पूनम शर्मा
दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के बड़े टकराव का केंद्र बना है। INDIA ब्लॉक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर आपत्तियों और कथित चुनावी अनियमितताओं के विरोध में “चलो दिल्ली” रैली आयोजित की है। विपक्ष का कहना है कि चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल हैं। दूसरी ओर NDA का आरोप है कि विपक्ष चुनाव हारने के बाद निर्वाचन आयोग और चुनावी प्रक्रिया को निशाना बनाता है, जबकि जीतने पर उसी व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाता।
यहीं से एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक बहस शुरू होती है।
चुनावी संस्था पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है
किसी भी लोकतंत्र में चुनाव आयोग, मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया और मतगणना को लेकर सवाल उठाना अस्वाभाविक नहीं है। यदि किसी दल या मतदाता के पास अनियमितता का ठोस प्रमाण है, तो उसे सार्वजनिक करना, कानूनी चुनौती देना और संस्थागत सुधार की मांग करना पूरी तरह वैध है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं होती कि संस्थाओं पर कभी सवाल न उठें। उसकी मजबूती इस बात से होती है कि सवालों का जवाब प्रमाण, प्रक्रिया और कानून के आधार पर दिया जाए।
लेकिन यही सिद्धांत विपक्ष पर भी लागू होता है।
क्या सवाल केवल हार के बाद उठते हैं?
NDA का मुख्य राजनीतिक हमला इसी बिंदु पर है—जब विपक्ष किसी चुनाव में जीतता है, तब वह चुनाव आयोग या मतदान प्रणाली की वैधता पर वैसी तीखी आपत्ति नहीं करता; लेकिन हार के बाद आरोप तेज हो जाते हैं। यह प्रश्न केवल कांग्रेस या INDIA ब्लॉक के लिए नहीं, बल्कि हर राजनीतिक दल के लिए प्रासंगिक है।
यदि कोई पार्टी एक राज्य में उसी चुनावी व्यवस्था के तहत जीतती है और दूसरे राज्य में हारने के बाद व्यवस्था को ही संदिग्ध बताती है, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कर्नाटक के हालिया विधान परिषद चुनाव इसका एक रोचक उदाहरण हैं। वहां चार सीटों पर बैलेट पेपर से मतदान हुआ और भाजपा-जद(S) गठबंधन ने सभी सीटें जीत लीं। इससे यह साबित नहीं होता कि EVM या मतदाता सूची से जुड़े हर प्रश्न निराधार हैं, लेकिन इतना जरूर स्पष्ट होता है कि बैलेट पेपर भी किसी दल की जीत की गारंटी नहीं है।
रामलीला मैदान की राजनीति
विपक्ष की मौजूदा रैली केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया के खिलाफ प्रदर्शन नहीं है। यह राजनीतिक संदेश भी है। राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने लोगों, छात्र संगठनों और नागरिक समूहों से इसमें शामिल होने का आह्वान किया है। रैली का घोषित उद्देश्य SIR, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाना है।
NDA और भाजपा ने इसके जवाब में विपक्ष पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यदि विपक्ष के पास मतदाता सूची में गड़बड़ी या चुनावी अनियमितता का प्रमाण है, तो उसे चुनाव आयोग और अदालत के सामने रखना चाहिए।
यह तर्क भी लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। सड़क पर राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन संवैधानिक आरोपों की अंतिम परीक्षा दस्तावेज, आंकड़े और न्यायिक प्रक्रिया में होती है।
आरोप जितना बड़ा, प्रमाण उतना मजबूत होना चाहिए
यदि यह कहा जाता है कि चुनावी प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से प्रभावित की जा रही है, तो यह सामान्य राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद पर गंभीर आरोप है।
ऐसे आरोपों के लिए चुनाव क्षेत्रवार आंकड़े, मतदाता सूची के सत्यापन योग्य रिकॉर्ड, नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया के प्रमाण और स्पष्ट प्रशासनिक जिम्मेदारी सामने आनी चाहिए।
“वोट चोरी” जैसे नारे राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा केवल नारों के आधार पर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
उसी तरह सरकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।
यदि कोई वैध प्रश्न उठता है, तो उसे केवल “राजनीतिक आरोप” कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। पारदर्शिता, सार्वजनिक आंकड़े और स्पष्ट स्पष्टीकरण ही संदेह को कम कर सकते हैं।
चुनाव जीतने का रास्ता अंततः मतदाता से होकर जाता है
भारत की राजनीति में एक तथ्य अक्सर शोर के बीच दब जाता है—सत्ता प्राप्त करने का संवैधानिक रास्ता केवल चुनाव है। कोई भी पार्टी चाहे जितनी रैलियां करे, सोशल मीडिया अभियान चलाए या सरकार पर आरोप लगाए, अंततः उसे मतदाता का विश्वास जीतना ही होगा।
यदि कोई दल लगातार चुनाव हार रहा है, तो उसे संगठन, नेतृत्व, उम्मीदवार, स्थानीय रणनीति और जनता से संवाद पर भी उतना ही गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए जितना वह चुनावी प्रक्रिया पर करता है।हार का हर कारण मशीन, आयोग या साजिश नहीं हो सकता।
उसी तरह जीत को हमेशा “जनता की अंतिम मुहर” मान लेना भी पर्याप्त नहीं। लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता की समीक्षा लगातार होती रहनी चाहिए।
लोकतंत्र में भरोसा दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है
रामलीला मैदान की रैली केवल सत्ता बनाम विपक्ष का संघर्ष नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बड़ा प्रश्न भी रखती है—क्या हम चुनावी संस्थाओं पर भरोसा राजनीतिक परिणाम के हिसाब से बदलते रहेंगे? लोकतंत्र का स्वास्थ्य तब बेहतर होता है जब विपक्ष सवाल पूछता है, सरकार जवाब देती है और संस्थाएं प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
लेकिन लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब हार षड्यंत्र और राष्ट्र-विरोध के प्रभाव में हो ।
जरूरत है एक सरल सिद्धांत की—
आरोप प्रमाण पर टिकें, संस्थाएं पारदर्शिता पर टिकें और सत्ता का फैसला मतदाता करे। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में जीत या हार का स्थायी रास्ता न रैली से निकलता है, न नारे से।
वह मतपेटी—या मतदान मशीन—तक पहुंचने वाले नागरिक के विश्वास से निकलता है।