राजेंद्र माथुर मेमोरियल लेक्चर में गूंजे सिनेमा के मुद्दे

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के कार्यक्रम में तिग्मांशु धूलिया ने फिल्मों में कॉरपोरेट संस्कृति, सेंसरशिप और बदलती पत्रकारिता पर रखे तीखे विचार।

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  • एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा नई दिल्ली में ‘राजेंद्र माथुर मेमोरियल लेक्चर 2026’ का आयोजन किया गया।
  • मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात लेखक, निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने मीडिया, सिनेमा, सेंसरशिप और कॉरपोरेट जगत पर खुलकर अपने विचार रखे।
  • कार्यक्रम के दौरान फिल्मों में कॉरपोरेटाइजेशन, समाज में बढ़ती इस्लामफोबिया और वैचारिक विमर्श पर गंभीर चर्चा की गई।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 6 सितंबर: भारतीय पत्रकारिता के पुरोधा और नवभारत टाइम्स के पूर्व मुख्य संपादक स्व. राजेंद्र माथुर की स्मृति में ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (EGI) द्वारा हर वर्ष आयोजित होने वाला प्रतिष्ठित ‘राजेंद्र माथुर मेमोरियल लेक्चर’ इस वर्ष 4 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के होटल एंबेसडर स्थित ‘द डोम’ में भव्य रूप से संपन्न हुआ। इस गरिमामयी कार्यक्रम में देश भर से जाने-माने पत्रकार, मीडियाकर्मी, शिक्षाविद् और साहित्यकार एकत्र हुए। इस वर्ष के कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात फिल्मकार, लेखक और अभिनेता श्री तिग्मांशु धूलिया ने शिरकत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता गिल्ड के अध्यक्ष संजय कपूर ने की, जबकि संचालन और स्वागत टिप्पणियों में वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष और गिल्ड के महासचिव राघवन श्रीनिवासन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संगोष्ठी का मुख्य केंद्रबिंदु मीडिया के वर्तमान स्वरूप और सिनेमा जगत पर उसके पड़ रहे प्रभावों का गहन विश्लेषण करना था।

संपादकों और वक्ताओं के तीखे और सारगर्भित विचार

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संजय कपूर ने आज के दौर में मीडिया की निष्पक्षता और जनता के बीच उसकी बदलती छवि पर खुलकर बात की। उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक भावनाओं का हवाला देते हुए कहा कि आज जनता मीडिया को लेकर गंभीर सवाल उठा रही है और मीडिया की पहचान जनमानस में किस रूप में बदल चुकी है, यह किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हमें यह गहराई से देखना होगा कि कैसे मीडिया के गिरते मानक अन्य क्षेत्रों, विशेष रूप से सिनेमा और कला जगत को प्रभावित कर रहे हैं।

स्वागत वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ पत्रकार और सत्य हिंदी के संपादकीय निदेशक आशुतोष ने राजेंद्र माथुर को याद करते हुए उन्हें भारतीय पत्रकारिता का “कबीर” बताया, जो राजनीतिक और धार्मिक दायरे से परे रहकर हमेशा निर्भीक सत्य और लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर रहे। उन्होंने वर्ष 1990 के बाद से बदलते मीडिया परिदृश्य पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि देश दो मुख्य स्तंभों पर टिका है, तो वह न्यायपालिका और पत्रकारिता है। उन्होंने वर्तमान संस्थाओं की स्थिति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि आप ‘मीडिया और फिल्म उद्योग’ की मौजूदा दशा देखना चाहते हैं, तो इसे पलटकर ‘राज्य का मीडिया और फिल्मों का उद्योग’ कहिए, आपको सारे उत्तर स्वतः मिल जाएंगे।

सिनेमा में कॉरपोरेटाइजेशन और खत्म होती कहानियां

मुख्य वक्ता के रूप में अपने बहुप्रतीक्षित संबोधन में तिग्मांशु धूलिया ने “मीडिया और फिल्म उद्योग की स्थिति” विषय पर बोलते हुए आज के मनोरंजन जगत की अंदरूनी सच्चाइयों को बेबाकी से रखा। फिल्मों में कॉरपोरेट संस्कृति के प्रवेश पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि जब से कॉरपोरेट घराने फिल्म उद्योग में आए हैं, तब से उन्होंने हर कला और रचनात्मकता को केवल ‘नंबर’ और मुनाफे के आंकड़ों के चश्मे से देखना शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “फिल्में अब कहानियों से खाली हो चुकी हैं। सबसे पहले तो अच्छे कहानीकार ही गायब हो गए हैं, और जो लोग आज भी कहानियां कहना चाहते हैं, उन्हें सिस्टम द्वारा काम करने की अनुमति नहीं दी जाती है।”

