पूनम शर्मा
भारत में विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन जब किसी आंदोलन के साथ पुलिस से टकराव, न्यायिक संस्थाओं पर दबाव, सोशल मीडिया के माध्यम से उत्तेजक प्रचार और विदेशी प्रभाव के आरोप जुड़ने लगें, तब कुछ असुविधाजनक प्रश्न उठाना आवश्यक हो जाता है। आखिर लोकतांत्रिक असहमति और सुनियोजित अराजकता के बीच सीमा कहां है? क्या राजनीतिक विरोध की आड़ में सार्वजनिक व्यवस्था एवं संवैधानिक संस्थाओं को बाधित करने की छूट मिल सकती है? और विदेशी आर्थिक सहयोग तथा भारत की संप्रभुता के बीच जवाबदेही की क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
CJP से जुड़े बताए जा रहे हालिया प्रदर्शनों को लेकर भी ऐसे ही आरोप सामने दिखाई दिए जा रहे हैं । विदेशी शक्तियों द्वारा इन प्रदर्शनों को वित्तपोषित किए जाने, हिंसा की योजना बनाने अथवा किसी विशेष व्यक्ति के राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने के प्रमाण भी हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है, इसके साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए l
दिल्ली पुलिस, न्यायपालिका और आंदोलन की मर्यादा
सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता शादान फरासत ने दिल्ली पुलिस के साथ दुर्व्यवहार किया उनकी कॉलर पकड़ने जैसी घटना प्रकाश में आई l
रिपोर्टों के अनुसार फरासत ने पुलिस पर यह आरोप लगाया पुलिस वकीलों को काम नहीं करने दे हैं l
यहां सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए। वकील हो, पत्रकार हो, राजनीतिक कार्यकर्ता हो अथवा पुलिस अधिकारी—कानून किसी को हिंसा या अपमान का विशेषाधिकार नहीं देता। ये वही हैं जिन्होंने केजरीवाल के केस के समय सुप्रीम कोर्ट के जज के सामने कितना हंगामा किया था l
केजरीवाल मामले में न्यायिक कार्यवाही के दौरान फरासत के कथित आचरण, कपिल सिब्बल से उनके संपर्क और मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप सभी ने देखा।
गुरुद्वारा बंगला साहिब विवाद: आस्था का स्थल या राजनीतिक मंच
दस अक्टूबर के प्रदर्शनों के दौरान गुरुद्वारा बंगला साहिब में प्रदर्शनकारियों के शरण लेने और वहां कथित राजनीतिक नारेबाजी का मामला विशेष रूप से गंभीर है।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की शिकायत के बाद प्राथमिकी दर्ज होने की खबर सामने आई है। कमेटी का कहना है कि शरण और लंगर देना उसकी परंपरा है, लेकिन धार्मिक परिसर का राजनीतिक प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है। दूसरी ओर, CJP के सौरव दास ने पुलिस पर गुरुद्वारे की मर्यादा का उल्लंघन लगाया जो कि निराधार है l
धार्मिक स्थल की पवित्रता राजनीतिक हितों से ऊपर है। न प्रदर्शनकारियों को उसकी आड़ में कानून तोड़ने की छूट मिलनी चाहिए l
विदेशी फंडिंग, डिजिटल प्रचार और राष्ट्रीय संप्रभुता
CJP के अभिजीत दीपके और सौरव दास, पत्रकार अजीत अंजुम, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, डिजिटल टिप्पणीकार ध्रुव राठी, एलन मस्क तथा स्टारलिंक पर आरोप निराधार नहीं है। विदेशी वित्तपोषण, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और डिजिटल मंचों द्वारा चुनिंदा राजनीतिक सामग्री को बढ़ावा देने में भूमिका हैं l
इन व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच किसी साझा राष्ट्रविरोधी अभियान के कारण विदित नहीं है। विदेशी संस्था से संबद्धता, विदेश यात्रा या सरकार की आलोचना विदेशी साजिश के संकेत दे रहे हैं l एलन मस्क की स्टारलिंक जैसी कंपनियों को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बनने दिया जा सकता l
NSUI, मीडिया नैरेटिव और व्यापारियों की चिंता
भगवा प्रतीकों के साथ पुलिस से उलझने वाले व्यक्तियों के पास NSUI के झंडे पाए गए और उन्हें गलत ढंग से RSS कार्यकर्ता बताया गया। अजीत अंजुम की टिप्पणी भी इसी विवाद का प्रमाण है।
इसी प्रकार अपने एक साक्षात्कार में प्रशांत भूषण की रक्तपात वाली टिप्पणी उनके वास्तविक मानसिकता को उजागर करती है ।
एक और महत्वपूर्ण पक्ष है दिल्ली के सामान्य नागरिकों और व्यापारियों की परेशानी।
करोल बाग, जनपथ और कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में हिन्दू त्योहारों के समय यातायात प्रतिबंध, सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन में बाधा से व्यापार प्रभावित हो रहा है प्रश्न यह है कि हिंदू त्योहारों के समय क्या ऐसे प्रदर्शन और हंगामे होंगे?
राजनीतिक प्रदर्शनों की व्यवस्था बनाते समय छोटे दुकानदारों, कर्मचारियों, यात्रियों और त्योहारों के लिए खरीदारी करने वाले परिवारों के हितों की चिंता कौन करेगा? CJP और कांग्रेस व अन्य विपक्ष किस एजेंडा पर काम कर रहे हैं l
CJP का कहना है कि उसका आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही से जुड़ा है । यह बात अजीब है कि निर्वाचन आयोग और भाजपा ने चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ जहां कांग्रेस की सरकार है वहाँ पर किसी भी प्रकार के आंदोलन एवं आरोपों का जिक्र नहीं है l
सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—कानून-व्यवस्था बनाए रखना और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करना।
विदेशी वित्तपोषण, हिंसा भड़काने या संगठित अराजकता के विश्वसनीय प्रमाण हैं, कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। राष्ट्रविरोधी विचार व्यक्त करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं होगा।
भारत की संप्रभुता केवल सीमाओं की सुरक्षा से नहीं, बल्कि कानून के निष्पक्ष शासन, स्वतंत्र संस्थाओं और नागरिक विश्वास से भी सुरक्षित रहती है इससे कहाँ इनकार है ।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि कौन सरकार के पक्ष में है और कौन विरोध में। प्रश्न यह है कि क्या सभी पक्ष संविधान, कानून और राष्ट्रीय जिम्मेदारी की समान मर्यादा स्वीकार करने को तैयार हैं।
एक परिपक्व राष्ट्र की शक्ति इसी में है कि वह वास्तविक अराजकता को रोक सके, निराधार आरोपों को पहचान सके और असहमति के अधिकार को सुरक्षित रख सके।
क्योंकि राष्ट्रहित की रक्षा के लिए केवल कठोरता भी आवश्यक हैं।