पूनम शर्मा
असली संकट विभाजन नहीं, अवसरवाद है
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरे विद्रोह ने पार्टी को दो खेमों में बांट दिया है। एक पक्ष खुद को असली तृणमूल बता रहा है, तो दूसरा नेतृत्व और संगठन पर अपना अधिकार जता रहा है।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का टूटना कोई असामान्य घटना नहीं है। विचारों का मतभेद, नेतृत्व को लेकर असंतोष या संगठनात्मक विवाद किसी भी दल में विभाजन का कारण बन सकते हैं। यदि तृणमूल कांग्रेस का कोई गुट अलग रास्ता चुनना चाहता है, तो यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है।सवाल यह है कि कल यदि यही नेता भाजपा में शामिल होने का निर्णय लेते हैं, तो क्या जनता इसे सहज रूप से स्वीकार कर ले?
विचारधारा कोई कपड़ा नहीं है
वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा के खिलाफ राजनीति की। चुनावी मंचों से लेकर विधानसभा तक उन्होंने भाजपा को बंगाल के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। आज यदि वही नेता सत्ता, पद या राजनीतिक भविष्य की चिंता में भाजपा का दामन थाम लेते हैं, तो यह वैचारिक परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक सुविधा कहलाएगा।
कोई भी नेता अपने विचार बदल सकता है, लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि कल तक जिस दल को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया जा रहा था, आज वही राजनीतिक आश्रय बन गया।
जनता सब देख रही है
राजनीति की सबसे बड़ी भूल यह मान लेना है कि जनता भूल जाती है। बंगाल की जनता ने दशकों तक राजनीतिक संघर्ष, हिंसा, भ्रष्टाचार और दल-बदल का खेल देखा है। वह नेताओं के भाषणों और उनके वास्तविक इरादों के बीच का अंतर समझती है। यदि कोई नेता कल तक भाजपा को कोसता रहे और आज उसी दल में शामिल हो जाए, तो जनता सवाल पूछेगी। और ये सवाल पूरी तरह जायज होंगे।क्या भाजपा तब गलत थी या आज सही है? यदि इसका स्पष्ट उत्तर नहीं है, तो मामला केवल राजनीतिक अवसरवाद का है।
टीएमसी का इतिहास भी सवालों के घेरे में
यह भी सच है कि तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक रिकॉर्ड विवादों से मुक्त नहीं रहा है। भ्रष्टाचार, कटमनी, गुटबाजी और सत्ता के दुरुपयोग जैसे आरोप वर्षों से पार्टी का पीछा करते रहे हैं। लेकिन जो नेता आज खुद को सुधारवादी चेहरा बताने की कोशिश कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश उसी व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। इसलिए केवल पार्टी बदल लेने से अतीत के प्रश्न समाप्त नहीं हो जाते। जवाबदेही से बचकर कोई भी नैतिकता का प्रमाणपत्र हासिल नहीं कर सकता।
बंगाल को सिद्धांत चाहिए, राजनीतिक पर्यटक नहीं
सबसे बड़ा खतरा टीएमसी के विभाजन से नहीं है।सबसे बड़ा खतरा उस राजनीतिक संस्कृति से है जिसमें नेता केवल अपने लाभ के लिए दल बदलते हैं। आज एक दल, कल दूसरा दल और परसों तीसरा दल—यदि राजनीति इसी दिशा में बढ़ेगी तो विचारधारा का कोई अर्थ नहीं बचेगा। लोकतंत्र व्यक्तियों के स्वार्थ पर नहीं, सिद्धांतों पर टिकता है। यदि राजनीतिक निष्ठा केवल सत्ता के साथ बदलती रहे, तो जनता का विश्वास टूटना तय है।
एक कड़ा संदेश
बंगाल के नेताओं को समझना होगा कि जनता अब केवल नारों से प्रभावित नहीं होती। यदि किसी नेता को वास्तव में अपनी पार्टी से वैचारिक असहमति है, तो उसे साहस के साथ नया राजनीतिक विकल्प खड़ा करना चाहिए। लेकिन विद्रोह को भाजपा या किसी अन्य दल में प्रवेश का शॉर्टकट बनाना लोकतांत्रिक नैतिकता का अपमान होगा। तृणमूल कांग्रेस दो भागों में बंटे, तीन भागों में बंटे या उससे भी अधिक हिस्सों में—यह उसका आंतरिक मामला है। लेकिन राजनीतिक अवसरवाद को वैचारिक संघर्ष का नाम देकर जनता को भ्रमित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
बंगाल को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो सिद्धांतों पर खड़े रहें, न कि ऐसे नेताओं की जो हर बदलती हवा के साथ अपना झंडा बदल लें।