पूनम शर्मा
जम्मू–कश्मीर की राजनीति एक बार फिर से उथल-पुथल में है। हाल ही में हज़रतबल दरगाह के बाहर लगी एक पत्थर की पट्टिका को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इस पट्टिका पर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित था, और इसका अनावरण दरगाह के हाल ही में हुए रेनोवेशन (नवीनीकरण) के बाद किया गया था। यह नवीनीकरण जम्मू–कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से कराया गया था, जिसकी अध्यक्षता भाजपा की नेता डॉ. दारख्शा कर रही हैं।
मामला तब भड़का जब शुक्रवार की नमाज़ के बाद कुछ लोगों ने इस पट्टिका को पत्थरों से तोड़ने का प्रयास किया। सवाल यह उठता है कि जब लोग नमाज़ पढ़ने के लिए शांति से दरगाह के अंदर गए तो किसी ने ऐतराज़ क्यों नहीं जताया? यदि इस पट्टिका से वास्तव में किसी को आपत्ति थी तो विरोध पहले ही होना चाहिए था। फिर अचानक नमाज़ के बाद ऐसा माहौल क्यों बना? यही संकेत देता है कि नमाज़ के बाद कुछ तत्व जानबूझकर लोगों की भावनाओं को भड़काने में लगे और यह विवाद खड़ा किया गया।
नमाज़ के बाद भड़काऊ एजेंडा?
यह पहली बार नहीं है कि धार्मिक स्थलों से निकलने के बाद भीड़ को भड़काया गया हो। अकसर देखा गया है कि कुछ संगठित तत्व भाषणों या अफवाहों के जरिए भीड़ को दिशा देते हैं। हालांकि, इस मामले में किसी भड़काऊ भाषण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन घटनाक्रम यही बताता है कि विरोध एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था।
विवाद की असल जड़
विरोध करने वाले गुटों का तर्क है कि मस्जिद या दरगाह परिसर में किसी भी तरह का चित्र, प्रतिमा या सरकारी प्रतीक लगाना इस्लामी परंपरा के खिलाफ़ है। उमर अब्दुल्ला जैसे नेताओं ने तो यहाँ तक कहा कि वक्फ बोर्ड को माफी मांगनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि अशोक स्तंभ कोई धार्मिक चिन्ह नहीं बल्कि भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है। यह हर सरकारी दफ्तर, मुद्रा, पासपोर्ट, नोट और कागज़ पर छपा हुआ है। ऐसे में इसे दरगाह के बाहर लगाने पर विरोध का मतलब क्या है?
क्या यह भारत की अस्मिता का विरोध है? क्योंकि अशोक स्तंभ किसी पार्टी का चुनाव चिह्न नहीं बल्कि पूरे देश की पहचान है। इसको तोड़ने का सीधा मतलब भारत की संप्रभुता और सम्मान पर चोट है।
राजनीति का रंग
महबूबा मुफ़्ती हों या उमर अब्दुल्ला, दोनों ही परिवार लंबे समय से जम्मू–कश्मीर की राजनीति को अपनी जागीर समझते रहे हैं। जब भी कोई राष्ट्रवादी कदम उठाया जाता है, ये नेता तुरंत भारत सरकार के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं। महबूबा मुफ़्ती को तो हर अवसर पर भारत-विरोध का मंच खड़ा करना आता है, और यदि अवसर न मिले तो वे उसे पैदा कर लेती हैं।
आज भी यही हो रहा है। दरगाह के नवीनीकरण में सरकार ने 40 करोड़ रुपये खर्च किए। यानी यह कोई निजी संस्था का नहीं बल्कि सरकारी सहयोग से हुआ कार्य था। फिर अगर वहाँ राष्ट्रीय प्रतीक लगाया गया तो उसमें आपत्ति कैसी?
असली सवाल – भारत या अलगाववाद?
जिन्होंने यह तोड़फोड़ की और जिन नेताओं ने इसका समर्थन किया, वे दरअसल उसी अलगाववादी मानसिकता का हिस्सा हैं जो दशकों तक लाल चौक पर भारत का झंडा जलाती रही और पाकिस्तान का झंडा फहराती रही। सवाल यह है कि क्या ऐसे तत्व वास्तव में भारत के साथ खड़े हैं या सिर्फ भारत की आर्थिक मदद और सत्ता का लाभ उठाते हुए मन से अलगाववादी ही बने हुए हैं?
आज भी घाटी में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो या तो मौन समर्थन करता है या सक्रिय रूप से भारत-विरोधी नारों में शामिल होता है। लेकिन खुलकर भारत के समर्थन में खड़े होने वाले लोग बहुत कम दिखते हैं। यही स्थिति चिंताजनक है।
ऐतिहासिक संदर्भ
यह याद रखना ज़रूरी है कि कश्मीर में वर्षों तक धारा 370 और 35A के सहारे भारत का संविधान लागू नहीं होने दिया गया। अब जबकि 5 अगस्त 2019 के बाद ये विशेषाधिकार खत्म हुए हैं, तब भी राजनीतिक परिवार और उनके समर्थक भारत-विरोधी मानसिकता को हवा देने से बाज़ नहीं आ रहे।
हज़रतबल की पट्टिका तोड़ने का मामला केवल कानून-व्यवस्था का छोटा-सा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आने वाले बड़े खतरे का संकेत है। क्योंकि अगर राष्ट्रीय प्रतीक पर हमला करने वालों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में ऐसे दुस्साहस और बढ़ेंगे।
कठोर संदेश की ज़रूरत
यह केवल वक्फ बोर्ड या किसी प्रशासनिक गलती का मामला नहीं है। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान है। ऐसे में कार्रवाई केवल मामूली मुकदमे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे राष्ट्र-विरोधी अपराध मानते हुए कठोर दंड दिया जाना चाहिए। तभी संदेश जाएगा कि भारत की अस्मिता के खिलाफ़ कोई भी कदम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
नतीजा
दरगाह विवाद ने एक बार फिर से यह उजागर कर दिया है कि घाटी में अलगाववाद की मानसिकता अब भी जीवित है और उसे राजनीतिक संरक्षण भी मिल रहा है। यह समय है जब भारत सरकार और जम्मू–कश्मीर प्रशासन को स्पष्ट रूप से तय करना होगा कि कौन देशभक्त है और कौन अवसरवादी अलगाववादी।
अशोक स्तंभ केवल पत्थर पर उकेरी गई आकृति नहीं है, यह भारत की आत्मा और उसकी पहचान है। इसका अपमान किसी धर्म का विरोध नहीं बल्कि सीधे-सीधे भारत का अपमान है। और इस अपमान का जवाब भारत की संप्रभुता और कठोरता से ही दिया जाना चाहिए।