अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस समय एक नया समीकरण उभरता दिख रहा है—RAC (रूस-अमेरिका-चीन)। अमेरिका अपनी वैश्विक निर्णायकता बनाए रखने को आतुर है, रूस आर्थिक और रणनीतिक दबाव में है, और चीन एशिया तथा अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटा है। लेकिन इन सबके बीच, भारत ने खुद को निर्णायक केंद्रीय भूमिका में स्थापित कर लिया है।
BRICS में चीनी रणनीति और भारत की टक्कर
BRICS सम्मिट में चीन ने अपने छुपे एजेंडे के तहत ब्रिक्स को एशिया-केंद्रित बना कर भारत को दरकिनार करने की कोशिश की। परंतु प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने हर मोर्चे पर चीन को जवाब दिया। मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और क्षेत्रीय शांति के बिना, भारत चीन के साथ साझेदारी के लिए तैयार नहीं है।
शी जिनपिंग के सम्मिट में कई अहम कार्यक्रमों में हिस्सा न लेने और रात्रिभोज से दूरी बनाने ने यह साफ कर दिया कि भारत की सहमति के बिना ‘एशियन सेंचुरी’ बनाना असंभव है। मोदी का स्पष्ट संदेश था: “जब तक चीन अपनी करतूतें नहीं बदलता, भारत उसका साथ नहीं देगा।”
रूस की मजबूरी और अमेरिका की रणनीति
रूस, पश्चिमी प्रतिबंधों और ऊर्जा संकट के बीच, खुद को प्रासंगिक बनाए रखने को मजबूर है। RAC ट्रायंगल रूस को नई भूमिका दे सकता है, लेकिन इसकी अपनी चुनौतियाँ हैं। अगर यह समीकरण आकार लेता है, तो दुनिया तीन खेमों में बंट सकती है—पश्चिम में अमेरिका, ऊर्जा में रूस और मैन्युफैक्चरिंग/मार्केट्स में चीन।
लेकिन भारत अब निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है। अमेरिका के साथ मजबूत रक्षा-आर्थिक संबंध, चीन को संतुलित करना, और रूस की मजबूरियों का लाभ उठाना—इन सबने भारत की कूटनीतिक स्थिति को नई ऊंचाई दी है। भारत की बढ़ती लोकप्रियता और लोकतांत्रिक छवि के कारण अब दुनिया के 120 से अधिक छोटे देश भी उसके साथ खड़े हैं।
ग्लोबल साउथ और BRICS की दरार
BRICS सम्मिट ने दिखा दिया कि ग्लोबल साउथ अब चीन की कर्ज-जाल नीति से थक चुका है। भारत को अब ये देश एक भरोसेमंद लोकतांत्रिक विकल्प मानते हैं। परिणामस्वरूप, BRICS अब दरारों से जूझ रहा है। अमेरिका ने भी इस मौके को भांपते हुए इन देशों को सुरक्षा और आर्थिक सहयोग के प्रस्ताव देने शुरू कर दिए हैं।
भारत और विश्व के लिए परिणाम
- भारत के लिए: यह उसकी वैश्विक भूमिका के उदय का क्षण है। मोदी सरकार की स्पष्ट विदेश नीति ने भारत को विश्व राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।
- चीन के लिए: भारत की असहमति ने उसकी एशियन सेंचुरी की महत्वाकांक्षा को झटका दिया है।
- रूस के लिए: अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए उसे अब नई रणनीति बनानी होगी।
- अमेरिका के लिए: अब उसे क्षेत्रीय शक्तियों के बढ़ते प्रभाव के साथ तालमेल बैठाना होगा।
तीन ध्रुवीय विश्व: क्या यह खतरनाक है?
सबसे बड़ा खतरा यह है कि दुनिया तीन शक्तिशाली खेमों में बंट सकती है—RAC—और छोटे देशों को किसी एक का साथ देना मजबूरी हो जाएगी। इससे वैश्विक टकराव, संघर्ष और अस्थिरता की संभावना बढ़ सकती है।
निष्कर्ष
BRICS की दरार, RAC समीकरण, और भारत का बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि 21वीं सदी का शक्ति संतुलन अब निर्णायक मोड़ पर है। भारत ने अपनी रणनीतिक चतुराई से खुद को वैश्विक राजनीति के केंद्र में स्थापित किया है। अब देखना यह है कि क्या दुनिया सहयोग की राह चुनेगी या टकराव की।