रूस-अफ्रीका साझेदारी या नई पराधीनता?

व्यापार, सैन्य हस्तक्षेप और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते नियंत्रण से उठे गंभीर सवाल

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
  • रूस ने अफ्रीका के साथ सालाना व्यापार 40 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन 2025 में व्यापार 27.1 अरब डॉलर रहा।
  • वर्ष 2026 के पहले आठ महीनों में रूस ने अफ्रीका को 14 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि वहां से केवल 3.2 अरब डॉलर का आयात किया।
  • एक अध्ययन के अनुसार, रूस के कम से कम 39 अफ्रीकी देशों के साथ 57 सैन्य और सुरक्षा समझौते हैं।
  • माली, नाइजर और मध्य अफ्रीकी गणराज्य में रूसी सैन्य उपस्थिति तथा नागरिक अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।

समग्र समाचार सेवा

मॉस्को, 28 अक्टूबर: अफ्रीकी देशों के साथ आर्थिक और सामरिक संबंधों को विस्तार देने की रूस की कोशिशों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठ रहा है—क्या मॉस्को वास्तव में अफ्रीका के विकास में भागीदार बन रहा है या सहयोग के नाम पर महाद्वीप के प्राकृतिक संसाधनों, बाजारों और राजनीतिक व्यवस्थाओं पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है?

तीसरे रूस-अफ्रीका शिखर सम्मेलन के अवसर पर यह बहस और तेज हो गई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अफ्रीकी नेताओं के साथ व्यापार, निवेश, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, औद्योगिक उत्पादन और रक्षा सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा कर रहे हैं।

हालांकि, अल जजीरा में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, रूस की बढ़ती उपस्थिति से अफ्रीका के आम नागरिकों की अपेक्षा मॉस्को के आर्थिक हितों और उसके सहयोगी शासकों को अधिक लाभ पहुंच रहा है।

तीसरा रूस-अफ्रीका शिखर सम्मेलन: सहयोग के नए वादे

मॉस्को में आयोजित तीसरे रूस-अफ्रीका शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति पुतिन और अफ्रीकी नेताओं के बीच आर्थिक एवं राजनीतिक सहयोग को नई दिशा देने की कोशिश हो रही है।

सम्मेलन के साथ दो दिवसीय आर्थिक और मानवीय मंच का आयोजन भी निर्धारित है, जिसमें निवेश, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों जैसे विषय प्रमुख हैं।

रूस वर्ष 2027 से 2029 के लिए नई कार्ययोजना प्रस्तुत करने की तैयारी में है। मॉस्को इस सहयोग को पारस्परिक लाभ पर आधारित साझेदारी के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन पिछले समझौतों के परिणामों को देखते हुए सवाल उठता है कि क्या नई घोषणाएं अफ्रीका में वास्तविक औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन में बदल पाएंगी?

40 अरब डॉलर का वादा, लेकिन व्यापार लक्ष्य अधूरा

अक्टूबर 2019 में सोची में आयोजित पहले रूस-अफ्रीका शिखर सम्मेलन में 92 समझौते हुए थे। उस समय राष्ट्रपति पुतिन ने अफ्रीका के साथ रूस का वार्षिक व्यापार बढ़ाकर 40 अरब डॉलर करने का लक्ष्य घोषित किया था।

जुलाई 2023 में सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित दूसरे शिखर सम्मेलन में 161 समझौते किए गए और वर्ष 2023 से 2026 के लिए कार्ययोजना तैयार की गई।

लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में रूस-अफ्रीका व्यापार केवल 27.1 अरब डॉलर तक पहुंच पाया। व्यापार में असंतुलन भी उल्लेखनीय है। वर्ष 2026 के पहले आठ महीनों में रूस ने अफ्रीका को लगभग 14 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि अफ्रीकी देशों से उसका आयात केवल 3.2 अरब डॉलर रहा।

इस असमानता से स्पष्ट होता है कि द्विपक्षीय व्यापार का बड़ा हिस्सा रूस के निर्यात पर आधारित है।

गेहूं और उर्वरक: खाद्य सुरक्षा या आर्थिक निर्भरता?

