पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल चुनावी हिंसा
पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है। लेकिन इस बार लगता है,, कि बंगाल के इतिहास में पहली बार कोई चुनाव इतनी शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ है। फिर भी मुर्शिदाबाद में सड़क पर कुछ घटनाएं हुईं, और शुभेन्दु सरकार, जो भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार हैं, उनके साथ भी मारपीट की घटना हुई। लेकिन अगर पश्चिम बंगाल के चुनावों के पिछले हिस्से को देखें, तो यह घटनाएं उसके सामने बहुत छोटी हैं, और इन पर तत्काल कार्रवाई भी की गई है।
इस बार कई उम्मीदवारों के साथ जो घटनाएं हुईं, उन पर त्वरित संज्ञान लिया गया। कुल मिलाकर, पहली बार मतदान इतना शांतिपूर्ण रहा है कि खून-खराबे या हिंसक घटनाओं की आवश्यकता नहीं पड़ी, जो अपने आप में ऐतिहासिक है। भारत के अन्य राज्यों के चुनावों में हिंसा आम बात रही है, लेकिन बंगाल में इस बार माहौल अलग दिखा। 2011 और 2021 में ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद भी चुनावी हिंसा देखने को मिली थी, लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से हिंसा पर नियंत्रण किया गया है, वह सराहनीय है। इस बार कहीं भी पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं महसूस की गई।
तमिलनाडु में मतदान
तमिलनाडु में भी मतदान के बाद किसी भी पोलिंग बूथ पर पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी, जिससे दोनों राज्यों ने एक मिसाल कायम की है। हमने आपको लगातार बताया कि किस प्रकार 508 सीटों पर पहले से ही परिणाम घोषित हो चुके हैं और 8480 ऐसी सीटें थीं, जहाँ पर पिछले चुनाव में डीएमसी के बाहर भारतीय जनता पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी। इनमें से 250 सीटें ऐसी थीं, जहाँ हार-जीत का अंतर सिर्फ 8000 से भी कम वोटों का था। उदाहरण के तौर पर, नंदीग्राम जहाँ ममता बनर्जी को मात्र 1970 वोटों से हार मिली थी, वहीँ 2012 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने वहाँ अच्छा प्रदर्शन किया।
पिछले चुनावों में 25 ऐसी सीटें थीं जो सीधे-सीधे भाजपा के पक्ष में गईं, जहाँ पर हार-जीत का अंतर बहुत कम था। 11 ऐसी सीटें भी थीं, जहाँ पिछली बार कांग्रेस, लेफ्ट या ओवैसी ने बेहतर प्रदर्शन किया था। इन सीटों पर अब भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 100 से 105 सीटें ऐसी हैं, जहाँ कड़ा मुकाबला है। शहरी कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्रों में भी मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है।
डर का माहौल समाप्त
डर का माहौल अब समाप्त हो चुका है। बंगाल ने इस बार यह दिखा दिया है कि शांतिपूर्ण मतदान भी संभव है। इस बार लोग विश्वास के साथ घर से बाहर निकले हैं, जिससे मतदान प्रतिशत भी बढ़ा है। पहले चरण के मतदान ने व्यवस्थाओं के प्रति लोगों के विश्वास को और मजबूत किया है और अब यह बदलाव का दौर पूरे राज्य में महसूस किया जा रहा है।
पहले चरण के मतदान के बाद अब दूसरे चरण में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। जिन इलाकों में पहले चरण में केंद्रीय बल तैनात थे, वहाँ का अनुभव देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सुरक्षा बलों को बिना किसी समय सीमा के बंगाल में तैनात रखा जाए। यह चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की संयुक्त कोशिशों का ही नतीजा है कि पहला चरण शांतिपूर्वक संपन्न हुआ।
दूसरे चरण में मतदान
दूसरे चरण में 122 सीटें हैं, जहाँ भाजपा की कुछ कमजोरियां उजागर हो सकती हैं, लेकिन बंगाल में परिवर्तन की चाहत अब लोगों में साफ नजर आ रही है। शहरी और मध्यवर्ग के लोग इस बार बदलाव के लिए आगे आ रहे हैं। बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना जैसे मुद्दे इस बार चुनाव के केंद्र में हैं।
पोस्ट पोल हिंसा की आशंका को देखते हुए चुनाव आयोग ने सख्त प्रबंध किए हैं। चाहे भाजपा सरकार बने या तृणमूल कांग्रेस फिर से सत्ता में लौटे, सबसे बड़ी बात यह है कि अब चुनावी हिंसा पर नियंत्रण पाया जा सका है, जो कि बंगाल के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने चुनाव प्रबंधन के लिए एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को जिम्मेदारी दी थी, जो चुनाव के अंतिम चरण में अपना काम छोड़कर चली गई। इससे पार्टी की आंतरिक व्यवस्थाओं में भी कमजोरी आ गई। इस बार भाजपा ने कई ऐसे प्रत्याशियों को टिकट दिया, जिन्हें तृणमूल ने बाहर कर दिया था, जिससे कई क्षेत्रों में सीधा मुकाबला देखने को मिला।
कुल मिलाकर, बंगाल का चुनाव अब बदलाव की ओर बढ़ रहा है। शहरी बंगाल में खासतौर से लोग इस बार चौंकाने वाले नतीजे दे सकते हैं। दूसरे चरण में भाजपा ने बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे को अपने प्रमुख मुद्दे बनाए हैं। आगामी परिणाम यह तय करेंगे कि सत्ता परिवर्तन की यह जमीन कितनी मजबूत साबित होती है।