सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम पर रोक लगाने से किया इनकार

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  • सरकार के अनुसार, यह कानून शोषण से सुरक्षा को मजबूत करता है।
  • कोर्ट ने कल्याणकारी योजनाओं के दुरुपयोग की संभावना पर भी सवाल किए।
  • दिल्ली, केरल और कर्नाटक हाईकोर्ट में भी मामले लंबित हैं।
  • आने वाले महीनों में कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी     

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 4 मई : कोर्ट ने मांगा जवाब, अंतरिम राहत नहीं सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (संरक्षण अधिकार) संशोधन अधिनियम, 2026 पर अंतरिम रोक लगाने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब यह मामला तीन-न्यायाधीशों की बेंच के पास जाएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने सुनवाई की।
सभी राज्यों को उनके एडवोकेट जनरल के जरिए नोटिस भेजा गया। कोर्ट ने फिलहाल किसी भी अंतरिम आदेश या रोक को नकारा। अगली सुनवाई तीन जजों की बेंच करेगी।

संशोधन के प्रावधान और विरोध

नया कानून ट्रांसजेंडर की पहचान की परिभाषा बदलता है — अब स्वयं-परिचय के बजाय चिकित्सा प्रमाणपत्र की आवश्यकता है। इस बदलाव का ट्रांसजेंडर समुदाय और समर्थक समूहों ने विरोध किया है।

2019 के कानून में संशोधन कर नए प्रावधान जोड़े गए।
कई हितधारकों, खासकर नेशनल ट्रांसजेंडर काउंसिल को सलाह-मशविरा नहीं किया गया।
बिल पास होने पर दो एनसीटीपी सदस्यों ने इस्तीफा दिया।
आलोचकों के मुताबिक, यह कानून 2014 के ऐतिहासिक नालसा जजमेंट के विरुद्ध है।

याचिकाएं और कानूनी सवाल

इस संशोधन के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने तर्क दिया कि नया कानून सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित स्व-पहचान अधिकार का उल्लंघन है। प्रमुख याचिकाकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और जैनब पटेल हैं। नया कानून पहले से जारी जेंडर-अफर्मिंग ट्रीटमेंट को अवैध बना देता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नालसा जजमेंट को सिर्फ संशोधन से नहीं हटाया जा सकता।
जस्टिस बागची ने कहा कि नया संशोधन नालसा के आधार को ही बदल देता है।

सरकार का पक्ष और आगे की प्रक्रिया

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नया कानून जबरन जेंडर परिवर्तन और हानिकारक प्रथाओं को रोकने के लिए है। कोर्ट ने अभी कोई रोक नहीं लगाई है और सभी राज्यों से जवाब मांगा है।

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