रूस अफ्रीकी देशों को गेहूं और उर्वरकों का महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में रूस ने अफ्रीका को लगभग 1.02 करोड़ टन गेहूं निर्यात किया। मिस्र उसके प्रमुख कृषि ग्राहकों में शामिल रहा।

इस आपूर्ति से अफ्रीकी देशों की खाद्य सुरक्षा संबंधी जरूरतें पूरी करने में सहायता मिलती है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि केवल खाद्यान्न और उर्वरक निर्यात से अफ्रीका की दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता विकसित नहीं होती।

यदि अफ्रीकी देश लगातार आयातित खाद्यान्न और बाहरी तकनीक पर निर्भर बने रहते हैं, तो आर्थिक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अधूरा रह सकता है।

निवेश के वादे और अधूरी परियोजनाएं

रूस के निवेश संबंधी दावों और वास्तविक परियोजनाओं के बीच भी अंतर सामने आया है। वर्ष 2019 के शिखर सम्मेलन में रूसी उर्वरक कंपनी यूरालकेम और अंगोला के ग्रुपो ओपाइया के बीच 1.2 अरब डॉलर की अमोनिया तथा यूरिया उत्पादन परियोजना पर समझौता हुआ था।

इस परियोजना में वर्ष 2023 से उत्पादन शुरू होने की योजना थी, लेकिन उसी वर्ष यूरालकेम ने परियोजना से हटने का निर्णय लिया। दूसरी ओर, मिस्र में रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम अल-दबाआ में चार परमाणु रिएक्टरों का निर्माण कर रही है।

इस परियोजना में 18,000 से अधिक मिस्री नागरिकों को निर्माण संबंधी रोजगार मिलने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, परियोजना का बड़ा हिस्सा रूस से प्राप्त 25 अरब डॉलर के ऋण के माध्यम से वित्तपोषित किया जा रहा है, जिसे मिस्र को ब्याज सहित चुकाना होगा। इससे यह प्रश्न उठता है कि बड़े निवेश समझौतों में लाभ और वित्तीय जोखिम किस अनुपात में साझा किए जा रहे हैं।

कांगो में पाइपलाइन परियोजना और रूसी हिस्सेदारी

कांगो गणराज्य में पॉइंट-नोयर से ब्राज़ाविल तक प्रस्तावित पेट्रोलियम उत्पाद पाइपलाइन परियोजना भी चर्चा में है। प्रस्तावित संयुक्त उद्यम में रूसी हितों की हिस्सेदारी लगभग 90 प्रतिशत और कांगो की सरकारी तेल कंपनी की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत निर्धारित की गई है।

परियोजना में 25 वर्ष की रियायत अवधि और परिवहन शुल्क संबंधी गारंटी का प्रावधान बताया गया है। रूसी अधिकारियों के अनुसार, परियोजना का परिचालन 2029 में शुरू करने की योजना है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे समझौतों में अफ्रीकी देशों को मिलने वाले दीर्घकालिक आर्थिक लाभ और संसाधनों पर उनके नियंत्रण की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।

39 अफ्रीकी देशों के साथ 57 सैन्य समझौते

रूस का प्रभाव केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं है। स्वीडन की रक्षा अनुसंधान एजेंसी के 8 अक्टूबर के आकलन के अनुसार, रूस के कम से कम 39 अफ्रीकी देशों के साथ 57 सैन्य और सुरक्षा समझौते हैं।

हालांकि, इनमें से अनेक समझौते सीमित स्तर पर लागू हैं, जबकि कुछ के अंतर्गत सैन्य प्रशिक्षण, सुरक्षा सहयोग और सैन्य सुविधाओं तक पहुंच प्रदान की जाती है।

रूस ने प्रारंभ में वैगनर समूह के माध्यम से कई अफ्रीकी देशों में सैन्य उपस्थिति विकसित की थी।

बाद में अनेक गतिविधियों को रूसी रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण वाले अफ्रीका कॉर्प्स के अंतर्गत स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बावजूद मध्य अफ्रीकी गणराज्य में वैगनर से जुड़े लड़ाकों की गतिविधियां जारी रहने की रिपोर्टें सामने आई हैं।

