डॉ. विनय कुमार वर्मा
मनुष्य जब इस पृथ्वी पर आया, तब उसके पास न विद्यालय थे, न विश्वविद्यालय, न पाठ्यपुस्तकें और न ही डिग्रियाँ। फिर भी वह सीखता था। प्रकृति उसकी पहली पाठशाला थी, अनुभव उसकी पहली पुस्तक और जीवन उसका पहला शिक्षक। धीरे-धीरे सभ्यता विकसित हुई, ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होने लगा और तब जन्म हुआ उस व्यक्तित्व का, जिसे भारत ने केवल “शिक्षक” नहीं कहा, बल्कि “गुरु” कहा।
शिक्षक और गुरु- ये दोनों शब्द समान प्रतीत होते हैं, किंतु दोनों के अर्थ अलग हैं।
शिक्षक जानकारी देता है।
गुरु दृष्टि देता है।
शिक्षक पाठ पढ़ाता है।
गुरु जीवन पढ़ाता है।
शिक्षक परीक्षा की तैयारी कराता है।
गुरु जीवन की तैयारी कराता है।
इसीलिए भारतीय संस्कृति ने गुरु को माता-पिता से भी ऊँचा स्थान देते हुए कहा-
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।”
यह केवल श्लोक नहीं था; यह उस समाज की चेतना थी, जिसने समझ लिया था कि मनुष्य जन्म से नहीं, संस्कारों से मनुष्य बनता है और संस्कारों का सबसे बड़ा शिल्पी गुरु होता है।
एक समय था जब गुरुकुल छोड़ने के वर्षों बाद भी शिष्य अपने गुरु के चरणों में बैठकर स्वयं को धन्य समझता था। जीवन में चाहे जितनी ऊँचाइयाँ प्राप्त कर ले, गुरु के सामने उसका सिर स्वतः झुक जाता था। वह जानता था कि उसकी सफलता का पहला अक्षर किसी पुस्तक ने नहीं, किसी गुरु ने लिखा था।
आज भी गाँवों में कई वृद्ध अपने प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक को देखते ही खड़े हो जाते हैं। उनके पैर छूते हैं। आँखों में वही श्रद्धा उतर आती है, जो बचपन में थी। यह सम्मान वेतन का नहीं, व्यक्तित्व का था। यह पद का नहीं, प्रभाव का था।
लेकिन समय केवल कैलेंडर नहीं बदलता। वह शब्दों के अर्थ भी बदल देता है।
आज शिक्षा का अर्थ बदल रहा है। कल तक शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान था। आज उसका सबसे बड़ा उद्देश्य रोजगार बनता जा रहा है।
कल विद्यालय मनुष्य बनाने का स्थान था। आज वह कैरियर बनाने का केंद्र बनता जा रहा है।
कल पूछा जाता था-
“बच्चा कैसा मनुष्य बनेगा?”
आज पूछा जाता है-
“बच्चा क्या बनेगा?”
