विजय पाल सिंह
जब एक आम आदमी किसी परिस्थिति में झुझलाता है, उकसाहट में आता है, कारण कुछ भी हो सकता है, किसी बहस में आपा खोता है, तो जुबान के सिरे पर सबसे पहले क्या आता है? कोई नसीहत का शब्द नहीं बल्कि एक गाली। वह गाली किसी विचार, किसी तर्क या उस व्यक्ति की गलती पर नहीं होती—वह सीधे जाकर गिरती है उसकी माँ, बेटी या बहन की देह पर।
ऐसे में अगर आप गाली देने वाले हैं या उस गाली का सीधा निशाना नहीं भी हैं, और एक पल को रुककर उस गाली रूपी हथियार के बारे में सोच लें—उसका कंटेंट क्या है, वह किसके बारे में है—तो बहुत संभव है कि आपको अपने ही भीतर एक घिनौनी असहजता घेर ले। सुबह जिसके पाँव छूकर घर से निकला था, शाम को किसी अजनबी से उलझते हुए उसी रिश्ते को सबसे निकृष्ट तरीके से अपनी जुबान पर उछाल रहा होता है, या उछलते हुए सहज भाव से सुन रहा होता है।
यह सिर्फ एक अकेले व्यक्ति का अंतर्द्वंद्व नहीं है; यह हम तमाम मर्दों के अवचेतन में बसी एक ऐसी सामूहिक सड़ांध है, जिसे हम अपनी मर्दानगी का गहना समझकर पीढ़ियों से ढोते आ रहे हैं। हम सब भीतर से गालियों से लबालब भरे हुए हैं। हमारी हँसी में, हमारे गुस्से में, हमारे दोस्ताना मज़ाक में और हमारे सबसे गहरे टकराव में—हर जगह भाषा का केंद्र वही औरत है जिसे हम अपने ड्राइंग रूम में ‘देवी’, ‘मर्यादा’ और ‘घर की लक्ष्मी’ कहते नहीं थकते। यह गजब का दोगलापन है कि पूजते भी उसी को हैं, और जब ज़लील करने का औज़ार चुनना होता है, तो सालते भी उसी को हैं।
सिगमंड फ्रायड ने शायद इंसानी फितरत के एक कोने को छू लिया था जब उन्होंने कहा कि हमारे अचेतन मन में दमित यौन इच्छाएं (Libido) छटपटाती रहती हैं, और जैसे ही सामाजिक नियंत्रण ढीला पड़ता है, वे अनजाने रास्तों से फूट पड़ती हैं। लेकिन जब मैं अपनी और अपने समाज की इस आदत को खाटी देसी निगाह से देखता हूँ, तो फ्रायड का यह चश्मा मुझे बहुत छोटा और अधूरा लगता है। गाली केवल कामेच्छा का दमन नहीं है; गाली तो दरअसल सत्ता, मिल्कियत और वर्चस्व का शुद्ध प्रदर्शन है।
पितृसत्ता ने सदियों से एक बहुत शातिर खेल रचा है—उसने पुरुष की इज़्ज़त की पूरी तिजोरी उठाकर औरत की देह में बंद कर दी। जब दो मर्द टकराते हैं, तो वे एक-दूसरे की बुद्धि या क्षमता पर हमला नहीं करते, क्योंकि उन्हें पता है कि वहाँ चोट गहरी नहीं लगेगी। वे जानते हैं कि वार सीधे उस ‘कमज़ोर नस’ पर करना है जिसे समाज ने उस मर्द की जागीर घोषित कर रखा है। जब एक मर्द दूसरे को माँ-बहन की गाली देता है, तो वह वास्तव में यह ऐलान कर रहा होता है कि ‘मैं तुम्हारी संरक्षित संपत्ति को तार-तार कर सकता हूँ।’ यह वासना से ज्यादा एक हिंसक प्रभुत्व की भाषा है।
अक्सर एक सुविधाजनक भ्रम पाला जाता है कि यह भाषाई दरिद्रता केवल अनपढ़, गँवार या तथाकथित सीधे-सादे लोगों की बीमारी है। मगर सच तो यह है कि सबसे पढ़े-लिखे, टाई-सूट, एटीकेट व स्टाइलिश लोगों के बीच भी यह उतनी ही व्याप्त है। फर्क सिर्फ लहजे का है, नीयत का नहीं। एक कम पढ़ा-लिखा अपनी हताशा में देशी गाली बक देता है, तो एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव उसी बात को अंग्रेजी के संक्षिप्त रूपों या कूल दिखने वाले पुलिंदे में लपेटकर परोस देता है।
इस गाली-गलौज के मामले में हमारी संवेदनहीनता इस कदर बढ़ चुकी है कि हम इसके साथ बेहद सहज हो गए हैं। स्थिति यह है कि सामान्य बोलचाल में ये घिनौने शब्द अब भाषा के ‘उपसर्ग’ और ‘प्रत्यय’ (Prefixes और Suffixes) की तरह जुड़ गए हैं। किसी बात पर ज़ोर देना हो, किस्सा सुनाना हो या बस यूँ ही बात शुरू और खत्म करनी हो—वाक्य के आगे और पीछे ये शब्द इतने स्वाभाविक ढंग से चिपक जाते हैं कि हमें खुद होश ही नहीं रहता कि हम जुबान से क्या बोल गए हैं। जब किसी स्त्री की अस्मिता का चीरहरण भाषा में व्याकरण के कॉमा और फुलस्टॉप की तरह इस्तेमाल होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समाज भीतर से कितना संवेदनशून्य हो चुका है।
