पूनम शर्मा
स्कूलों में हमें यह पढ़ाया जाता है कि प्रकाश की गति की खोज सबसे पहले डेनमार्क के खगोलविद ओले क्रिस्टेंसेन रोमर ने 1676 में की थी। यह भी माना जाता है कि गैलीलियो और न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक भी प्रकाश की गति को मापने में सफल नहीं हो पाए थे। गैलीलियो यह तो समझ गए थे कि ब्रह्मांड में प्रकाश की गति सबसे तेज है, लेकिन उन्होंने इसका वास्तविक वेग कभी ज्ञात नहीं किया।
महर्षि सायण द्वारा की गई अद्भुत गणना
परन्तु चौंकाने वाली बात यह है कि वेदों के महान भाष्यकार महर्षि सायण ने 14वीं सदी में ही ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50वें सूक्त के चौथे श्लोक के आधार पर प्रकाश की गति की गणना कर डाली थी।
ऋग्वेद का वह श्लोक कहता है:
“तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य।
विश्वमा भासि रोचनम्॥”
(ऋग्वेद 1.50.4)
अर्थात, हे सूर्य, तुम तेज गति से गति करने वाले, सुंदर और जगत को प्रकाशित करने वाले हो।
महर्षि सायण की टीका में उल्लेख है:
“तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥”
(सायण ऋग्वेद भाष्य 1.50.4)
अर्थ: आधे निमिष में 2202 योजन की दूरी तय करने वाले सूर्य को नमस्कार।
निमिष और योजना की प्राचीन इकाइयाँ
इस गणना को समझने के लिए समय और दूरी की प्राचीन इकाइयों को जानना आवश्यक है।
निमिष:
मनुस्मृति के अनुसार, निमिष वह समय है जो पलक झपकने में लगता है। 18 निमिष = 1 काष्ठ, 30 काष्ठ = 1 कला, 30 कला = 1 मुहूर्त, और 30 मुहूर्त = 1 दिन (लगभग 24 घंटे)।
इस प्रकार, 1 दिन में कुल निमिष होते हैं:
24×30×30×18=4,86,000 निमिष।
मौजूदा समय माप के अनुसार 1 दिन में सेकंड होते हैं:
24×60×60=86,400 सेकंड।
इसलिए,
1 निमिष = 86,4004,86,000=0.17778 सेकंड।
अर्ध निमिष = 0.17778/2=0.08889 सेकंड।
योजना:
भगवतम और अन्य ग्रंथों के अनुसार, 1 योजना लगभग 8 मील के बराबर है।
इसलिए, 2202 योजना = 2202×8=17,616 मील।
प्राचीन गणना से प्रकाश की गति
ऋग्वेद के अनुसार सूर्य का प्रकाश आधे निमिष में 2202 योजना तय करता है। इसे आधुनिक इकाइयों में परिवर्तित करें तो:
गति = दूरी / समय = 17,616 मील / 0.08889 सेकंड ≈ 198,177 मील प्रति सेकंड।
वहीं, आधुनिक विज्ञान प्रकाश की गति को लगभग 186,000 मील प्रति सेकंड बताता है।
निष्कर्ष: प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान
यह अद्भुत संगति दर्शाती है कि प्रकाश की गति का ज्ञान भारत में पश्चिमी खोज से हजारों वर्ष पहले संभव था। जब पश्चिमी सभ्यता अपने प्रारंभिक चरणों में थी, तब हमारे ऋषि-मुनि खगोलशास्त्र और विज्ञान की गहराइयों को समझ रहे थे।
ऋग्वेद मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है, और इसमें निहित वैज्ञानिक ज्ञान हमारे प्राचीन वैदिक सभ्यता की महानता को प्रमाणित करता है।
इस ज्ञान को जानकर हमें अपने सनातन धर्म और वेदों पर गर्व महसूस करना चाहिए।