यह परिवर्तन केवल भाषा का नहीं है; पूरी शिक्षा-दृष्टि का परिवर्तन है।
जब शिक्षा का लक्ष्य बदलता है, तब शिक्षक का अर्थ भी बदलने लगता है।
धीरे-धीरे शिक्षक गुरु से प्रशिक्षक बना…
प्रशिक्षक से कर्मचारी…
और अनेक स्थानों पर कर्मचारी से “सर्विस प्रोवाइडर”।
अब विद्यार्थी और अभिभावक अनेक बार यह सोचकर विद्यालय आते हैं कि उन्होंने फीस दी है, इसलिए शिक्षा एक सेवा है और शिक्षक उस सेवा का प्रदाता। यहीं से संबंध बदलने लगते हैं। जहाँ पहले श्रद्धा थी, वहाँ लेन-देन आ जाता है। जहाँ पहले संवाद था, वहाँ अपेक्षाएँ आ जाती हैं। जहाँ पहले संस्कार थे, वहाँ परिणाम आ जाते हैं।
और जहाँ परिणाम ही अंतिम सत्य बन जाएँ, वहाँ व्यक्तित्व धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है।
यह परिवर्तन केवल विद्यार्थियों में नहीं आया।
शिक्षक भी बदल गए।
कभी अध्यापन उनका धर्म था। आज अनेक लोगों के लिए वह केवल नौकरी बनकर रह गया है। यह कटु सत्य है कि सरकारी विद्यालयों में आज भी हजारों ऐसे शिक्षक हैं, जो सीमित संसाधनों में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। उन्हीं की निष्ठा पर सरकारी शिक्षा का विश्वास टिका हुआ है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि अनेक स्थानों पर अध्यापन अब प्राथमिकता नहीं रहा। समय पर विद्यालय पहुँचना, पूरी तैयारी से पढ़ाना, प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता पहचानना, उसके व्यक्तित्व का निर्माण करना- ये सब धीरे-धीरे अपवाद बनने लगे हैं।
निजी विद्यालयों की स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है। वहाँ अनुशासन अधिक दिखाई देता है, परिणाम बेहतर दिखाई देते हैं, लेकिन अनेक बार शिक्षा का केंद्र भी मनुष्य नहीं, बाज़ार बन जाता है।
प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
रैंक बढ़े।
विज्ञापन बढ़े।
पर क्या उसी अनुपात में गुरु भी बढ़े?
यही वह प्रश्न है, जिसे पूछने का साहस शायद हमने खो दिया है।
आज शिक्षक दिवस पर यदि हम केवल शिक्षकों की प्रशंसा कर दें, तो यह आधा सत्य होगा। यदि केवल उनकी आलोचना करें, तो भी यह अन्याय होगा।
क्योंकि शिक्षक अकेले नहीं बदले।
समय ने शिक्षा बदली।
शिक्षा ने विद्यालय बदले।
विद्यालयों ने शिक्षक बदले।
और फिर शिक्षक, विद्यार्थी तथा अभिभावक- तीनों के रिश्तों के अर्थ बदलते चले गए। यही हमारे समय का सबसे बड़ा शैक्षिक प्रश्न है।
यदि परिवर्तन केवल शिक्षकों तक सीमित होता, तो शायद समस्या इतनी गंभीर न होती। लेकिन बदलते समय ने शिक्षा के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदल दिया है। आज शिक्षक, शिक्षार्थी, अभिभावक और विद्यालय- चारों बदल चुके हैं। इसलिए किसी एक को दोषी ठहरा देना आसान अवश्य है, पर न्यायसंगत नहीं।
सबसे पहले शिक्षार्थी बदल गया। एक समय विद्यार्थी विद्यालय केवल अंक लेने नहीं जाता था। वह अपने शिक्षक के व्यक्तित्व को भी पढ़ता था। उसकी चाल, उसका व्यवहार, उसकी वाणी, उसका अनुशासन, उसका धैर्य- सब कुछ शिक्षा का हिस्सा होता था। वह केवल गणित नहीं सीखता था, जीवन भी सीखता था। इसलिए गुरु कक्षा से बाहर भी गुरु ही रहता था। वर्षों बाद रास्ते में मिल जाए, तो विद्यार्थी सहज ही झुक जाता था। वह जानता था कि उसके व्यक्तित्व में जो कुछ भी अच्छा है, उसमें उसके गुरु का भी अंश है।
आज यह दृश्य तेजी से बदल रहा है।
