सांस्कृतिक मोर्चे पर क्यों पिछड़ गई भाजपा?
प्रसिद्ध विद्वान डॉ. भारत गुप्त का तीखा विश्लेषण, कहा- वैचारिक संस्थाओं में योग्य नेतृत्व की कमी और सांस्कृतिक पहचान का संकट सबसे बड़ी चुनौती।
- प्रसिद्ध लेखक और विचारक डॉ. भारत गुप्त ने भाजपा सरकार की सांस्कृतिक नीतियों और बौद्धिक संस्थानों की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
- उनके अनुसार, सड़कों और बुनियादी ढांचे के विकास के बावजूद भाजपा सांस्कृतिक मोर्चे और वैचारिक संस्थाओं के प्रबंधन में असफल रही है।
- विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में योग्य विद्वानों के बजाय कम काबिल और राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों को अहम पदों पर बैठाया गया है।
भारतीय राजनीतिक गलियारों और वैचारिक जगत में इन दिनों जाने-माने लेखक एवं विचारक डॉ. भारत गुप्त का एक गंभीर विश्लेषण तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने अपने लेख और विचारों के माध्यम से यह रेखांकित किया है कि वर्ष 2014 के बाद से देश में सड़कों के निर्माण, गैस कनेक्शन, जन धन योजना और केंद्रीय विस्टा जैसी बड़ी भौतिक और बुनियादी ढांचागत परियोजनाएं तो तेजी से पूरी हुई हैं, लेकिन वैचारिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर सरकार को भारी निराशा हाथ लगी है। डॉ. गुप्त के अनुसार, आज भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट उसकी एक बड़ी ‘सांस्कृतिक पहचानहीनता’ (Cultural Facelessness) का है, क्योंकि उसका ‘सबका साथ’ का नारा कांग्रेस की पुरानी ‘कंपोजिट कल्चर’ और इफ्तार पार्टी वाली राजनीति की ही एक प्रतिलिपि बनकर रह गया है।
सांस्कृतिक संस्थानों में नेतृत्व और नियुक्तियों का अकाल
लेख में इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया गया है कि पिछले एक दशक में सरकार ने टॉक शो, पुस्तक विमोचन और भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) सम्मेलनों पर भारी-भरकम राशि खर्च की है, लेकिन कला और संस्कृति के दीर्घकालिक संस्थानों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। स्थिति यह है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS शिमला) और कलाक्षेत्र जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थान वर्षों से बिना अध्यक्ष और स्थायी शासी निकायों (Governing Bodies) के चल रहे हैं। विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की गलत नियुक्तियों के कारण शैक्षणिक विभागों में निम्न स्तर के और कम योग्य लोगों का वर्चस्व बढ़ गया है, जिससे अकादमिक गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है।
विद्वानों और विचारकों के साथ तालमेल की कमी
डॉ. भारत गुप्त ने तुलना करते हुए बताया कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के पास कमला देवी, कपिला वात्स्यायन, करण सिंह, लोकेश चंद्र और टी.एन. मदान जैसे विद्वानों की एक ऐसी सशक्त टीम थी, जो सरकारी संस्थानों, संग्रहालयों और पुस्तकालयों का संचालन अपनी वैचारिक समझ के अनुसार पूरी दक्षता के साथ करती थी। इसके विपरीत, भाजपा और संघ परिवार पिछले 12 वर्षों में ऐसे लेखकों, प्रोफेसरों, वकीलों और इतिहासकारों का एक बड़ा और सक्षम वर्ग तैयार करने में पूरी तरह असफल रहे हैं जो कांग्रेस समर्थित पुरानी व्यवस्था का स्थान ले सकें। जब तक वैचारिक और शैक्षणिक संस्थाओं में सही और योग्य लोगों की नियुक्ति नहीं की जाएगी, तब तक किसी भी प्रकार का वास्तविक सांस्कृतिक परिवर्तन संभव नहीं है।