इस भाषाई पतन को खाद-पानी देने का सबसे बड़ा काम हमारे समकालीन पॉप-कल्चर और मनोरंजन जगत ने किया है। ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स, वेब सीरीज़ और कॉमेडी ने ‘यथार्थवाद’ के नाम पर इन माँ-बहन की गालियों को इतना ग्लैमरस बना दिया है कि आज की नई पीढ़ी (Gen Z) ने इसे बिना किसी झिझक के अपना लिया है। ओटीटी स्क्रीन्स पर धड़ल्ले से परोसी जा रही इस भाषाई गंदगी के प्रचलन को कौन रोकेगा? यह सवाल आज सांस्कृतिक चिंता को और गहरा करता है।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य का सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू यह है कि इस भाषाई विकृति की चपेट में अब लड़कियां भी आ चुकी हैं। जिस वर्ग को इस पुरुषवादी हिंसा के खिलाफ ढाल बनना चाहिए था, जो भाषा सीधे उनकी अपनी देह और वर्ग की अस्मिता पर वार करती है, विडंबना देखिए कि आज आधुनिक दिखने या बनने या बराबरी के खोखले भ्रम में कई लड़कियां भी इन्हीं गालियों को अपनी सामान्य बातचीत में धड़ल्ले से उछाल रही हैं। यह आंतरिक पितृसत्ता का सबसे डरावना रूप है, जहाँ पीड़ित ही अनजाने में शोषक के हथियार को अपना आभूषण मान बैठता है।
मुझे कभी याद नहीं आता कि स्कूल की किसी क्लास में, किसी शिक्षक ने ब्लैकबोर्ड पर यह लिखा हो कि अपनी असहमति या गुस्से को बिना किसी औरत को बेआबरू किए कैसे ज़ाहिर किया जाए। मुझे यह भी याद नहीं आता कि किसी खाप चौधरी ने यह प्रस्ताव किसी पंचायत में उठाया हो कि हम आइंदा से अपनी बहन-बेटियों को इतना गंदा और घटिया ट्रीटमेंट नहीं देंगे। धर्मगुरु भी कभी इस बीमारी पर व्याख्यान देते नहीं पाए गए। हमें न्यूटन के नियम रटाए गए, त्रिकोणमिति के सूत्र सिखाए गए, मगर अपनी भावनाओं और जुबान पर लगाम लगाना कभी हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बना।
और हमारे घर तो इस हिंसा की सबसे पहली पाठशाला रहे हैं। हमने अपने ही पिताओं, चाचाओं और बड़े भाइयों को औरतों पर चिल्लाते, उन्हें अपशब्द कहते देखा, और हमारी माताओं-दादियों ने ‘मर्दों का मिज़ाज ऐसा ही होता है’ कहकर उस ज़हर को शांति से पी लिया। हमने बचपन में ही यह सीख लिया कि अगर अपनी बात में वज़न लाना है, अगर सामने वाले को दबाना है, तो जुबान को स्त्री-विरोधी बनाना ही होगा।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हम इस गटर में हमेशा यूँ ही तैरते रहेंगे?
इसकी शुरुआत कहीं बाहर से नहीं, खुद अपने हलक से करनी होगी। पहला कदम यह समझना है कि किसी भी स्त्री का अस्तित्व किसी मर्द की इज़्ज़त का गोदाम नहीं है। जिस दिन हम औरत को ‘खानदान की आन-बान-शान’ के इस खोखले बोझ से आज़ाद कर देंगे और उसे एक स्वतंत्र, हाड़-मांस की इंसान मान लेंगे, उसी दिन इन गालियों का डंक आधा टूट जाएगा। जब किसी मर्द को यह अहसास हो जाएगा कि किसी के कुछ कह देने से उसके घर की औरत का वजूद मैला नहीं होता, तो सामने वाले का हथियार खुद-ब-खुद कुंद पड़ जाएगा।
दूसरा और सबसे मुश्किल काम है—अपने ही यार-दोस्तों के बीच उस ‘असहज चुप्पी’ को पैदा करना। जब अगली बार महफिल में कोई दोस्त हँसी-मज़ाक में किसी माँ-बहन को घसीटे या तकियाकलाम की तरह इन शब्दों को उछाले, तो उस पर ठहाका लगाने के बजाय बात को वहीं थाम देना। चेहरे का बदलता रंग और वह सधी हुई खामोशी सामने वाले को आईना दिखाने के लिए काफी होती है। किसी को उपदेश देने से ज्यादा असरदार होता है उसे यह महसूस करा देना कि उसकी यह कथित कूलनेस दरअसल उसकी भाषाई और वैचारिक कंगाली है।
भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं होती, वह हमारे चरित्र का प्रतिबिंब भी होती है। अगर मेरी जुबान पर हर दूसरे वाक्य में किसी की माँ, बहन या बेटी को भोगने और अपमानित करने का भाव है, तो यकीन मानिए, बाहर से मैं कितना भी सभ्य दिखूँ, भीतर से मैं उसी आदिम, बर्बर कबीले का हिस्सा हूँ जहाँ स्त्री सिर्फ एक लूटी जाने वाली ज़मीन थी। मुझे अपनी जुबान से इस मैल को खुरचकर फेंकना ही होगा—सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे स्त्रियों का सम्मान करना है, बल्कि इसलिए भी कि मुझे खुद को एक इंसान कहलाने का हक बचाए रखना है।