सुप्रीम कोर्ट : सुरक्षित फैसलों को 3 महीने के भीतर सुनाए हाई कोर्ट

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  • सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को 3 महीने के भीतर सुरक्षित फैसले सुनाने का निर्देश दिया।
  • जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाने को कहा गया।
  • फैसलों की कॉपी 15 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड करना होगा।
  • 4 महीने तक फैसला लंबित रहने पर पक्षकार चीफ जस्टिस से शिकायत कर सकेंगे।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 29 मई : न्यायिक देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

देश में अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि किसी भी मामले में आदेश सुरक्षित रखने के बाद अधिकतम तीन महीने के भीतर फैसला सुनाया जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि फैसलों में अनावश्यक देरी से वादियों को अपूरणीय क्षति पहुंचती है और न्याय प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा प्रभावित होता है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तेजी लाने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाए जाने चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन तक सुनाकर वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।

 जेल प्रशासन को तुरंत सूचना देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत या सजा निलंबन से जुड़े आदेश पारित होने के तुरंत बाद जेल अधिकारियों को सूचित किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि विचाराधीन कैदी या दोषी की रिहाई उसी दिन सुनिश्चित करने का प्रयास होना चाहिए, और किसी भी स्थिति में अगले दिन तक रिहाई हो जानी चाहिए।

पीठ ने कहा कि न्याय में देरी सीधे तौर पर नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों को प्रभावित करती है। ऐसे मामलों में प्रशासनिक लापरवाही या प्रक्रियात्मक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।

15 दिनों में वेबसाइट पर अपलोड होगा पूरा फैसला

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि अदालत केवल फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाती है, तो विस्तृत फैसला अधिकतम 15 दिनों के भीतर संबंधित हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए।

इसके अलावा, यदि पूरा फैसला खुली अदालत में सुनाया जाता है, तो उसे 24 घंटे के भीतर ऑनलाइन उपलब्ध कराना होगा। अदालत का मानना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और पक्षकारों को समय पर न्यायिक दस्तावेज उपलब्ध हो सकेंगे।

 चार महीने से ज्यादा देरी होने पर क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के चार महीने बाद भी निर्णय नहीं सुनाया जाता है, तो संबंधित पक्ष हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से संपर्क कर सकता है। ऐसी स्थिति में मामले को दूसरी बेंच को स्थानांतरित करने पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का उद्देश्य किसी विशेष जज या हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाना है।

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