माली में सैन्य सफलता, लेकिन स्थायी सुरक्षा पर सवाल

माली रूस के सैन्य सहयोग की सीमाओं का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा है। नवंबर 2023 में वैगनर लड़ाकों और माली की सेना ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण किदाल शहर पर नियंत्रण स्थापित किया था।

अप्रैल 2026 में अलगाववादी विद्रोहियों ने शहर पर पुनः कब्जा कर लिया। इसके बाद 6 अक्टूबर को रूसी समर्थन प्राप्त बलों ने हवाई अभियान के बाद किदाल पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।

लेकिन बार-बार बदलते सैन्य नियंत्रण ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या क्षेत्रीय जीत आम नागरिकों के लिए स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रही है?

नागरिकों की मौत और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप

आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट (ACLED) के अनुसार, अप्रैल से अगस्त के बीच माली की सेना और रूस के अफ्रीका कॉर्प्स से जुड़े बलों ने 49 हवाई हमले किए, जिनमें 89 नागरिकों की मौत होने की जानकारी दी गई।

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने आरोप लगाया कि 10 जुलाई को मध्य माली के मोप्ती क्षेत्र स्थित बोम्बोरी गांव में अफ्रीका कॉर्प्स के लड़ाकों ने नौ लोगों की हत्या की, जिनमें चार बच्चे भी शामिल थे।

संगठन ने घरों में आग लगाने तथा हिरासत में लिए गए नागरिकों के साथ मारपीट, बिजली के झटके और यातना देने जैसे गंभीर आरोप भी दर्ज किए हैं।

ये आरोप स्वतंत्र जांच और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। माली में विद्रोही संगठनों द्वारा की जाने वाली हिंसा भी नागरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है।

नाइजर में सैन्य सरकार को रूसी सहायता

29 अगस्त को नाइजर में सैन्य विद्रोह की एक घटना के दौरान रूस के अफ्रीका कॉर्प्स ने जनरल अब्दुर्रहमान तियानी की सरकार को सहायता प्रदान की थी।

रिपोर्टों के अनुसार, रूसी सैनिकों ने जमीनी और हवाई समर्थन दिया, जिसकी पुष्टि रूसी राजदूत ने भी की। इस सहायता से तियानी की सरकार अपना नियंत्रण बनाए रखने में सफल रही। हालांकि, नाइजर में राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर प्रतिबंध, चुनावी समयसीमा का अभाव और नागरिक स्वतंत्रताओं पर नियंत्रण को लेकर आलोचना जारी है।

17 सितंबर को सैन्य सरकार ने निर्वासन में रह रहे पांच और आलोचकों की नागरिकता समाप्त कर दी थी।

मध्य अफ्रीकी गणराज्य में सत्ता संरक्षण और सोने के संसाधन

मध्य अफ्रीकी गणराज्य में रूस राष्ट्रपति फॉस्टिन-आर्केंज तुआदेरा की सरकार का महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी है। तुआदेरा ने 5 मार्च को राष्ट्रपति पुतिन का आभार व्यक्त करते हुए स्वीकार किया था कि रूसी सुरक्षा सहयोग ने दिसंबर में राष्ट्रपति चुनाव आयोजित कराने में भूमिका निभाई।

उस चुनाव में विपक्ष के बहिष्कार के बीच तुआदेरा ने तीसरा कार्यकाल प्राप्त किया। रिपोर्टों के अनुसार, वैगनर समूह से जुड़े लड़ाके अब भी उनकी सरकार की सुरक्षा में सक्रिय हैं।

रूसी लड़ाकों पर नागरिकों की हत्या, यातना और अन्य मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगाए गए हैं। अल जजीरा के विश्लेषण में दावा किया गया है कि वैगनर के स्थान पर अफ्रीका कॉर्प्स की तैनाती के लिए मॉस्को ने लगभग 1.4 करोड़ यूरो प्रतिमाह की मांग की थी।

साथ ही रूसी हितों से जुड़ी कंपनियों को देश के सोने के संसाधनों से आर्थिक लाभ मिलने की रिपोर्टें भी सामने आई हैं।

