CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई का आदेश, सात दिन बाद न्यायिक हिरासत समाप्त

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  • सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद दोनों CJP नेताओं की रिहाई का आदेश।
  • दिल्ली पुलिस ने तीन दिन की अतिरिक्त हिरासत मांगी थी।
  • मामला जंतर-मंतर में प्रवेश और शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड के कथित उल्लंघन से जुड़ा है।
  • दिल्ली हाईकोर्ट ने इससे पहले दोनों नेताओं को उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी थी।

समग्र समाचार सेवा

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली की विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) अदालत ने बुधवार को न्यायिक हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया। दोनों नेता 14 अक्टूबर से न्यायिक हिरासत में थे।

जंतर-मंतर प्रदर्शन से शुरू हुआ विवाद

13 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका ने जंतर-मंतर के बंद द्वार पर चढ़कर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। दिल्ली पुलिस के अनुसार, यह स्थान पहले ही अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया जा चुका था। पुलिस ने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं की गतिविधियां पहले दिए गए शांति बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन थीं।

14 अक्टूबर को दोनों को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। इसके बाद 19 अक्टूबर को हिरासत दो दिनों के लिए बढ़ाई गई।

दिल्ली हाईकोर्ट में भी हुई सुनवाई

दोनों नेताओं ने हिरासत बढ़ाए जाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं को पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही कार्यवाही के परिणाम की प्रतीक्षा करने की सलाह दी। इसके बाद याचिका वापस ले ली गई।

मजिस्ट्रेट ने दिया रिहाई का आदेश

बुधवार को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं की जमानत संबंधी प्रतिभूतियां प्रस्तुत की गईं। दिल्ली पुलिस ने हिरासत तीन दिन और बढ़ाने का अनुरोध किया था, लेकिन मजिस्ट्रेट ने रिहाई का आदेश पारित किया।

विरोध का अधिकार और कानून का पालन

यह मामला सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के अधिकार तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू नियमों के बीच संतुलन का प्रश्न भी सामने लाता है। भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों के उपयोग और सुरक्षा संबंधी कानूनी प्रतिबंधों का पालन भी आवश्यक है। दोनों नेताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम कानूनी निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होगा। रिहाई का आदेश अपने आप में आरोपों पर अंतिम निर्णय नहीं है।

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