पूनम शर्मा
असम की राजनीति में सहयोगी दलों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में असम गण परिषद (AGP) और उसके नेतृत्व को लेकर जिस तरह की नाराजगी सामने आ रही है, उसने गठबंधन की राजनीति के भीतर चल रहे तनाव को उजागर कर दिया है। खासकर AGP अध्यक्ष और मंत्री अतुल बोरा के खिलाफ उठ रही आवाजें केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि पार्टी की दिशा और उसके मूल विचारों पर सवाल खड़े कर रही हैं।
असम आंदोलन से निकली थी अगप
AGP की स्थापना असम आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुई थी। यह वही आंदोलन था जिसने विदेशी घुसपैठ, खासकर बांग्लादेशी मुसलमानों के मुद्दे को केंद्र में रखा और जिसके बाद असम समझौते की नींव पड़ी। उस दौर में AGP को एक ऐसे दल के रूप में देखा गया था जो असमिया अस्मिता, भाषा, संस्कृति और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा करेगा।
लेकिन अब पार्टी पर आरोप लग रहे हैं कि वह अपने मूल एजेंडे से भटक चुकी है। आलोचकों का कहना है कि AGP अब उन क्षेत्रों और समुदायों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है, जिनके खिलाफ कभी उसने आंदोलन खड़ा किया था।
नए मुस्लिम चेहरों को लेकर विवाद
पार्टी के कुछ नए मुस्लिम चेहरों को लेकर विरोध जताया जा रहा है। विरोध करने वालों का तर्क है कि जिन ताकतों को कभी असम आंदोलन के दौरान “बाहरी” या “असमिया हितों के खिलाफ” माना जाता था, अब वही लोग AGP के माध्यम से सत्ता के ढांचे में जगह बना सकते हैं।
यह आरोप केवल सामाजिक या सांस्कृतिक नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। आलोचकों को लगता है कि यदि ऐसे नेता चुनाव जीतकर आते हैं, तो भविष्य में वे मंत्री पद, बोर्ड-निगमों में स्थान या सत्ता में हिस्सेदारी की मांग कर सकते हैं।
भाजपा और AGP के रिश्तों पर असर
AGP फिलहाल भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है। भाजपा की राजनीति लंबे समय से अवैध घुसपैठ और पहचान की राजनीति के मुद्दे पर आधारित रही है।
ऐसे में यदि AGP ऐसे नेताओं को आगे लाती है जिनकी पृष्ठभूमि भाजपा समर्थकों को असहज करती है, तो इससे गठबंधन के भीतर तनाव बढ़ सकता है। भाजपा के समर्थकों के बीच यह धारणा बन सकती है कि AGP ऐसे सामाजिक समूहों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने की कोशिश कर रही है, जिन्हें भाजपा सीधे तौर पर अपने मंच पर जगह नहीं दे पाती।
क्या AGP अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही है?
राजनीति केवल विचारधारा से नहीं चलती, बल्कि चुनावी गणित से भी चलती है। AGP पिछले कई वर्षों से लगातार कमजोर हुई है। पार्टी का जनाधार घटा है और कई पारंपरिक असमिया बहुल सीटों पर उसकी पकड़ खत्म हो चुकी है।
ऐसे में पार्टी नए सामाजिक समूहों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हो, यह भी संभव है। किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए अस्तित्व बचाने के लिए नए वोट बैंक की तलाश करना एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह रणनीति पार्टी के मूल समर्थकों को ही असहज करने लगे। AGP के पुराने समर्थक आज भी पार्टी को असम आंदोलन की विरासत के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि पार्टी अगर अपने मूल विचारों से बहुत ज्यादा समझौता करेगी, तो उसकी पहचान पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
आने वाले चुनावों में क्या होगा असर?
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर आने वाले चुनावों में देखने को मिल सकता है। अगर भाजपा समर्थक वर्ग AGP के फैसलों से नाराज होता है, तो इसका असर गठबंधन की सीटों और वोटों पर पड़ सकता है।
वहीं अगर AGP नए सामाजिक समीकरण बनाने में सफल हो जाती है, तो वह अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत भी कर सकती है। यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी अपने पुराने समर्थकों और नए सामाजिक आधार के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।
निष्कर्ष
यह विवाद केवल उम्मीदवारों या समुदाय विशेष को लेकर नहीं है। यह असम की राजनीति में पहचान, विचारधारा और सत्ता की रणनीति के बीच चल रही खींचतान का संकेत है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि Asom Gana Parishad अपनी पुरानी पहचान बचाती है या नए सामाजिक समीकरणों के जरिए खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश करती है।