पूनम शर्मा
हाल ही में बांगलादेश के एक सांसद अख्तर हुसैन का एक वहाँ की संसद में दिया गया बयान अति महत्वपूर्ण है जिसमें वह पश्चिम बंगाल के चुनाव पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं । उन्होंने कहा था कि अगर भाजपा जीतती है, तो गैर-कानूनी बांग्लादेशियों को वापस भेजा जाएगा, जिससे बांग्लादेश के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। यह बात स्पष्ट हो जाती है अब इतने वर्षों तक बांग्लादेश की राजनीति पश्चिम बंगाल की राजनीति से कितनी प्रभावित थीं। इतने वर्षों की सरकार ने पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश के अवैध घुसपैठिए आते रहे। टीएमसी की सरकार उन्हें आवश्यक दस्तावेज़ उपलब्ध करते रही । इस कारण ही अवैध घुसपैठिए भारत के विभिन्न राज्यो में जाकर अपनी जनसंख्या बढ़ाते रहे । इस प्रकार पूरे भारत में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए फैल गए । पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने अवैध घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाया । अख्तर हुसैन ने बांग्लादेश की संसद में जो कुछ भी कहा उससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिम बंगाल में किसी और पार्टी का शासन में न आने देने की कोशिश केवल टीएमसी ही नहीं बांग्लादेश की सरकार भी चाहती है । टीएमसी की जो गुंडागर्दी है और उसे जो इंधन मिल रहा है वह निश्चित रूप से बाहरी ताकतों के फ़्लस्वरूप ही है। बाहर की ताकते हैं उनके दम पर ही टीएमसी के गुंडे इतने फल फूल रहे हैं।
बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद गरमाई हुई है। चुनावी माहौल के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो चुका है और राजनीतिक बयानबाजी लगातार तीखी होती जा रही है। राज्य की मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर विपक्ष लगातार गंभीर आरोप लगा रहा है। बंगाल में केवल सत्ता की लड़ाई नहीं चल रही, बल्कि यह लड़ाई राज्य की सुरक्षा, सीमा नियंत्रण और राजनीतिक पहचान की भी बन चुकी है। भाजपा का जनाधार बंगाल में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे तृणमूल कांग्रेस की बेचैनी भी बढ़ती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री के हालिया बयान और उनकी राजनीतिक आक्रामकता इसी दबाव का परिणाम हैं।
बांग्लादेश और बंगाल की राजनीति का पुराना संबंध
सीमावर्ती राज्य होने के कारण पश्चिम बंगाल लंबे समय से अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे से जुड़ा रहा है। खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों का नाम बार-बार सामने आता रहा है। वर्षों से सीमा पार से लोगों को अवैध रूप से भारत में प्रवेश कराया गया और बाद में उन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया गया। ।बंगाल में भाजपा सरकार बनने की संभावना से बांग्लादेशी नेटवर्क और उनके समर्थकों में डर का माहौल है। उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस ने इन अवैध प्रवासियों को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया और उन्हें आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य सरकारी सुविधाएं दिलाकर स्थायी रूप से बसाने का प्रयास किया।
हालांकि तृणमूल कांग्रेस इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। पार्टी का कहना है कि भाजपा केवल धार्मिक ध्रुवीकरण और डर की राजनीति कर रही है।
“अगर भाजपा आई तो…” वाला डर क्यों फैलाया जा रहा?
चुनावी माहौल में एक नैरेटिव लगातार सुनाई दे रहा है कि यदि बंगाल में भाजपा की सरकार बनती है तो मुसलमानों और बांग्लादेशी मूल के लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। इस तरह का डर एक विशेष वोटबैंक को एकजुट रखने के लिए फैलाया जा रहा है।
भाजपा का दावा है कि उसका विरोध किसी धर्म से नहीं बल्कि अवैध घुसपैठ से है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जो लोग कानूनी रूप से भारत के नागरिक हैं, उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन विपक्षी दल लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा सरकार आने पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई हो सकती है।
इसी मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस और अधिक तेज हो गई है। भाजपा समर्थकों का कहना है कि बंगाल में वर्षों से घुसपैठ को नजरअंदाज किया गया, जबकि राज्य सरकार पर इसे रोकने की जिम्मेदारी थी।
मुर्शिदाबाद: “एंट्री पॉइंट” की राजनीति
मुर्शिदाबाद का नाम इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा लिया जा रहा है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि यह जिला लंबे समय से अवैध घुसपैठ का प्रमुख एंट्री पॉइंट बना हुआ है। उनका दावा है कि यहां से लोग धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचते हैं और स्थानीय नेटवर्क की मदद से बस जाते हैं।
विपक्ष का यह भी आरोप है कि सीमावर्ती जिलों में प्रशासनिक ढील और राजनीतिक संरक्षण के कारण यह समस्या और बढ़ी। हालांकि स्थानीय स्तर पर कई लोग इन दावों को अतिरंजित राजनीतिक बयानबाजी मानते हैं।
वोटबैंक की राजनीति और सरकारी दस्तावेजों का आरोप
तृणमूल कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक लाभ के लिए पहचान दस्तावेजों का दुरुपयोग किया। आरोप यह है कि बड़ी संख्या में संदिग्ध नागरिकों को आधार कार्ड, राशन कार्ड और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया गया ताकि उन्हें स्थायी वोटर बनाया जा सके।
इसके साथ ही बंगाल में बूथ कैप्चरिंग, चुनावी हिंसा और प्रशासनिक दबाव जैसे आरोप भी लगातार लगते रहे हैं। भाजपा का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस चुनावों में “मसल पावर” का इस्तेमाल करती है और विपक्षी कार्यकर्ताओं को डराने का प्रयास किया जाता है।
तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताकर खारिज करती रही है। पार्टी का कहना है कि भाजपा बंगाल की सामाजिक एकता को तोड़ना चाहती है।
एग्जिट पोल और बढ़ती घबराहट
हालिया चुनावी सर्वे और एग्जिट पोल ने बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कुछ सर्वेक्षणों में भाजपा के मजबूत प्रदर्शन का अनुमान जताया गया, जिसके बाद राजनीतिक बयानबाजी और अधिक तेज हो गई।
विपक्ष का दावा है कि चुनाव प्रचार खत्म होने के साथ ही Mamata Banerjee का आत्मविश्वास कमजोर पड़ता दिखाई दिया और उनके बयान पहले से ज्यादा आक्रामक हो गए। वहीं तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि एग्जिट पोल हमेशा सही नहीं होते और बंगाल की जनता अंतिम परिणाम में चौंकाने वाले फैसले लेती है।
बंगाल की लड़ाई अब राष्ट्रीय बहस
पश्चिम बंगाल की राजनीति अब केवल राज्य तक सीमित नहीं रह गई है। अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा, वोटबैंक और पहचान की राजनीति अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुकी है। भाजपा इसे राष्ट्र सुरक्षा का मुद्दा बता रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाल की संस्कृति और सामाजिक संतुलन की रक्षक के रूप में पेश कर रही है।
आने वाले समय में यह साफ होगा कि बंगाल की जनता किस नैरेटिव को स्वीकार करती है। लेकिन इतना तय है कि इस चुनावी लड़ाई ने राज्य की राजनीति को पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील और निर्णायक बना दिया है।