अनिल त्यागी
यह एक अनोखा खेल है। चौंसठ खानों के इस पट पर केवल सफ़ेद मोहरे सजे हैं। स्वाभाविक है, एक राजा साहब भी हैं जो बाकी सबसे ज़रा ऊँचे और कद्दावर दिखते हैं। पर इस बोर्ड की असली अजूबाई यह है कि यहाँ एक नहीं, दो-दो रानियाँ (वज़ीर) हैं। नियम कहता है कि एक रानी केवल सफ़ेद खानों में दौड़ेगी और दूसरी केवल काले खानों में। पर सत्ता के खेल में नियम ही सबसे कमज़ोर चीज़ होते हैं—जब जी चाहा, सफ़ेद वाली काले में घुसी और काले वाली सफ़ेद में! खेल दिल्ली के बंद कमरों में खेला जा रहा है, पर इसकी शह और मात पर वॉशिंगटन से लेकर मॉस्को तक के हुक्मरानों की सांसें अटक जाती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर, हमारे राजा नरेंद्र मोदी की सबसे वफ़ादार और ताकतवर रानियाँ हैं।
जयशंकर साहब कूटनीति के चमकते हुए सफ़ेद पन्नों पर चलते हैं। उनके प्यादे, घोड़े, और हाथी वॉशिंगटन, मॉस्को, यूरोपीय संघ और मध्य-पूर्व तक फैले हैं। इनके पास साधारण शतरंज की तरह आठ नहीं, बल्कि हज़ारों प्यादे हैं जिन्हें ‘राजनयिक’ कहा जाता है। दुनिया के बड़े-बड़े चौधरी इनके कायल हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इनकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ते हैं, और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर तो दिन में तीन बार इनसे हाल-चाल लिए बिना खाना नहीं पचाते।
दूसरी तरफ़, डोभाल साहब गुप्तचर विद्या और ‘डार्क आर्ट्स’ के उस्ताद हैं। ये शहमात के काले खानों में, यानी अंधेरे और सायों में काम करते हैं। इनका नेटवर्क किसी पुराने विशाल बरगद की जड़ों जैसा है, जो दशकों की मेहनत से बुना गया है। दुनिया भर की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ इनके नाम से वाकिफ़ हैं। सूचनाएँ, गुप्त संपर्क और इतिहास की परतें ही इस वज़ीर के असली मोहरे हैं।
जयशंकर साहब प्रधानमंत्री मोदी का दुनिया के सामने चमकता हुआ चेहरा हैं—यानी कूटनीतिक रानी। डोभाल साहब परदे के पीछे का हाथ हैं—यानी आपरेशनल रानी। एक जब दुनिया से मेज़ पर बैठकर मोल-भाव करता है, तो दूसरा यह भाँप लेता है कि दुश्मन अगली चाल क्या चलेगा। एक मीठी बोली में कड़ी बात कहने वाला बाज़ है, तो दूसरा सीधा-सच्चा शिकारी बाज़। राजा साहब के लिए दोनों ही इतने कीमती हैं कि वे किसी एक को भी गँवाने का जोखिम नहीं उठा सकते। वे दोनों को अपने हाथों से सहलाकर सुरक्षित रखते हैं। आखिर इस नई दुनिया में, जहाँ कोई भी अकेला मुल्क पूरी दादागिरी नहीं चला सकता, भारत को रूस, अमेरिका, चीन और ब्रिक्स (BRICS) सबके साथ संतुलन जो बनाना है!
लेकिन हुज़ूर, सियासत की शतरंज में जब नया मोड़ आता है, तो कभी-कभी न चाहते हुए भी किसी की बलि देनी ही पड़ती है। मंत्रिमंडल में फेरबदल का दौर आने वाला है। अब देखना यह है कि राजा साहब अपनी किस रानी को कौन सा खाना सौंपते हैं, या खेल कोई नया ही मोड़ ले लेता है!