अब विद्यार्थी का संबंध शिक्षक से अधिकतर उतने समय तक रहता है, जितनी देर तक कक्षा चलती है। परीक्षा समाप्त हुई, फीस समाप्त हुई, संबंध भी लगभग समाप्त हो गया। कई बच्चों के मन में अनजाने ही यह धारणा बैठ गई है कि “हम फीस देते हैं, इसलिए शिक्षक पढ़ाते हैं।”
जब संबंध का आधार श्रद्धा से बदलकर लेन-देन हो जाता है, तब गुरु धीरे-धीरे सेवा प्रदाता और विद्यार्थी ग्राहक में बदलने लगता है।
यह परिवर्तन केवल बच्चों का दोष नहीं है। उन्होंने वही सीखा है, जो समाज ने उन्हें सिखाया।
अभिभावकों की भूमिका भी पहले जैसी नहीं रही। एक समय माता-पिता शिक्षक से कहते थे- “गुरुजी, बच्चा आपका है। जहाँ आवश्यक हो, डाँटिए, समझाइए, सुधारिए।”
आज अनेक स्थानों पर स्थिति उलट गई है।
यदि शिक्षक ने बच्चे को कठोर शब्द कह दिया, अनुशासन के लिए टोका, मोबाइल छीन लिया या शरारत पर फटकार लगा दी, तो सबसे पहले प्रश्न शिक्षक पर उठता है।
धीरे-धीरे शिक्षक के हाथ से अनुशासन का अधिकार छिनता गया।
जिम्मेदारी बनी रही…
अधिकार समाप्त हो गए।
यह किसी भी व्यवस्था का सबसे कठिन संकट होता है। जिस व्यक्ति पर भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी हो, लेकिन सुधार करने का नैतिक अधिकार न हो, वह भीतर-ही-भीतर असहाय होने लगता है।
यहीं से शिक्षक का आत्मविश्वास टूटता है।
उधर विद्यालय भी बदल रहे थे। विद्यालयों पर परिणाम का दबाव बढ़ा। बोर्ड परीक्षा का दबाव। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव।अभिभावकों की अपेक्षाओं का दबाव। बाज़ार की प्रतिस्पर्धा का दबाव।
इन दबावों के बीच शिक्षा का अर्थ धीरे-धीरे “अच्छे अंक” में सिमटने लगा।
और इसी खाली स्थान में कोचिंग संस्कृति ने प्रवेश किया।
आरम्भ में कोचिंग शिक्षा की सहयोगी थी। जहाँ विद्यालय का समय कम पड़ता था, वहाँ कोचिंग अतिरिक्त अभ्यास देती थी। यह भूमिका उपयोगी थी।
संकट तब शुरू हुआ, जब सहयोगी ने स्वयं को विकल्प घोषित कर दिया।
धीरे-धीरे शहरों में यह वाक्य सामान्य हो गया-
“स्कूल में केवल नाम लिखाइए, पढ़ाई हमारे यहाँ होगी।”
इससे भी बड़ा दुर्भाग्य तब हुआ, जब कुछ विद्यालयों ने भी इस व्यवस्था को मौन स्वीकृति दे दी। कहीं समझौते हुए, कहीं अनौपचारिक गठजोड़ बने, कहीं उपस्थिति केवल कागज़ों तक सीमित रह गई। विद्यालय और कोचिंग के बीच ऐसी समानांतर व्यवस्था विकसित होने लगी, जिसमें सबसे बड़ा नुकसान बच्चे का हुआ।
वह विद्यालय में छात्र रहा…
कोचिंग में परीक्षार्थी बना…
लेकिन कहीं भी पूरा मनुष्य नहीं बन पाया।
विद्यालय खेल सिखाता था।
कोचिंग केवल प्रश्न हल कराती है। विद्यालय मित्र बनाता था। कोचिंग प्रतियोगी बनाती है।
विद्यालय व्यक्तित्व गढ़ता था। कोचिंग प्रदर्शन नापती है। दोनों की भूमिकाएँ अलग थीं।
जब एक ने दूसरे का स्थान लेना चाहा, तभी संतुलन बिगड़ गया।
आज एक और परिवर्तन हमारे सामने खड़ा है- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)।
बहुत संभव है कि आने वाले वर्षों में रोबोट पढ़ाएँ।
डिजिटल शिक्षक हों।
व्यक्तिगत एआई ट्यूटर हों।
वे एक ही पाठ को हजार तरीकों से समझा देंगे।
वे कभी थकेंगे नहीं।
कभी क्रोधित नहीं होंगे।
कभी वेतन नहीं माँगेंगे।
कभी अवकाश नहीं लेंगे।
लेकिन एक प्रश्न फिर भी शेष रहेगा-
क्या मशीन किसी बच्चे की आँखों में छिपी उदासी पढ़ सकेगी? क्या वह यह पहचान सकेगी कि आज यह बच्चा पढ़ नहीं रहा, क्योंकि उसके घर में कल रात माता-पिता का झगड़ा हुआ था?
