देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग जारी, महिलाओं ने खोली पोल
संसद में सरकार के दावों को खारिज करते हुए चार राज्यों की पीड़ित महिलाओं ने दिल्ली पहुंचकर उठाई आवाज, 'इंडिया @ 80' अभियान का आगाज।
- सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा नई दिल्ली में ‘इंडिया @ 80’ अभियान की शुरुआत की गई है, जिसका उद्देश्य देश को मैला ढोने की प्रथा से मुक्त करना है।
- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर से आईं महिलाओं ने राजधानी आकर सरकार के उस दावे को झूठा साबित किया जिसमें देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग न होने की बात कही गई थी।
- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस राष्ट्रीय शर्म को युद्धस्तर पर और प्राथमिकता के साथ खत्म करने की मांग की है।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 1 सितंबर: जब एक तरफ भारत सरकार संसद में यह दावा कर रही है कि देश में अब मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला ढोने की प्रथा) का वजूद खत्म हो चुका है, वहीं दूसरी ओर चार अलग-अलग राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर) से आईं पीड़ित महिलाओं ने राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली पहुंचकर इस दावे की पोल खोल दी है। इन साहसी महिलाओं ने खुलकर यह सच्चाई सामने रखी कि आज भी देश के कई हिस्सों में ड्राई लैट्रिन (सूखे शौचालय) मौजूद हैं और उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में इस अमानवीय काम को करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्होंने सवाल किया कि जब हम रोज मैला ढोने को मजबूर हैं, तो सरकार यह कैसे कह सकती है कि यह प्रथा खत्म हो चुकी है? इस गंभीर राष्ट्रीय शर्म से देश को मुक्ति दिलाने के लिए ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ (SKA) ने एक साल लंबे चलने वाले ‘इंडिया @ 80’ (INDIA @ 80) अभियान की शुरुआत की है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों और दिग्गजों की हुंकार
इस अभियान के लॉन्चिंग कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस सुधांशु धूलिया और पटना हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अंजना प्रकाश ने शिरकत की। इन सभी ने एक स्वर में इस बात को दोहराया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी कुप्रथा आज भी देश में जारी है और सरकार को युद्धस्तर पर इसे अपनी प्राथमिकता बनाकर समाप्त करना चाहिए। जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि एसकेए और पीड़ित समुदाय लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन सरकार की प्राथमिकता में इस समस्या का समाधान शामिल नहीं है। वहीं, जस्टिस सुधांशु धूलिया ने हैरानी जताई कि आज भी 40 से अधिक जिलों में ड्राई लैट्रिन मौजूद हैं और महिलाओं की दास्तान सुनकर हर भारतीय को शर्म आनी चाहिए। जस्टिस अंजना प्रकाश ने कहा कि यह समस्या केवल कानून से हल नहीं हो सकती, इसके लिए सामाजिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

पीड़ित महिलाओं की दर्द भरी आपबीती
उत्तर प्रदेश के सीतापुर से आईं 70 वर्षीय मुस्सी देवी ने बताया कि उन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों का मैला साफ करते हुए बिताया है और वे अपनी मौत से पहले इस अमानवीय प्रथा का अंत देखना चाहती हैं। जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फर अहमद शेख ने बताया कि कश्मीर में ड्राई लैट्रिन और मैनुअल स्कैवेंजिंग बड़े पैमाने पर है, लेकिन डर के कारण इस पर कोई खुलकर बात नहीं करता। मध्य प्रदेश की अंगूरी बाई ने साझा किया कि 14 साल की उम्र में शादी के बाद उनकी सास उन्हें सूखा शौचालय साफ करने के काम में ले गईं, जो सिलसिला आज भी जारी है। बिहार की चंजोटिया देवी ने बताया कि वे 15 साल की उम्र से आज तक यही काम कर रही हैं और वे चाहती हैं कि उनकी अगली पीढ़ी इस नरक से पूरी तरह मुक्त हो जाए।
बेजवाड़ा विल्सन की चेतावनी और सरकार को अल्टीमेटम
सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि आजादी के 80 साल बाद भी यदि हमें यह साबित करने के लिए दिल्ली आना पड़े कि देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग मौजूद है, तो यह सरकार की जातिवादी मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने 16 साल की उम्र से इस लड़ाई को शुरू किया था और आज वे 60 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। उन्होंने भारत सरकार को इस कुप्रथा को एक साल के भीतर पूरी तरह खत्म करने का कड़ा अल्टीमेटम दिया है। इस कार्यक्रम के दौरान अर्थशास्त्री जयति घोष, अतुल सूद, रितिका खेरा, सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा ग्रोवर, आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, निखिल Dey, और कई अन्य जाने-माने कार्यकर्ताओं तथा बुद्धिजीवियों ने इस अमानवीय प्रथा को जल्द से जल्द जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया।