जब विरोध मर्यादा लांघने लगे: क्या राहुल-प्रियंका आंदोलन को ही लोकतंत्र समझ रहे हैं?

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पूनम शर्मा 

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल महत्वपूर्ण नहीं, अनिवार्य है। सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की आलोचना करना और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना विपक्ष का अधिकार भी है और दायित्व भी। लेकिन लोकतंत्र विरोध और अराजकता, आंदोलन और संस्थागत मर्यादा की अवहेलना के बीच एक स्पष्ट रेखा भी खींचता है।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की हाल की राजनीतिक शैली इसी गंभीर प्रश्न को सामने लाती है—क्या सरकार का विरोध करते-करते कांग्रेस नेतृत्व उस संस्थागत व्यवस्था को ही चुनौती देने लगा है जिसकी रक्षा का दावा वह स्वयं करता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के हालिया प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य नेताओं के खिलाफ आकाशवाणी भवन में कथित रूप से बिना अनुमति प्रवेश करने के मामले में FIR दर्ज की। रिपोर्टों के अनुसार विपक्षी मार्च के लिए पुलिस की अनुमति भी नहीं ली गई थी।

FIR किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करती। अंतिम निष्कर्ष कानून और प्रमाणों से ही निकलेगा। लेकिन राजनीतिक प्रश्न उससे कहीं बड़ा है।

विपक्ष का अर्थ स्थायी आंदोलन नहीं

राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। यह पद केवल सत्ता-विरोध का मंच नहीं बल्कि एक बड़ी संवैधानिक और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

यदि चुनाव आयोग के किसी निर्णय पर आपत्ति है तो संसद है, न्यायपालिका है, संवैधानिक प्रक्रिया है और जनता के बीच जाने का रास्ता है। शांतिपूर्ण आंदोलन भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन हर राजनीतिक असहमति को टकराव में बदल देना लोकतंत्र को मजबूत करता है या राजनीतिक तमाशे को?

इस प्रश्न को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि रिपोर्टों के मुताबिक आकाशवाणी भवन में राहुल-प्रियंका के अचानक धरने के तरीके से INDIA गठबंधन के कुछ सहयोगी भी असहज हुए। कुछ सहयोगियों को लगा कि संयुक्त विपक्ष का आंदोलन गांधी परिवार केंद्रित प्रदर्शन में बदल गया।

यदि अपने सहयोगी ही रणनीति से असहज हों तो कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए। बड़े प्रदर्शनों में पुलिस, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और प्रशासनिक संसाधन लगते हैं। यह अंततः जनता का पैसा और व्यवस्था है। विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन जिम्मेदारी भी लोकतंत्र की आत्मा है।

सत्ता का रास्ता बैरिकेड से नहीं, मतपेटी से निकलता है

कांग्रेस को एक राजनीतिक वास्तविकता स्वीकार करनी होगी—लोकतंत्र में सत्ता आंदोलन से नहीं, जनता के मत से मिलती है।

कांग्रेस आज अपने पुराने राष्ट्रीय प्रभुत्व की तुलना में सीमित राज्यों में सत्ता में है। इसे केवल दूसरों को दोष देने के बजाय संगठन, नेतृत्व, राजनीतिक संदेश और जनता के विश्वास पर गंभीर आत्ममंथन का कारण बनना चाहिए।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को नरेंद्र मोदी का विरोध करने का पूरा अधिकार है। वे भाजपा को चुनाव में हराने के लिए अभियान चला सकते हैं, सरकार की नीतियों की कठोरतम आलोचना कर सकते हैं और जनता के सामने अपना वैकल्पिक दृष्टिकोण रख सकते हैं।

लेकिन सत्ता पर अधिकार केवल मतदाता देता है।यदि चुनाव आयोग पर आरोप हैं तो प्रमाण सामने रखिए। यदि सरकार की नीति गलत है तो उसके मुकाबले बेहतर नीति प्रस्तुत कीजिए। यदि लोकतंत्र खतरे में है तो तथ्यों के साथ देश को समझाइए।

यही मजबूत विपक्ष की पहचान है। नरेंद्र मोदी सरकार भी आलोचना से ऊपर नहीं है। उसे संसद, न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाओं और अंततः मतदाताओं के प्रति जवाबदेह रहना ही होगा। लेकिन यही कसौटी विपक्ष पर भी लागू होती है। लोकतंत्र में सरकार से जवाब मांगा जाता है—और विपक्ष से भी।

कैप्टन स्मित मच्छर का साहस और राजनीति के लिए एक संदेश

इसी समय भारत ने कैप्टन स्मित मच्छर के रूप में असाधारण साहस का उदाहरण देखा। तेल अवीव जा रही flydubai उड़ान में उनके सह-पायलट ने कथित रूप से उन पर हमला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद भारतीय कैप्टन ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता हासिल की, जिससे यात्रियों और चालक दल को हस्तक्षेप करने का अवसर मिला और एक बड़ी त्रासदी टल गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से उनके साहस की प्रशंसा की।

ऐसे साहस को राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर सम्मान मिलना चाहिए। यदि कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा नहीं की, तो मात्र इससे यह सिद्ध होता है कि कांग्रेस भारत या भारतीयों के खिलाफ है। ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध तथ्यों से कहीं आगे चला जाएगा।

लेकिन राष्ट्रीय जीवन में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सत्ता और विपक्ष दोनों की आवाज एक होनी चाहिए—इस भारतीय ने देश को गौरवान्वित किया। कैप्टन मच्छर ने कोई राजनीतिक नारा नहीं लगाया। उन्होंने संकट के क्षण में अपना कर्तव्य निभाया। शायद हमारी राजनीति को भी इसी कर्तव्यबोध की आवश्यकता है।

भारत को मजबूत सरकार चाहिए, लेकिन उतना ही मजबूत विपक्ष भी चाहिए। कमजोर विपक्ष किसी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। लेकिन मजबूत विपक्ष का अर्थ लगातार अव्यवस्था पैदा करना नहीं है।

राहुल और प्रियंका के सामने विकल्प स्पष्ट है—वे तथ्यों, नीतियों, संगठन, जनसंवाद और वैकल्पिक राष्ट्रीय दृष्टि के आधार पर विपक्ष खड़ा करें, या टकराव को ही राजनीति का केंद्र बना दें।

अंतिम फैसला न सरकार करती है, न विपक्ष।

अंतिम फैसला भारत की जनता करती है।

दिल्ली की सत्ता का रास्ता बैरिकेड लांघकर नहीं जाता।

वह मतदाता के दरवाजे से होकर जाता है।

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