देश के पत्रकारों के शीर्ष संगठन, वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया, सम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ , ने अब राज्यसभा टीवी से अवैध तरीके से निकाले गए 37 पत्रकारों का मामला उठाया
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।
देश के पत्रकारों के शीर्ष संगठन, वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया, सम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ , ने अब राज्यसभा टीवी से अवैध तरीके से निकाले गए 37 पत्रकारों का मामला उठाया है । यूनियन के राष्ट्रीय अध्य्क्ष अनूप चौधरी, राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र भंडारी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संजय कुमार उपाध्याय की तरफ से एक पत्र माननीय उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू जी राज्यसभा टीवी के सभापति को भेजा है । जिसमे यूनियन ने सभी 37 पत्रकारों की बहाली व उन्हें कोई वैकल्पिक व्यवस्था देने की मांग की गयी है । यूनियन की तरफ से भेजे पत्र की प्रति आपके समक्ष है ।
प्रतिष्ठा में,
श्री एम वेंकैया नायडु जी
माननीय उपराष्ट्रपति भारत एवं सभापति राज्य सभा,
उपराष्ट्रपति भवन, नयी दिल्ली
विषय- राज्य सभा टीवी से 37 कर्मचारियों की बहाली के साथ वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में।
माननीय उपराष्ट्रपति जी,
कोरोना को पराजित कर आपने जिस तरह प्रेरक उद्बोधन के साथ फिर से अपना कामकाज आरंभ किया है, उसके लिए आप भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध देश के शीर्ष पत्रकार संगठन वर्किंग जर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया की ओर से बधाई और शुभकामना स्वीकार करें। साथ ही यूट्यूब पर राज्य सभा टीवी के दर्शकों की संख्या 50 लाख तक पहुंचने की भी आपको बधाई। इस उपलब्धि में वे लोग भी सहभागी रहे हैं जिनको कोरोना संकट के दौरान बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक 30 सितंबर को निकाल दिया गया। राज्य सभा टीवी के कई वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकार हमारे साथ जुड़े हैं और उनसे तथ्यों की जांच के बाद हमने तय किया कि आपको पत्र लिख कर हम लोग इस फैसले के पुनर्विचार के लिए अनुरोध करें। क्योंकि कोरोना संकट के दौरान एक संसदीय चैनल से इस तरह इतनी बड़ा तादाद में कर्मचारियों को निकाले जाने से मीडिया की दुनिया में एक गलत संकेत जा रहा है। हमें लगता है कि इस मामले में आपको कुछ अधिकारियों ने गुमराह किया है और इसमें नियम प्रक्रियाओं और नोटिस की औपचारिकता को भी नहीं पूरा किया गया है।
हमें इस बात की जानकारी मिली है कि आपकी ओर से मई में इस बात का आश्वासन दिया गया था कि दिसंबर तक किसी को भी हटाया नहीं जाएगा। प्रधानमंत्रीजी ने भी कोरोना काल में निजी कारोबारियों तक से इस बाबत अपील की थी। और हाल में नयी श्रम संहिता पर चर्चा में भी इस मुद्दे पर बहुत सी बातें उठीं और सरकार ने भरोसा दिया था कि पत्रकारों समेत सभी श्रमिकों के हितों की इससे बेहतर रक्षा होगी। ऐसे दौर में अगर संसद के टीवी चैनल में ऐसी घटना होती है तो चिंता का विषय है। संकट के इस दौर में इतने लोग कहां जाएंगे और अपनी आजीविका के लिए क्या करेगे।