क्या वह यह समझ सकेगी कि किसी छात्र को अंक नहीं, आत्मविश्वास की आवश्यकता है?
शायद नहीं।
क्योंकि जानकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता दे सकती है…
संवेदना केवल जीवित शिक्षक दे सकता है।
यही वह अंतर है, जिसे कोई तकनीक कभी पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाएगी।
शिक्षक दिवस केवल पुष्प, मालाएँ, भाषण और सम्मान का अवसर नहीं है। यह स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछने का दिन भी है-
क्या हम अभी भी गुरु की आवश्यकता महसूस करते हैं, या हमें केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति चाहिए?
इन दोनों प्रश्नों के उत्तर अलग-अलग हैं। पढ़ाने वाला व्यक्ति जानकारी देता है।गुरु जीवन की दिशा देता है।
आज पूरी दुनिया “ज्ञान-विस्फोट” के युग में प्रवेश कर चुकी है। एक मोबाइल फ़ोन में जितनी जानकारी उपलब्ध है, उतनी शायद किसी प्राचीन पुस्तकालय में भी नहीं थी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में उत्तर दे देती है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पूरी दुनिया के श्रेष्ठ व्याख्यान घर बैठे उपलब्ध करा देते हैं। आने वाले समय में संभव है कि कक्षा में एक कृत्रिम शिक्षक खड़ा हो, जो कभी थके नहीं, कभी गलती न करे, कभी छुट्टी न ले और हर विद्यार्थी की गति के अनुसार पढ़ाए।
पर तब भी एक प्रश्न रहेगा-
क्या वह प्रेरणा देगा?
क्या वह किसी असफल छात्र के कंधे पर हाथ रखकर कह सकेगा—”मुझे तुम पर विश्वास है?”
क्या वह किसी बालक की आँखों में छिपे आँसू पढ़ सकेगा?
क्या वह किसी उद्दंड विद्यार्थी के भीतर छिपे अच्छे मनुष्य को पहचान सकेगा?
क्या वह अपने चरित्र से शिक्षा देगा?
शायद नहीं।
क्योंकि मशीन सूचना दे सकती है…
मनुष्य ही संस्कार दे सकता है।
यही शिक्षक और तकनीक के बीच सबसे बड़ा अंतर है।
लेकिन यह अंतर तभी बचेगा, जब शिक्षक स्वयं भी अपने भीतर के गुरु को जीवित रखेंगे। यदि शिक्षक केवल नौकरी करेगा, तो एक दिन मशीन सचमुच उसका स्थान ले लेगी।
पर यदि शिक्षक बच्चों के भीतर जिज्ञासा, चरित्र, करुणा, आत्मविश्वास और जीवन-दृष्टि जगाएगा, तो उसे कोई तकनीक प्रतिस्थापित नहीं कर सकेगी।
यह आत्ममंथन केवल शिक्षकों का नहीं है। समाज का भी है। अभिभावकों को भी स्वयं से पूछना होगा-
क्या वे अपने बच्चों के सामने शिक्षक का सम्मान करते हैं? या हर छोटी-बड़ी बात पर शिक्षक को कटघरे में खड़ा कर देते हैं? बच्चों के सामने शिक्षक का अपमान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं होता; वह शिक्षा के प्रति सम्मान की हत्या होती है।
विद्यार्थियों को भी सोचना होगा- क्या शिक्षक केवल परीक्षा पास कराने वाला व्यक्ति है?