अफ्रीकी मीडिया में रूस का बढ़ता प्रभाव

रूस अफ्रीका में सूचना और मीडिया के क्षेत्र में भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। जुलाई में रूसी सरकारी प्रसारक आरटी ने माली, नाइजर और बुर्किना फासो की सैन्य सरकारों द्वारा संचालित ताफूक टीवी के साथ सामग्री साझा करने का समझौता किया।

सितंबर से बमाको से प्रसारण शुरू करने वाला यह चैनल सैन्य सरकारों की उपलब्धियों को प्रमुखता देने के लिए जाना जाता है। दूसरी ओर, स्थानीय पत्रकारों की गिरफ्तारी, गुमशुदगी और सेंसरशिप की घटनाओं को लेकर चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

फ्रांस 24 की 3 अप्रैल की जांच में दावा किया गया कि जून से अक्टूबर 2024 के बीच पश्चिम अफ्रीका के 35 मीडिया संस्थानों में लगभग 650 रूस समर्थक लेख प्रकाशित करवाए गए।

लीक हुए दस्तावेजों के अनुसार, कुछ लेखों के लिए 250 से 700 डॉलर तक भुगतान किया गया था।

अंगोला में रूसी नागरिकों को सजा

रूस से जुड़े राजनीतिक प्रभाव अभियानों का मामला अंगोला में भी सामने आया। जुलाई में अंगोला की एक अदालत ने क्रेमलिन से संबंध रखने वाले राजनीतिक प्रभाव नेटवर्क अफ्रीका पॉलिटोलॉजी से जुड़े दो रूसी नागरिकों को आतंकवाद और जासूसी के आरोपों में दोषी ठहराया।

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि उन्होंने ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का उपयोग अशांति भड़काने और वर्ष 2027 के चुनाव को प्रभावित करने के लिए किया।

इगोर रैचिन को 11 वर्ष और लेव लाक्श्तानोव को आठ वर्ष कारावास की सजा सुनाई गई। दोनों ने आरोपों से इनकार किया और फैसले के खिलाफ अपील की।

क्या अफ्रीका नई निर्भरता की ओर बढ़ रहा है?

रूस स्वयं को पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करता है। अनेक अफ्रीकी सरकारें भी रूस के साथ संबंधों को अपनी विदेश नीति के विकल्प बढ़ाने के अवसर के रूप में देखती हैं। यह दृष्टिकोण पूरी तरह निराधार नहीं है। खाद्यान्न आपूर्ति, परमाणु ऊर्जा, सैन्य प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से अफ्रीकी देशों को वास्तविक लाभ मिल सकते हैं।

लेकिन सहयोग की सफलता केवल समझौतों की संख्या या सैन्य उपस्थिति से नहीं मापी जा सकती। इसका वास्तविक मूल्यांकन रोजगार सृजन, स्थानीय उद्योगों के विकास, संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण, नागरिक सुरक्षा और राजनीतिक स्वतंत्रता के आधार पर होना चाहिए।

अफ्रीका को साझेदारी चाहिए, नई पराधीनता नहीं

अफ्रीका लंबे समय तक औपनिवेशिक शोषण और बाहरी शक्तियों के आर्थिक नियंत्रण का सामना करता रहा है। आज जब महाद्वीप के देश विकास और रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसी अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां विकसित करना है जो वास्तविक समानता पर आधारित हों।

रूस हो, अमेरिका, यूरोप या चीन—किसी भी बाहरी शक्ति को केवल ऐतिहासिक संबंधों या राजनीतिक घोषणाओं के आधार पर जवाबदेही से छूट नहीं मिलनी चाहिए।

अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों का पहला लाभ अफ्रीकी नागरिकों को मिलना चाहिए। सैन्य सहयोग का उद्देश्य सरकारों को सत्ता में बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।

मॉस्को शिखर सम्मेलन की वास्तविक सफलता इस बात से निर्धारित होगी कि नई घोषणाएं अफ्रीकी देशों को आत्मनिर्भर बनाती हैं या उनकी आर्थिक और राजनीतिक निर्भरता को और गहरा करती हैं।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि रूस अफ्रीका में कितना प्रभावशाली बनता है, बल्कि यह है कि इस साझेदारी से अफ्रीका के सामान्य नागरिक कितने सुरक्षित, समृद्ध और स्वतंत्र होते हैं।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.