतावास का यह कदम उसी रुख को और मजबूती देता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि आप किसी देश से सहायता और समर्थन तो ले सकते हैं, लेकिन आप दाता देश की संप्रभुता को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
आगे का रास्ता: भारत के लिए सबक
यह घटना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी, विशेष रूप से कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर, देश अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं कर सकते। कूटनीतिक संबंधों में पारदर्शिता और सच्चाई का होना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी देश को बाहरी दबाव में आकर अपनी स्थिति को बदलने से बचना चाहिए, खासकर जब बात किसी मित्र देश की संप्रभुता की हो। भारत को इस घटना को एक संदेश के रूप में लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसे राजनीतिक दबावों का सामना करने के लिए उसकी कूटनीति और भी मजबूत हो।