सोशल मीडिया : छोड़ भागें या डटे रहें?

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डा. रमेश अग्रवाल

साहस कीचड़ में नहाने, जांघिये में बाजार से
गुजरने और चौराहे पर सिर के बल खड़े होने का

क्या आपने भी सोशल मीडिया नाम की रंगारंग दुनिया में हाल ही पैर धरा है या पैर धरने की सोच रहे हैं? अथवा क्या आप पहले से सोशल मीडिया इन्फ्लुएन्सर नाम का रिबिन गले में टांगे एक लाख लाइक्स, पांच लाख फालोअर्स और पचास लाख व्यूज के आंकड़े अपने बिस्तर के नीचे कंकड़ों की तरह दबाए रात रात भर करवट बदलने के लिये मजबूर हो रहे हैं? यदि ऐसा है तो बेशक अपने इन सपनों को संयोये रखिये मगर इससे पहले कि आपकी असली जिन्दगी के सुनहरे दिन जादुई फलों की तरह हाथ से फिसल जाये कुछ बातों पर गौर फरमा लीजिये।

आगे बढ़ने से पहले, सोशल मीडिया से ही जुड़ी हाल की कुछ वास्तविक घटनाओं पर एक नजर डालना कतई गैर मुनासिब नहीं होगा। 24 वर्षीय ला ग्रेजुएट मिशा अग्रवाल के सोशल मीडिया पर साढे तीन लाख फालोअर्स थे । मिशा का टारगेट जल्दी से जल्दी 10 लाख फालोअर्स तक पहुंचने का था मगर अचानक इन्स्टाग्राम पर उसके फालोअर्स की संख्या घटने लगी। परिवार का कहना है कि मिशा को लगने लगा उसकी जिन्दगी का सब कुछ जा रहा है और वह बेकार होती जा रही है। उसकी विश्वसनीयता खत्म हो रही है।अपने 25 वे जन्मदिन से दो दिन पहले यकायक मिशा ने वाल पेपर पर लिखा टारगेट दस लाख, और अपनी जिंदगी को अलविदा कह दिया।

चेन्नई के एक 27 वर्षीय यू ट्रयूबर वी.हरीश पिछली 20 अक्टूबर को अपने ही घर में मृत पाये गये। कहते हैं उनके फाइनेन्स एडवाइजिंग चैनल पर 13 लाख से ज्यादा फालोअर थे मगर बगैर सेबी लाइसेन्स के वित्तीय सलाह देने के आरोप में उनका चैनल फाइनेन्स विद हरीश ब्लाक कर दिया गया । हरीश को लगने लगा उसकी जिन्दगी भर की कमाई पानी में डूब गई। जले पर नमक की तरह प्रतिद्वन्द्वी यू ट्यूबर्स के लगातार डिजिटल अटैक और निरन्तर बुलिंग से दुखी होकर उन्होंने बजाय डिजिटल दुनिया को बाय करने के सारी दुनिया को ही बाय कर डाला।

सूरत के प्रतीक पटेल ने सोशल मीडिया के लिये 376 रीलें बनाई थीं और उनके 7923 फालोअर थे मगर अपेक्षित लोकप्रियता न बढने से वे लम्बे समय से अवसाद में थे और इसी अवसाद में उन्होंने एक दिन जहर खा कर जान दे दी।

राष्ट्रीय स्तर के एक समाचार पत्र में काम कर चुके हमारी ही पत्रकार बिरादरी के एक सम्मानित जन ने पिछले दिनों यह कहते हुए सोशल मीडिया से सन्यास लेने की घोषणा की, कि जीवन भर काफी कुछ लिख लेने के बाद अब वे परिवार को समय देना चाहते हैं। समझा जा सकता है कि वास्तविकता क्या रही होगी। मेरा यह आलेख विशेष रूप से ऐसे ही साथियों के लिये है जो अपने जमाने के नामी गरामी लेखक, पत्रकार अथवा रचनाकार रह चुके हैं मगर आपाधापी और रोलदट्‌ट भरी सोशल मीडिया की दुनिया में अपने लिये जगह नहीं बना पा रहे हैं । इन साथियों के लिये इस चकाचौंध भरी दुनिया की कुछ वास्तविकताएं शेयर करना निश्चय ही उपयोगी होगा।

