पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल की राजनीति दशकों से एक अनोखे सामाजिक अनुबंध पर टिकी रही है। यहाँ सरकार से समृद्धि की उम्मीद कम, लेकिन “साथ खड़े होने” (पाशे दाड़ानो) की उम्मीद ज्यादा की जाती थी। वामपंथियों से विरासत में मिली यह संस्कृति ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ताकत बनी। लेकिन आज, यह अनुबंध टूटता दिख रहा है। सत्ता विरोधी लहर अब एक “खामोश विद्रोह” में बदल चुकी है, जहाँ लोग सरकार के कामकाज से ज्यादा, उसकी छवि से शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं।
शहरी-ग्रामीण विरोधाभास का अंत
भारत के अन्य राज्यों में भाजपा को शहरी पार्टी माना जाता है, लेकिन बंगाल में कहानी उल्टी थी। 2019 और 2021 में भाजपा की ताकत पुरुलिया, झाड़ग्राम और उत्तर बंगाल के ग्रामीण व आदिवासी इलाकों से आई, जबकि कोलकाता का ‘भद्रलोक’ टीएमसी के साथ खड़ा रहा।
अब एक बड़ा “डेमोग्राफिक शिफ्ट” दिख रहा है। कोलकाता और उसके आसपास का शहरी वोटर, जो कभी ममता का ढाल था, अब उनसे किनारा कर रहा है। आज स्थिति यह है कि सभ्य समाज में टीएमसी का समर्थन करना एक सामाजिक शर्मिंदगी बन गया है। लोग भाजपा को खुलेआम अपनाएँ न अपनाएँ, लेकिन वे टीएमसी को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। यह वैसी ही स्थिति है जैसी 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी या हाल ही में तेलंगाना में केसीआर के साथ हुई थी—जहाँ शोर तो होता है कि “वही जीत रहे हैं,” लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर कोई उन्हें वोट नहीं देना चाहता।
गौरव की कमी और आर्थिक आईना
टीएमसी का पूरा चुनाव ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर टिका है। लेकिन जब आत्मसम्मान को चोट लगती है, तो मुफ्त की योजनाएँ बेअसर हो जाती हैं। बंगाल के युवाओं का नौकरी के लिए गुवाहाटी और भुवनेश्वर जाना बंगाली अस्मिता पर गहरी चोट है। कल तक जो राज्य विकास में बंगाल के “जूनियर पार्टनर” थे, आज वे प्रति व्यक्ति जीडीपी में बंगाल को पीछे छोड़ रहे हैं। जब राज्य की पहचान सिर्फ ‘सिंडिकेट भ्रष्टाचार’ और ‘सस्ते श्रम’ के निर्यातक के रूप में होने लगे, तो बुद्धिजीवी वर्ग खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
डर का माहौल और खामोश वोट
टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत उसका जमीनी संगठन और “डर” रहा है। ममता बनर्जी का यह कहना कि “भाजपा को वोट देने वाले अपने घर पर झंडे लगा लें,” उनकी मजबूती नहीं बल्कि हताशा दिखाता है। इतिहास गवाह है कि जब सरकार खुलेआम धमकी देने लगे, तो जनता खामोश हो जाती है और अपनी बात सीधे ईवीएम (EVM) में कहती है।
आरजी कर कांड और संदेशखाली की घटनाओं ने उस महिला वोट बैंक को हिला दिया है, जो ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत थी। यह धारणा कि “रक्षक ही भक्षक को बचा रहा है,” उस भावनात्मक जुड़ाव को तोड़ चुकी है।
निष्कर्ष: भाजपा के लिए बढ़ती संभावनाएँ
हालांकि भाजपा पर अक्सर टीएमसी जैसा आक्रामक स्थानीय संगठन न होने का आरोप लगता है, लेकिन इस बार वे एक बड़े “नकारात्मक वोट” (Negative Vote) के लाभार्थी बनते दिख रहे हैं। जनता अब सिर्फ किसी विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था से बाहर निकलने के लिए वोट दे रही है जो नैतिक और आर्थिक रूप से दिवालिया हो चुकी है। अगर भाजपा झारखंड जैसी गलतियों से बचती है और शहरी व आदिवासी असंतोष को सही दिशा देती है, तो बंगाल में टीएमसी का किला ढहना लगभग तय है।