लोकतंत्र का संचालन संविधान से होना चाहिए, सड़कों से नहीं

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सुबोध मिश्रा 

विरोध और शासन के बीच संवैधानिक संतुलन

लोकतंत्र दो समान रूप से महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिका होता है—जनता का अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार और जनता का असहमति व्यक्त करने का अधिकार। दोनों लोकतंत्र की आत्मा हैं। किंतु इनमें से कोई भी दूसरे का स्थान नहीं ले सकता। यदि केवल चुनाव ही सर्वोपरि हो जाएँ, तो लोकतंत्र बहुमतवाद में बदल सकता है। वहीं यदि संसद द्वारा पारित प्रत्येक नीति को लंबे सड़क आंदोलनों के माध्यम से पलटने की परंपरा बन जाए, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदलने का खतरा पैदा हो जाता है।

भारतीय संविधान इस संतुलन का स्पष्ट मार्ग दिखाता है। नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध, सरकार की आलोचना और जनमत निर्माण का पूरा अधिकार है। दूसरी ओर, जनता से जनादेश प्राप्त सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह अपने चुनावी वादों और संसद द्वारा अनुमोदित नीतियों को लागू करे। यदि किसी कानून या नीति की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठता है, तो उसका अंतिम निर्णय न्यायपालिका करती है। यही व्यवस्था लोकतंत्र को भीड़ के दबाव से अलग करती है।

विरोध का अधिकार, लेकिन समानांतर विधानमंडल नहीं

भारत का स्वतंत्रता संग्राम शांतिपूर्ण आंदोलनों की शक्ति का महान उदाहरण है। महात्मा गांधी सहित अनेक नेताओं ने अनशन और सत्याग्रह का सहारा लिया। जब उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ, तब ब्रिटिश सरकार ने भी चिकित्सकीय हस्तक्षेप कर उनका जीवन बचाने का प्रयास किया। बाद में वही नेता स्वस्थ होकर सार्वजनिक जीवन में लौटे, लेखन किया और स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसका अर्थ यह नहीं कि किसी भी अनशन के दबाव में सरकार को अपनी नीतियाँ बदलनी ही चाहिए। सरकार का पहला दायित्व जीवन की रक्षा करना है, जबकि नीति संबंधी मतभेदों का समाधान संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए।

समकालीन भारत की चुनौती

हाल के वर्षों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), कृषि सुधार कानूनों, अग्निवीर योजना तथा मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे अनेक विषयों पर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। इन मुद्दों पर समर्थकों और विरोधियों दोनों ने अपने-अपने संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक तर्क प्रस्तुत किए।

लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। किंतु विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या हर नीति का अंतिम निर्णय सड़कों पर होना चाहिए? यदि संसद द्वारा पारित प्रत्येक कानून तब तक ही प्रभावी माना जाए जब तक उसके विरुद्ध व्यापक आंदोलन न हो जाए, तो धीरे-धीरे संवैधानिक शासन व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।

संस्थाओं की गरिमा सर्वोपरि

भारत का संविधान प्रत्येक संस्था की भूमिका स्पष्ट करता है। संसद कानून बनाती है। सरकार उन्हें लागू करती है। न्यायपालिका उनकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा करती है। चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करता है। इन संस्थाओं से असहमति व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु उनके निर्णयों को चुनौती देने का उचित माध्यम भी संविधान ही प्रदान करता है।

सोनम वांगचुक से संबंधित हालिया प्रकरण भी इसी संतुलन की याद दिलाता है। उनके स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था को लेकर विभिन्न मत सामने आए हैं, जबकि मामला न्यायालय के समक्ष है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय राजनीतिक दबाव के बजाय चिकित्सा विशेषज्ञता, विधिक प्रक्रिया और न्यायिक निगरानी के आधार पर होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है।

लोकतंत्र को विरोध भी चाहिए और मर्यादा भी

परिपक्व लोकतंत्र न तो नागरिकों की आवाज़ दबाता है और न ही सरकार को प्रत्येक आंदोलन के सामने झुकने के लिए बाध्य करता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति चुनाव, संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र संस्थाओं और शांतिपूर्ण जनभागीदारी—इन सभी के संतुलन में निहित है।

भारत का लोकतंत्र इसलिए मजबूत रहा है क्योंकि उसने संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखा है। इस विश्वास को बनाए रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार जवाबदेह रहे, नागरिक सजग रहें, विरोध शांतिपूर्ण रहे और न्यायपालिका स्वतंत्र रहे—तभी संविधान सर्वोच्च रहेगा और लोकतंत्र दीर्घकाल तक सुरक्षित रह सकेगा।

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