TMC बागी सांसद मामला: SC ने स्पीकर के लिए समयसीमा तय करने से किया इनकार
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल के तर्कों का सम्मान करते हुए कहा कि संवैधानिक प्राधिकारी के कार्य शेड्यूल में सीधा दखल जरूरी नहीं.
- सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अयोग्यता कार्यवाही के लिए कोई कठोर समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया है.
- यह मामला 20 बागी तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग से जुड़ा है, जिन्होंने एनसीपीआई (NCPI) का रुख किया है.
- अदालत ने सुनवाई के दौरान यह दर्ज किया कि बागी सांसदों ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा है.
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 25 सितंबर: भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के बीच चल रहे एक अहम घटनाक्रम में, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों की अयोग्यता कार्यवाही को लेकर बड़ा रुख स्पष्ट किया है. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के दौरान लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ओम बिरला के खिलाफ पेंडिंग मामलों में कोई सख्त समयसीमा तय करने से परहेज किया. न्यायालय ने कहा कि हालांकि मामलों का निपटारा जल्द होना चाहिए, लेकिन संवैधानिक पद की गरिमा और उसकी कार्यप्रणाली का सम्मान करते हुए सीधे तौर पर समय-सीमा थोपना उचित नहीं है.
क्या है पूरा विवाद और पृष्ठभूमि?
यह पूरा कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी लाइन से बगावत करते हुए एक अन्य राजनीतिक दल (NCPI) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ा ली और संसद में अलग पहचान की मांग की. इस घटना के बाद टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व और सांसद अभिषेक बनर्जी ने दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law / 10th Schedule) के तहत इन सभी 20 बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिकाएं दायर की थीं. पार्टी का तर्क था कि इन सांसदों ने टीएमसी के चुनाव चिह्न पर जीत हासिल की है, इसलिए उनका अन्य दल के पाले में जाना सीधे तौर पर दलबदल के दायरे में आता है.
सॉलिसिटर जनरल की दलीलें और कोर्ट की प्रतिक्रिया
मामले की सुनवाई कर रही तीन सदस्यीय पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश (CJI) कर रहे थे, के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लोकसभा स्पीकर का पक्ष रखा. उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि एक संवैधानिक प्राधिकारी के कामकाज में न्यायिक निगरानी या समयसीमा तय करने का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि स्पीकर इस मामले में एक न्यायाधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य कर रहे हैं. अदालत ने बागी सांसदों की ओर से पेश वकीलों के उस बयान को रिकॉर्ड पर लिया जिसमें उन्होंने नोटिस का जवाब देने के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा है. इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी है.