शर्तों के साथ परिसीमन पर समर्थन दे सकती है डीएमके
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर केंद्र सरकार उनकी तीन प्रमुख बातें मान ले, तो द्रमुक परिसीमन पर अपना कड़ा रुख नरम कर सकती है।
- परिसीमन प्रक्रिया को लेकर द्रमुक और केंद्र सरकार के बीच अंदरखाने बातचीत और शर्तों का दौर शुरू हो गया है।
- द्रमुक ने तमिलनाडु के मौजूदा कोटे और संसद में उसकी हिस्सेदारी को संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग उठाई है।
- जानकारों का मानना है कि यदि सहमति बनती है तो यह मोदी सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक और विधायी बूस्ट होगा।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 31 अगस्त: देश में प्रस्तावित परिसीमन और नए चुनावी समीकरणों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच कूटनीतिक जोड़-तोड़ तेज हो गई है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार, तमिलनाडु की प्रमुख राजनीतिक पार्टी द्रमुक (DMK) ने संकेत दिए हैं कि यदि केंद्र सरकार उनकी चिंताओं का उचित समाधान करती है, तो वह परिसीमन विधेयक के विरोध से हटकर इसके समर्थन में आ सकती है। दक्षिण भारत के राज्यों में इस बात की लंबे समय से चिंता जताई जा रही थी कि नई व्यवस्था से उनकी राजनीतिक ताकत प्रभावित हो सकती है। इसी के मद्देनजर द्रमुक ने कुछ स्पष्ट और कड़े प्रावधान जोड़ने की मांग रखी है।
संसदीय प्रतिनिधित्व और सुरक्षा की मांग
पार्टी के करीबी सूत्रों का कहना है कि द्रमुक मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करना चाहती है कि तमिलनाडु की मौजूदा 7.18 प्रतिशत हिस्सेदारी और लोकसभा में सांसदों का अनुपात किसी भी स्थिति में कम न हो। इसके लिए पार्टी ने संविधान संशोधन के जरिए पुख्ता गारंटी की मांग की है। यदि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन इन शर्तों को अपने प्रस्ताव में शामिल करता है, तो क्षेत्रीय दलों और केंद्र के बीच का यह गतिरोध समाप्त हो सकता है। पार्टी का स्पष्ट मंतव्य है कि विकास और जनसंख्या नियंत्रण के मामलों में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को किसी भी प्रकार का राजनीतिक नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
आगामी सत्र और राजनीतिक दलों की रणनीतिसंसद के आगामी सत्रों में इस पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है। चूंकि सरकार को संविधान संशोधन विधेयकों के लिए कड़े बहुमत के आंकड़ों को साधना होता है, ऐसे में क्षेत्रीय दलों की भूमिका काफी निर्णायक हो जाती है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि द्रमुक और केंद्र के बीच आम सहमति बन जाती है, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े राजनीतिक समझौते के रूप में देखा जाएगा। हालांकि, आधिकारिक तौर पर अंतिम निर्णय विधेयक के मसौदे के सार्वजनिक होने के बाद ही लिया जाएगा।