प्राचीन भारतीय धातुशास्त्र पर मंथन: ‘नामूलं लिख्यते

किञ्चित’ व्याख्यानमाला का सफल आयोजन

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  • केशवकुंज, झंडेवालाँ में आयोजित हुआ विशिष्ट व्याख्यान
  • विषय रहा — “प्राचीन भारतीय धातुशास्त्र: स्रोत, तकनीक, परंपरा एवं इसका वैश्विक प्रभाव”
  • प्रो. रूबी मिश्रा ने भारतीय धातुशास्त्र की प्राचीन परंपरा पर रखा विस्तृत दृष्टिकोण
  • पर्यावरण संरक्षण एवं भारतीय ज्ञान परंपरा पर भी हुआ विशेष विमर्श
  • 150 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी रहे उपस्थित

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 16 मई: केशवकुंज, झंडेवालाँ स्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘नामूलं लिख्यते किञ्चित’ व्याख्यानमाला के अंतर्गत “प्राचीन भारतीय धातुशास्त्र: स्रोत, तकनीक, परंपरा एवं इसका वैश्विक प्रभाव” विषयक विशिष्ट व्याख्यान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री आकाश अवस्थी द्वारा मंगलाचरण से हुआ।

भारतीय ज्ञान परंपरा का परिचायक है धातुशास्त्र
कार्यक्रम की प्रस्तावना वरिष्ठ समाजसेवी श्रीमती संध्या सिंह ने प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धातुओं का उपयोग केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान और सतत विकास की जीवन शैली का प्रतीक रहा है। उन्होंने प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग को भारतीय परंपरा के विपरीत बताया।

प्रो. रूबी मिश्रा ने रखा विस्तृत शोधपरक व्याख्यान

मुख्य वक्ता के रूप में भगिनी निवेदिता कॉलेज की प्राचार्या एवं दिल्ली विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र की प्रोफेसर प्रो. रूबी मिश्रा ने भारतीय धातुशास्त्र की प्राचीन उपलब्धियों पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने वैदिक काल से आधुनिक युग तक धातुशास्त्र के विकास को पीपीटी प्रस्तुति के माध्यम से समझाया।

प्रो. मिश्रा ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय धातुशास्त्र को अपेक्षित महत्व नहीं मिला, किंतु वर्तमान समय में इसकी वैश्विक उपयोगिता और वैज्ञानिकता को पुनः स्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने अनेक प्राचीन ग्रंथों, भारतीय वैज्ञानिकों तथा आर्थिक विकास से जुड़े उदाहरणों के माध्यम से भारत की समृद्ध धातु परंपरा को रेखांकित किया।

पर्यावरण संरक्षण का भी दिया संदेश

कार्यक्रम में सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय पर्यावरण प्रमुख श्री गोपाल आर्य ने जल संरक्षण, वृक्षारोपण और पॉलिथीन मुक्त समाज का संकल्प दिलाया। उन्होंने प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से व्यक्तिगत स्तर पर पर्यावरण बचाने का संदेश दिया।

भारतीय विज्ञान को पश्चिमी मान्यता की आवश्यकता नहीं

विशिष्ट अतिथि डॉ. योगेश्वर मिश्र ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक परंपराएँ स्वयं में पूर्ण हैं और उन्हें पश्चिमी स्वीकार्यता की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने शून्य की खोज तथा अशोक स्तंभ के लौह स्तंभ का उदाहरण देते हुए भारतीय विज्ञान की श्रेष्ठता को रेखांकित किया।

श्रद्धा और शोध दोनों आवश्यक : डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय

कार्यक्रम के समापन सत्र में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय ने कहा कि भारतीय परंपरा में वर्णित वैज्ञानिक संकेतों पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि से शोध को आगे बढ़ाने की जरूरत है और “श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्” के सूत्र को आत्मसात करना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन प्रो. रीना कपूर ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अजय सिंह ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं अनेक दायित्वधारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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