उन्होंने पूंजीवाद और व्यावसायिकता के बीच के संघर्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि जब अति-पूंजीवाद (Extreme Capitalism) अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तो यही सब परिणाम सामने आते हैं। इस प्रकार की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था इंसान की मौलिकता और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कैसे हिंदी सिनेमा ने अतीत में ‘हिदुस्तानी’ भाषा का एक ऐसा सुंदर और सुलभ रूप अपनाया था, जिसमें हिंदी और उर्दू के शब्दों का अनूठा मेल था, जिसे देश के कोने-कोने में आसानी से समझा और सराहा जाता था।

समाज से फिल्म इंडस्ट्री में आई इस्लामफोबिया की समस्या

कार्यक्रम के दौरान प्रश्नोत्तर (Q&A) सत्र में जब वरिष्ठ पत्रकार और ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के पूर्व संपादक प्रंजॉय गुहा ठाकुरता ने यह सवाल पूछा कि क्या मुंबई फिल्म उद्योग (बॉलीवुड) के अंदर भी इस्लामफोबिया ने अपनी जड़ें जमा ली हैं, तो इस पर तिग्मांशु धूलिया ने अत्यंत बेबाक और यथार्थवादी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि “इस्लामफोबिया केवल फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज में फैल चुका है। फिल्म इंडस्ट्री कोई माउंट एवरेस्ट पर बसा हुआ अलग और अछूता द्वीप नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि इंडस्ट्री में बिना किसी प्रवेश परीक्षा (Entrance Exam) के कोई भी अनाड़ी या अकुशल श्रम आ सकता है, जिसके कारण समाज की बीमारियां और पूर्वाग्रह फिल्मों में भी रिसकर आने लगे हैं। चूंकि फिल्मकार ‘संवेदनशील’ लोग माने जाते हैं, इसलिए उद्योग के भीतर यह प्रवृत्ति कम होनी चाहिए थी, लेकिन समाज का प्रदूषण यहां भी साफ दिखाई दे रहा है।

सेंसरशिप, आत्म-सेंसरशिप और वैचारिक स्वतंत्रता का संकट

लेखन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बोलते हुए जब उनसे पूछा गया कि क्या आज के समय में एफआईआर (FIR) या कानूनी मुकदमों के डर से स्क्रिप्ट राइटिंग प्रभावित हो रही है, तो उन्होंने स्वीकार किया कि पहले की तुलना में स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि उन्हें वर्तमान माहौल में कोई विचार अचानक आए और वे सहज रूप से कोई संवेदनशील संवाद लिखना चाहें, तो उन्हें कलम उठाने से पहले कम से कम दो बार जरूर सोचना पड़ेगा।

राजनीतिक प्रचार (Propaganda) और फिल्मों में विचारधारा के प्रभाव पर पूछे गए एक अन्य सवाल के जवाब में श्री धूलिया ने दो टूक शब्दों में कहा कि “फिल्म की विचारधारा चाहे जो भी हो, यदि उसका शिल्प (Craft) और निर्देशक की दृढ़ता (Conviction) कमजोर है, तो वह फिल्म कभी सफल नहीं हो सकती। फिल्में किसी विचारधारा के बूते पर नहीं चलतीं, बल्कि वे शानदार क्राफ्ट और दमदार कंटेंट के दम पर ही दर्शकों के दिलों पर राज करती हैं।” उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए राज्य के समर्थन की आवश्यकता पर भी जोर दिया और पं. जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में स्थापित ‘फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ (NFDC) की सराहना की, जिसने गोविंद निहलानी की ‘पार्टी’ जैसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली फिल्मों को आर्थिक मदद दी थी। इसके साथ ही उन्होंने कड़े सेंसरशिप के बावजूद अपनी समृद्ध कलात्मक परंपरा को जीवित रखने वाले ईरानी सिनेमा की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

निडर अभिव्यक्ति और भविष्य की दिशा

ध्रुवीकरण के इस दौर में अपनी स्वतंत्र पहचान और आवाज को कैसे सुरक्षित रखा जाए, इस पर अपने निजी अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि उनके परिवार के संस्कार और उनके बड़े भाई (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया) जैसे लोग उनके जीवन में एक मजबूत नैतिक आधार हैं। उन्होंने कहा कि यदि वे वैचारिक रूप से समझौता कर लें, तो वे अपने परिवार और खुद की नज़रों में कभी खड़े नहीं हो पाएंगे।

कार्यक्रम के अंत में एक विस्तृत और ज्ञानवर्धक प्रश्नोत्तर सत्र हुआ, जिसमें ऐतिहासिक सेंसरशिप, मकार्मथवाद (McCarthyism), डिजिटल मीडिया के मुद्रीकरण (Monetization) और कला के संरक्षण में सार्वजनिक संस्थाओं की भूमिका जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। अंत में, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव राघवन श्रीनिवासन ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए मुख्य वक्ता, आयोजकों, मीडिया साझीदारों और देश के कोने-कोने से पधारे सभी गणमान्य अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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