या वह उस जीवन का सहयात्री है, जिसकी बदौलत वे भविष्य में अपने पैरों पर खड़े होंगे?
और शिक्षकों को भी यह स्वीकार करना होगा कि सम्मान केवल पद से नहीं मिलता। सम्मान अर्जित करना पड़ता है।
विद्यार्थी आज भी उस शिक्षक को जीवनभर याद रखते हैं, जिसने उन्हें केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन का साहस सिखाया। जिसने उनकी प्रतिभा पर विश्वास किया। जिसने उन्हें गिरने पर उठाया।
जिसने कहा-
“तुम कर सकते हो।”
ऐसे शिक्षक कभी पुराने नहीं होते। उनकी कक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं… उनका प्रभाव नहीं।
भारत का भविष्य नई शिक्षा नीति से बनेगा… नई तकनीक से भी बनेगा… नई प्रयोगशालाओं से भी बनेगा… लेकिन उससे पहले वह उन शिक्षकों से बनेगा, जिनकी आँखों में अभी भी बच्चों के लिए सपने हैं।
एक राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी इमारतें नहीं होतीं। उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसके शिक्षक होते हैं।
क्योंकि सैनिक सीमा की रक्षा करते हैं…
वैज्ञानिक भविष्य की…
राजनेता व्यवस्था की…
पर शिक्षक…
शिक्षक उन सबको तैयार करता है।
इसलिए यदि शिक्षक कमजोर होगा, तो भविष्य भी कमजोर होगा।
यदि शिक्षक केवल कर्मचारी बन जाएगा, तो शिक्षा केवल व्यवस्था बनकर रह जाएगी।
और यदि शिक्षक फिर से गुरु बन गया… तो शिक्षा फिर से राष्ट्रनिर्माण का सबसे बड़ा माध्यम बन जाएगी।
शायद हमें शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का सम्मान करने से पहले “शिक्षक” शब्द का सम्मान लौटाना होगा।
क्योंकि शब्द बदलते ही समाज बदल जाता है।
एक समय था, जब बच्चे कहते थे-
“ये मेरे गुरुजी हैं।”
आज वे कहते हैं-
“ये हमारे टीचर हैं।”
शब्द छोटा परिवर्तन लगता है…
लेकिन कई बार सभ्यताओं का इतिहास ऐसे ही छोटे परिवर्तनों से लिखा जाता है।
आइए, इस शिक्षक दिवस पर केवल शिक्षकों का अभिनंदन न करें।
हम शिक्षा के उस प्राणतत्त्व को पुनर्जीवित करने का संकल्प लें, जहाँ विद्यालय केवल नौकरी की तैयारी का केंद्र न हो, बल्कि जीवन की तैयारी का भी स्थान बने।
जहाँ अभिभावक शिक्षक पर विश्वास करें।
शिक्षक अपने उत्तरदायित्व को तपस्या मानें।
विद्यार्थी अपने गुरु में केवल विषय-विशेषज्ञ नहीं, जीवन-पथ प्रदर्शक देखें।
और समाज यह स्वीकार करे कि-
अच्छे विद्यालय भवनों से नहीं बनते…
अच्छे शिक्षक भवनों को विद्यालय बना देते हैं।
क्योंकि…
पुस्तकें ज्ञान दे सकती हैं।
तकनीक कौशल दे सकती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर दे सकती है।
लेकिन मनुष्य बनाने का सामर्थ्य आज भी केवल एक सच्चे शिक्षक के पास है।
और जब तक ऐसा शिक्षक इस धरती पर है…
तब तक शिक्षा केवल एक व्यवस्था नहीं,
एक संस्कृति बनी रहेगी।