पीढ़ियों के फासले में संवाद की जरूरत

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डॉ. प्रियदर्शिनी पुरोहित

परिवर्तन प्रकृति का नियम है और इस नियम के अनुसार वीडियो की सोच में बदलाव भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, परंतु आज की युवा पीढ़ी में परिवर्तन के रूप में संस्कारों और जीवन-मूल्यों में गिरावट आज हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने में जटिलता उत्पन्न कर रही है। इसका प्रभाव केवल व्यक्ति के व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे परिवार, समाज और राष्ट्र की सामाजिक संरचना को कमजोर कर रहा है। आज की युवा पीढ़ी में स्वतंत्रता की भावना प्रबल है, जो निश्चित रूप से सकारात्मक है, किंतु कई बार स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच की बारीक रेखा को धुंधला कर देती है। अपनी मनमर्जी से जीवन जीने को कुछ युवा अपनी स्वतंत्रता मानते हैं और माता-पिता अथवा बड़ों की किसी भी प्रकार की रोक-टोक को अपने अधिकारों का हनन समझने लगते हैं। जबकि वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारियों और सामाजिक मूल्यों से विमुख होना नहीं, बल्कि विवेक और उत्तरदायित्व के साथ अपने निर्णय लेने की क्षमता है।

अक्सर युवाओं को यह तर्क देते हुए सुना जाता है कि हम जो करना चाहते हैं, जैसा जीवन जीना चाहते हैं और जैसा पहनना चाहते हैं, वैसा करने की हमें पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। निस्संदेह, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद और जीवन के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है; परंतु अधिकारों के साथ कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। हमारी स्वतंत्रता तब सार्थक बनती है, जब वह दूसरों के अधिकारों, सम्मान और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन न करे।आज प्रेम, सम्मान और विनम्रता के साथ किसी से बातचीत करना भी कई बार पुरानी सोच या बनावटी व्यवहार समझ लिया जाता है। मित्रों के बीच बातचीत में भाषा की मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान रखना भी कम होता जा रहा है।

आज एक अन्य चिंताजनक प्रवृत्ति यह है कि युवा पीढ़ी का एक वर्ग रिश्तों और पारिवारिक जिम्मेदारियों को बोझ के रूप में देखने लगा है। ये परिस्थितियाँ हमें इस प्रश्न पर विचार करने के लिए विवश करती हैं कि क्या समाज और सामाजिक व्यवस्था की आज वास्तव में कोई आवश्यकता नहीं रह गई है? क्या प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार जीने की स्वतंत्रता दे देना ही इस समस्या का समाधान है? निस्संदेह, व्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि सामाजिक संबंधों, उत्तरदायित्वों और पारस्परिक संवेदनाओं का स्थान केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता ले ले, तो इसका परिणाम एक तनावपूर्ण और एकाकी जीवन के रूप में सामने आ सकता है। ऐसी स्थिति में न हमारा किसी से वास्तविक जुड़ाव रह जाएगा और न ही हम समरसता एवं सहयोग से परिपूर्ण जीवन जी पाएँगे। जब हम किसी की सुनना पसंद नहीं करेंगे और कोई हमारी बात सुनने के लिए तैयार नहीं होगा, तब संवाद का स्थान टकराव और आत्मीयता का स्थान अलगाव ले लेगा।

तो फिर इस समस्या का समाधान क्या है? मेरा मानना है कि आज की पीढ़ी अत्यधिक तार्किक और प्रश्नाकुल हो गई है। वह किसी भी बात को केवल इसलिए स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि उसे ऐसा करने के लिए कहा गया है। वह हर बात के पीछे कारण और तर्क जानना चाहती है। इसलिए आज अभिभावकों के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे बच्चों पर अपनी बात थोपने के बजाय उन्हें तार्किक ढंग से समझाएँ, उनके प्रश्नों को धैर्यपूर्वक सुनें और उनके विचारों का सम्मान करें। आज की पीढ़ी केवल उपदेशों से प्रभावित नहीं होती; वह अपने माता-पिता के शब्दों से कहीं अधिक उनके व्यवहार और आचरण से सीखती है। इसलिए अभिभावकों का आचरण ही बच्चों के लिए सबसे प्रभावशाली पाठ बन जाता है।

