जंतर-मंतर से गाली: लोकतंत्र की मर्यादा और महिला

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पूनम शर्मा

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का विशेष स्थान है। यह नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार देता है। लेकिन हाल ही में जंतर-मंतर पर जो दृश्य देखने को मिला, वह न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन था, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय है। विरोध के नाम पर अभद्र भाषा, विशेषकर महिलाओं के लिए, न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि समाज को विभाजित करने वाली शक्तियों के इशारे पर किया गया कृत्य प्रतीत होता है।अभद्र भाषा: समाज पर असर

अभद्र भाषा न केवल व्यक्तिगत स्तर पर अपमानजनक होती है, बल्कि समाज में नफरत, भेदभाव और असहिष्णुता को बढ़ावा देती है।

जब किसी मंच से माँ, बहन या महिला अंगों से जुड़ी गालियाँ दी जाती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति या समूह का नहीं, बल्कि पूरे समाज का अपमान है।

इससे महिलाओं के प्रति समाज के दृष्टिकोण में गिरावट आती है और उन्हें असुरक्षित महसूस कराया जाता है।

राजनीतिक समर्थन और जिम्मेदारी

दुख की बात है कि विपक्ष के राजनीतिक दलों और नेताओं ने न केवल ऐसे कृत्यों का समर्थन किया, बल्कि विरोध स्वरूप भी कोई कड़ा बयान नहीं दिया।

लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह समाज में हो रहे गलत कार्यों की निंदा करे, लेकिन यहाँ यह भूमिका पूरी तरह नदारद रही।

इससे यह संदेश जाता है कि  देश की विपक्ष की राजनीति में नैतिकता और आदर्शों का स्थान ही समाप्त होता जा रहा है।

पहले के विरोध बनाम आज के प्रदर्शन

भारत में पहले भी कई बड़े विरोध हुए—चाहे वह आजादी की लड़ाई हो या हाल के वर्षों के सामाजिक आंदोलन।

उन आंदोलनों में संवेदनशीलता, संयम और मर्यादा थी, जिससे समाज को प्रेरणा मिली।

लेकिन जंतर-मंतर पर दिखा दृश्य, नेतृत्व के स्तर में गिरावट और अभद्रता की हद को पार करता है।

महिलाओं के विरुद्ध अभद्रता: सख्त कानून की जरूरत

महिलाओं के लिए अभद्र भाषा या यौनिक टिप्पणियाँ समाज के लिए कलंक हैं।

ऐसे मामलों में तुरंत और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति या समूह कानून के भय के बिना ऐसी हरकत न कर सके।

सरकार को चाहिए कि वह विशेष कानून बनाए, जिसमें निम्न बिंदु शामिल हों:

माँ, बहन या महिला अंगों को लेकर अभद्र भाषा बोलने पर कड़ी सजा हो और आधार कार्ड में एक character कार्ड से linked हो जिसमें मार्कर लगाएँ जाएँ जो सरकारी सुविधा  लोन इत्यादि के लिए बाधा हो l

ऐसे दोषियों के सरकारी लाभ, सब्सिडी, और योजनाओं से उन्हें वंचित किया जाए।

दोषियों की आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित किया जाए, जिससे उन्हें अपनी गलती का वास्तविक अहसास हो।

सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर ऐसी भाषा के लिए त्वरित कार्रवाई और जुर्माना सुनिश्चित किया जाए।

समाज की भूमिका

केवल कानून से ही बदलाव नहीं आएगा, समाज को भी अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव लाना होगा।

परिवार, स्कूल, और समाज को बच्चों को शुरू से ही सम्मानजनक भाषा और महिलाओं के प्रति आदर सिखाना चाहिए।

मीडिया और सिनेमा को भी जिम्मेदारी के साथ अपने कंटेंट में सुधार लाना चाहिए।

अभद्र भाषा और महिलाओं के प्रति असम्मान केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि समाजिक और नैतिक समस्या भी है। ऐसे कृत्यों के खिलाफ न केवल सख्त कानून बनना चाहिए, बल्कि समाज को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अगर हम अपने लोकतंत्र और संस्कृति को स्वस्थ बनाए रखना चाहते हैं, तो अभद्रता, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ, को कदापि बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। समय आ गया है कि हम सब मिलकर ऐसे कृत्यों की कड़ी निंदा करें और बेहतर समाज निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाएँ।

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