- चुनाव आयोग ने एसआईआर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब।
- विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए 15 बिंदुओं का हलफनामा सौंपा।
- आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 01 नवंबर: देश के राजनीतिक गलियारों और न्यायिक मंचों पर मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चल रहे घमासान के बीच भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) ने सर्वोच्च अदालत में कड़ा रुख अपनाया है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत 15-सूत्रीय जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल किया है, जिसमें विपक्ष द्वारा लगाए गए तमाम गंभीर और राजनीतिक आरोपों का बिंदुवार खंडन किया गया है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, संवैधानिक और नियमों के दायरे में रहकर संचालित की जा रही है, तथा संस्था की निष्पक्षता पर उठाए गए सवाल पूरी तरह निराधार हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ याचिका और एकतरफा फैसलों के दावों का खंडन
सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए इस हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने मुख्य रूप से उस याचिका का कड़ा विरोध किया है जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानलेश कुमार की शक्तियों को चुनौती दी गई थी और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होती है, और उन्हें हटाने या उनके अधिकारों को सीमित करने की मांग वाली याचिकाएं कानूनन कतई टिकने योग्य (Maintainable) नहीं हैं।
इसके साथ ही, आयोग ने उन दावों को भी सिरे से खारिज कर दिया जिनमें यह कहा जा रहा था कि एसआईआर (SIR) या उससे जुड़े अहम प्रशासनिक फैसले किसी एक व्यक्ति द्वारा एकतरफा तरीके से लिए गए हैं। आयोग ने कोर्ट को बताया कि जून 2025 में एसआईआर आयोजित करने का निर्णय किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आयोग के भीतर पूरी तरह सर्वसम्मति (Unanimously) से लिया गया था।
फॉर्म 6 और ऑनलाइन प्रक्रियाओं पर स्थिति स्पष्ट
विपक्षी दलों और याचिकाकर्ताओं द्वारा यह आरोप लगाया गया था कि फॉर्म 6 (Form 6) में मनमाने बदलाव किए गए हैं। इस पर चुनाव आयोग ने अपनी सफाई में स्पष्ट किया कि ‘फॉर्म 6’ में किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं किया गया है, क्योंकि इस फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन डिस्प्ले को लेकर कुछ तकनीकी भ्रम की स्थिति जरूर बनी थी, जिसे तुरंत सुधारा जा रहा है। ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया को भौतिक फॉर्म की तर्ज पर अलग-थलग कर दिया गया है ताकि किसी भी मतदाता को कोई असुविधा न हो।
आयोग ने यह भी आश्वस्त किया कि असत्यापित या ‘अनमैपड’ (Unmapped) मतदाताओं को अनावश्यक रूप से सुनवाई के लिए लंबी कतारों में खड़े होने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) स्वयं उनके घर जाकर दस्तावेज एकत्र कर रहे हैं, और केवल अत्यंत असाधारण मामलों में ही सुनवाई की आवश्यकता होती है, वह भी डिजिटल माध्यम से प्राथमिकता के आधार पर की जा रही है।
आंतरिक पत्रों और मीडिया लीक पर निर्वाचन आयोग की दो टूक
विपक्ष द्वारा आयोग के भीतर के कुछ प्रशासनिक पत्रों और आंतरिक पत्राचार को आधार बनाकर उठाए गए सवालों पर भी आयोग ने तीखी प्रतिक्रिया दी। आयोग ने कहा कि अधिकारियों और कैबिनेट सचिव के बीच हुए संवाद को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाना पूरी तरह भ्रामक है। वे पत्र केवल सामान्य प्रशासनिक और कार्य-आवंटन (Work Allocation) से जुड़े मामले थे। साथ ही, आयोग ने कड़ाई से यह भी स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग ने कभी भी किसी भी आंतरिक नोट या गोपनीय फाइल को मीडिया में सार्वजनिक करने के लिए अधिकृत नहीं किया था।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं की गरिमा सर्वोपरि
कानूनी जानकारों का मानना है कि चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया यह 15-सूत्रीय हलफनामा इस विवाद में एक बड़ा मोड़ साबित होगा। एक तरफ जहां राजनीतिक दल रैलियों और प्रदर्शनों के जरिए सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आयोग ने अदालत के समक्ष तथ्यात्मक और कानूनी दस्तावेज रखकर अपनी स्थिति को पूरी तरह मजबूत कर लिया है।
निष्कर्ष
एसआईआर (SIR) और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के मुद्दे पर चुनाव आयोग का यह विस्तृत हलफनामा इस बात का प्रतीक है कि संवैधानिक संस्थाएं अपनी स्वायत्तता और पारदर्शिता की रक्षा के लिए कानूनी मंच पर पूरी तरह मुस्तैद हैं। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।