आज परिवारों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवारों के स्थान पर एकल परिवार बढ़ रहे हैं और माता-पिता अपनी व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत व्यस्तताओं में उलझे रहते हैं। परिणामस्वरूप बच्चों के अनुभवों और सीखने का दायरा घर की सीमाओं से बाहर निकलकर इंटरनेट, सोशल मीडिया और विभिन्न डिजिटल माध्यमों तक पहुँच गया है। जब बच्चों के साथ पर्याप्त संवाद और मार्गदर्शन नहीं हो पाता, तब वे सोशल मीडिया और आसपास के वातावरण से प्राप्त सामग्री को ही ज्ञान और सत्य का आधार मानने लगते हैं। समस्या यह नहीं है कि बच्चे सीख रहे हैं, बल्कि चुनौती यह है कि वे क्या सीख रहे हैं, किससे सीख रहे हैं और उसे सही-गलत परखने की उनकी क्षमता कितनी विकसित हो रही है।

ऐसे समय में अभिभावकों की भूमिका केवल बच्चों को सुख-सुविधाएँ और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह सकती। बच्चों की आवश्यकताओं को समझना, उनकी पीढ़ी की सोच को समझने का प्रयास करना और उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। केवल यह सुनिश्चित कर देना कि बच्चे के पास अच्छा विद्यालय, मोबाइल, इंटरनेट, कपड़े और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं, अभिभावकीय दायित्व की पूर्णता नहीं है। बच्चों को सबसे अधिक आवश्यकता समय, संवाद, विश्वास और सहभागिता की है।
अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की पसंद, रुचियों और गतिविधियों में सहभागी बनें। उनके साथ समय बिताएँ, उनके मित्रों और रुचियों को समझें, उनके प्रश्नों पर चर्चा करें और आवश्यकता पड़ने पर उनके साथ मिलकर सही और गलत के बीच अंतर खोजने का प्रयास करें। जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसके माता-पिता केवल उसे नियंत्रित करने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके साथी, मार्गदर्शक और विश्वसनीय संवादकर्ता हैं, तब वह अपनी समस्याएँ और दुविधाएँ उनसे साझा करने में अधिक सहज होता है।

अंततः, आज की चुनौती बच्चों को केवल अनुशासित करने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने की है; केवल उन्हें निर्देश देने की नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद स्थापित करने की है; और केवल उनके भविष्य के लिए संसाधन जुटाने की नहीं, बल्कि उनके वर्तमान जीवन में सहभागी बनने की है। परिवार तभी मजबूत होगा जब उसमें अधिकार के साथ आत्मीयता, अनुशासन के साथ संवाद और अपेक्षाओं के साथ समझदारी होगी। यही संतुलन बच्चों को डिजिटल दुनिया की अनिश्चितताओं के बीच विवेकपूर्ण निर्णय लेने वाला, संवेदनशील और सामाजिक रूप से जिम्मेदार नागरिक बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
माता-पिता, परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को केवल बंधन मानना स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। आधुनिकता और प्रगति का अर्थ अपनी जड़ों और संस्कारों से दूर होना नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करना है। हमें यह भी समझना होगा कि संस्कार किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने का माध्यम नहीं, बल्कि उसे सही दिशा देने का आधार हैं। अधिकारों के साथ कर्तव्य, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और आधुनिकता के साथ संस्कारों का संतुलन ही एक सशक्त व्यक्ति, स्वस्थ समाज और मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

 

*डॉ. प्रियदर्शिनी पुरोहित बनस्थली विद्यापीठ में राजनीति विज्ञान की संकाय सदस्य हैं और पिछले 18 वर्षों से शिक्षण एवं अकादमिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से योगदान दे रही हैं। उनका शैक्षणिक एवं शोध अनुभव व्यापक है, जिसमें विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय संबंध, लैंगिक मुद्दे (Gender Issues) तथा भारतीय ज्ञान परंपरा एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) प्रमुख विषय हैं।

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