हम लोगों को इस से कोई ऐतराज नहीं है कि बेहतर और उत्पादक बनाने के लिए लोक सभा और राज्य सभा टीवी का एकीकरण या मर्जर हो। लेकिन इसमें पहले से काम कर रहे अनुभवी पत्रकारों और गैर पत्रकारों के हितों की रक्षा हो यह देश का शीर्ष पत्रकार संगठन होने के नाते हम लोग चाहते हैं। लेकिन इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पक्ष यह रहा कि किसी को न तो पहले नोटिस दी गयी न ही इस बात की भनक लगने पायी कि उनको हटाया जा रहा है। जो काम नहीं कर रहे थे और आरोपित थे, यहां तक कि जिनको आपने हटाने के लिए लिखा था, वे सुरक्षित बने रहे, जबकि सबसे अधिक कामकाजी लोग और एक दशक से राज्य सभा टीवी की प्रतिष्ठा बढाने वालों को हटा दिया गया। राज्य सभा को अगर इस अभियान से धन की बचत करनी थी तो कोरोना संकट के दौरान ऐसे रास्ते निकाले जा सकते थे, जिससे कर्मचारियों की आजीविका भी बची रहे और धन की बचत भी हो जाये। लेकिन ऐसी किसी संभावना पर काम नहीं किया गया। जिनको निकाला गया उसमें दिल्ली सरकार को कवर करने वाली एक पत्रकार आठ महीने के गर्भ से है। जिनका कार्यकाल दो साल का बचा था, उनको निकालने के साथ पहली बार एक एक माह की कांट्रैक्ट की अवधि करना भी किसी लिहाज से उचित नहीं था। लेकिन ऐसा करके आपकी पत्रकार हितैषी छवि और गरिमा को आहत करने का कुचक्र कुछ अधिकारियों ने रचा। इसका लक्ष्य संसद टीवी के बनने की प्रक्रिया में अच्छे लोगों को बाहर कर एक खास गुट का कब्जा स्थापित करना भी माना जा रहा है। जरूरी है कि इन सारे तथ्यों की गहराई के साथ पड़ताल करायी जाये तो बहुत सी चौंकाने वाली जानकारियां सामने आ सकती हैं।
अपने संसदीय स्वरूप के साथ बेहतरीन विषयों के चयन के नाते राज्य सभा टीवी की वैश्विक प्रतिष्ठा है। आपके संरक्षण में 2017 के बाद इसके यूट्यूब दर्शकों की संख्या 50 लाख तक पहुंचना ऐतिहासिक है। लेकिन नीतिगत तौर पर मर्जर करते समय इसमें काम कर रहे लोगों के भविष्य़ के बारे में भी संबंधित कमेटी को बात करना चाहिए था और पत्रकार संगठनों को भी भरोसे में लेना चाहिए था।
इस मामले में हम कुछ अहम सुझाव आपके समक्ष रखना चाहते हैं, जिससे धन की बचत संभव है-
1- राज्य सभा में मितव्ययता के लिए अनुभवी अधिकारियों की एक समिति बनायी जाये जो सभी इकाइयों का अध्ययन करके तात्कालिक और दीर्घकालिक उपाय सुझाए।
2- वाहनों, फोन और भत्तों में उनको किसी खास दायरे में लाया जाये जहां वे अनलिमिटेड हैं।
3- -राज्य सभा टीवी से लोगों को निकालने की जगह अप्रैल 2021 तक 75 हजार से एक लाख तक वेतन पाने वालों के वेतन से 25% और एक लाख से अधिक वेतन पाने वालों पर 30% कटौती की जाये। 50 से 75 हजार वेतन वालों से भी 10 % तक कटौती की जा सकती है। लेकिन 50 हजार से कम वालों को इसमें शामिल न किया जाये क्योंकि उनकी गृहस्थी प्रभावित हो सकती है।
4- राज्य सभा टीवी में काम कर रहे रिटायर और मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि वाले तीन प्रमुख पदों कार्यकारी निदेशक, कार्यकारी संपादक और सीईओ के वेतनों से 50 फीसदी कटौती की जा सकती है। इनके वाहनों को भी अप्रैल 2021 तक सेवा से हटाया जा सकता है जिससे काफी बचत होगी। इन सबके पास अपने वाहन हैं जिनका ये उपयोग कर सकते हैं, या फिर इनको पिक अप और ड्राप की सुविधा दी जाये।
5- – राज्य सभा सचिवालय के अधिकारियों और कर्मचारियों से संवाद कर 10 फीसदी वेतन कटौती की जाये तो किसी को हटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
6- राज्य सभा टीवी में कर्मचारियों के एक्सटेंशन के मामले में लोक सभा टीवी की तरह सचिवालय की एक कमेटी बनायी जाये। इससे मनमानी रुकेगी।
अगर इन कदमों को उठाया जाता है तो सबकी वापसी हो सकती है और सबके घरों के चूल्हे जलते रहेंगे। इस नाते आपसे निवेदन है कि आप राज्य सभा सचिवालय को निर्देश देने की कृपा करें कि इन कर्मचारियों की वापसी के लिए जरूरी कदम उठाए जायें। इस बात की भी जांच का आदेश दें कि किन लोगों ने इतने लोगों के भविष्य को अंधेरे में डालते हुए श्रम कानूनों का उल्लंघन क्यों किया। इस समय इस मुद्दे पर आंदोलन की स्थिति बन रही है। कई लोग अदालतों में जाएंगे इससे अंततोगत्वा राज्य सभा सचिवालय पर ही आंच आएगी।