MBBS : पहली बार निजी मेडिकल कॉलेजों में सरकारी संस्थानों से अधिक सीटें

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पूनम शर्मा 

भारत  में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। वर्ष 2026-27 के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा जारी सीट मैट्रिक्स के अनुसार देश में पहली बार निजी मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध MBBS सीटों की संख्या सरकारी मेडिकल कॉलेजों से अधिक हो गई है। यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में मेडिकल शिक्षा की पहुंच, गुणवत्ता और सबसे महत्वपूर्ण—उसकी लागत—को लेकर नई बहस भी शुरू कर रहा है।

देश में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से पिछले एक दशक में मेडिकल कॉलेजों और MBBS सीटों में लगातार वृद्धि हुई है। हालांकि, सीटों के इस विस्तार का बड़ा हिस्सा अब निजी संस्थानों के माध्यम से हो रहा है, जिससे मेडिकल शिक्षा आम छात्रों के लिए पहले की तुलना में अधिक महंगी होती जा रही है।

1.36 लाख से अधिक हुईं MBBS सीटें

शैक्षणिक सत्र 2026-27 में भारत में कुल 1,36,939 MBBS सीटें उपलब्ध हैं, जो देश के 823 मेडिकल कॉलेजों में वितरित हैं। इनमें 73,643 सीटें (करीब 54 प्रतिशत) निजी मेडिकल कॉलेजों में हैं, जबकि 63,296 सीटें (करीब 46 प्रतिशत) सरकारी मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध हैं। यह पहला अवसर है जब देश में निजी क्षेत्र के पास सरकारी संस्थानों की तुलना में अधिक MBBS सीटें हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिवर्तन भारतीय चिकित्सा शिक्षा के ढांचे में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

इस वर्ष जोड़ी गई अधिकांश सीटें निजी क्षेत्र में

2026-27 के लिए कुल 9,911 नई MBBS सीटें जोड़ी गई हैं। इनमें से 7,800 सीटें (79 प्रतिशत) निजी मेडिकल कॉलेजों में और केवल 2,111 सीटें (21 प्रतिशत) सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बढ़ाई गई हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मेडिकल शिक्षा के विस्तार की गति अब मुख्य रूप से निजी निवेश पर निर्भर होती जा रही है। इससे सीटों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा की लागत भी तेजी से बढ़ रही है।

पिछले दस वर्षों में दोगुनी से अधिक हुई सीटें

भारत में वर्ष 2014-15 में MBBS की कुल 51,348 सीटें थीं। पिछले दस वर्षों में यह संख्या बढ़कर 1,36,939 तक पहुंच गई है। यह लगभग ढाई गुना वृद्धि है।

हर वर्ष सीटों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 2019-20 में सीटें 80 हजार के पार पहुंचीं, 2020-21 में 91 हजार से अधिक हुईं और 2024-25 तक यह संख्या 1.18 लाख के करीब पहुंच गई। अब 2026-27 में देश ने 1.36 लाख से अधिक सीटों का नया रिकॉर्ड बनाया है। स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि यह विस्तार भविष्य में डॉक्टरों की कमी को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

सरकारी और निजी मेडिकल शिक्षा में बड़ा आर्थिक अंतर

सीटों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ सबसे बड़ी चिंता मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत को लेकर सामने आ रही है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की वार्षिक फीस सामान्यतः 5 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक होती है। पूरे साढ़े पांच वर्षीय पाठ्यक्रम की ट्यूशन फीस अधिकांश राज्यों में 25 हजार रुपये से लगभग 5 लाख रुपये के बीच रहती है। तमिलनाडु, केरल और दिल्ली जैसे राज्यों में यह खर्च और भी कम है। इसके विपरीत निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस कई गुना अधिक है। सरकारी कोटा की सीटों पर भी वार्षिक फीस 3 लाख से 12 लाख रुपये तक हो सकती है। वहीं प्रबंधन कोटा या डीम्ड विश्वविद्यालयों में यह शुल्क 12 लाख से 30 लाख रुपये प्रति वर्ष तक पहुंच जाता है।

यदि हॉस्टल, भोजन और अन्य खर्चों को जोड़ दिया जाए तो निजी मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई पूरी करने की कुल लागत 25 लाख रुपये से लेकर 1.5 करोड़ रुपये या उससे अधिक तक पहुंच सकती है।

विशेषज्ञों ने जताई बढ़ती लागत पर चिंता

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रवि एस. वानखेड़कर के अनुसार, भारत में MBBS सीटों का निजी क्षेत्र की ओर झुकाव पिछले कुछ वर्षों से लगातार दिखाई दे रहा था, लेकिन अब यह स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है। उनका कहना है कि सीटों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक है, क्योंकि इससे अधिक छात्रों को चिकित्सा शिक्षा का अवसर मिलेगा। लेकिन यदि अधिकांश सीटें निजी संस्थानों में होंगी और उनकी फीस अत्यधिक रहेगी, तो आर्थिक रूप से कमजोर एवं मध्यम वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए डॉक्टर बनने का सपना कठिन हो सकता है।

बदलता संतुलन क्या संकेत देता है?

कुछ वर्ष पहले तक सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS सीटों की संख्या निजी कॉलेजों से अधिक थी। वर्ष 2022-23 में लगभग 52 प्रतिशत सीटें सरकारी संस्थानों में थीं। इसके बाद दोनों के बीच का अंतर लगातार कम होता गया। वर्ष 2024-25 तक दोनों लगभग बराबरी पर पहुंच गए और 2025-26 में निजी मेडिकल कॉलेजों ने पहली बार सरकारी संस्थानों को पीछे छोड़ दिया। 2026-27 में यह बढ़त और स्पष्ट हो गई है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि आने वाले वर्षों में यदि सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और सीटों का विस्तार पर्याप्त गति से नहीं हुआ, तो भारत की चिकित्सा शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के नियंत्रण में चला जाएगा।

क्या सीटें बढ़ना ही पर्याप्त है?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल MBBS सीटों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि योग्य छात्र आर्थिक स्थिति के कारण चिकित्सा शिक्षा से वंचित न रहें। यदि निजी कॉलेजों की फीस पर प्रभावी नियमन, छात्रवृत्ति, शिक्षा ऋण और सरकारी सहायता की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई, तो सीटों में वृद्धि का लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट सकता है।

निष्कर्ष

भारत में MBBS सीटों का रिकॉर्ड विस्तार स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत है और इससे भविष्य में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन पहली बार निजी मेडिकल कॉलेजों का सरकारी संस्थानों से आगे निकलना यह भी दर्शाता है कि चिकित्सा शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डॉक्टर बनने का अवसर केवल आर्थिक रूप से सक्षम छात्रों तक सीमित न रह जाए, बल्कि हर प्रतिभाशाली विद्यार्थी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो।

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