सोशल मीडिया की अजीबो गरीब सी इस दुनिया में लोकप्रियता के भी अजीबो गरीब पैमाने हैं जहां तथाकथित सफलता को उपर वर्णित इन्हीं लाइक्स, कमेन्ट्स अथवा फालोअर्स की संख्या से नापा जाता है। एक नजर गौर फरमाएं आंकड़ों की यह कृपा किन लोगों की और कैसी कन्टेन्ट पर अब तक बरसती रही है। अब से सिर्फ 9 साल पहले विडूली रिपोर्ट के अनुसार 2.9 करोड़ व्यूज पा चुकी ढिंचक पूजा का यह गीत, सैल्फी मैने ले ली आज, मेरे सर पे रहता ताज, औडी में मैं घूमूं अपने फ्रेन्ड्स के साथ …क्या आज किसी को याद है शायद नहीं मगर 90 साल पहले महादेवी वर्मा द्वारा लिखित इस गीत की पंक्ति मैं नीर भरी दुख की बदली.. स्पंदन में निस्पंद बसा: क्रन्दन में आहत विश्व हंसा। आज भी प्रबुद्ध जन की जुबान पर मौजूद है। करीब चार साल पहले पश्चिम बंगाल के मुंगफली बेचने वाले भुवन को उनकी मुंगफली बेचने की शैली के लिये 2 करोड़ व्यूज मिले। आज हरिवंश राय बच्चन होते तो क्या इस मुंगफली वाले से ईष्या करते जिन्होंने वर्ष 1935 में लिखा था, मुसलमान औ हिन्दू हैं दो एक मगर उनका प्यला, एक मगर उनका मदिरालय एक मगर उनकी हाला। 24 वर्षीय बालक मृदुल तिवारी के इसलिये 1.8 करोड़ फालोअर बन गये कि वे अपनी 3 करोड़ की लेम्बोर्गिनी कार से यू ट्यूब पर स्टन्ट दिखाते थे। यह बात अलग है कि बाद में दो निर्माण श्रमिकों की जान लेने के बाद उन्हें तेरह ताड़ी के पार जाना पड़ा। ऐसे ही कुछ युवक शो रूम से उठाई नई नवेली कार को कीचड़ में रगड कर करोड़ों व्यूज जुटा रहे हैं, एक तांगेवाला अपनी पत्नी से झगड़े का वीडियो हर रोज जारी कर लाखों लाइक्स पा रहा है तो एक यू ट्यूब सितारा कीचड़ में नहा कर लोगों की आंखों का तारा बना हुआ है।

मैं अपने रचनाधर्मी दोस्तों को भी मशविरा देना चाहता हूं कि अगर वे भी लाखों करोड़ों लाइक्स और व्यूज में नहा कर ऐसा ही कोई स्टार बनने के लिये काम कर रहे हैं तो कोई अच्छी कविता, कोई अच्छी कहानी, कोई अच्छा आलेख, कोई अच्छा चित्र रचने के बजाय नीचे बताए कुछ प्रयोग करके देखें गारंटेड आप को सुबह से शाम तक कम से कम एक लाख व्यूज मिलेंगे। आप किसी ऊंचे पद से सेवा निवृत हुए हैं तो उस पद के नाम की तख्ती गले में लटका कर आधा घंटे के लिये सिर्फ जांघिये में भरे बाजार से गुजर जाइये, कोई डाक्टर हैं तो बदन पर भभूत लगा कर नंगे बदन चौराहे पर शीर्षासन करने लग जाइये।, कोई बड़े उद्योग पति हैं तो फटे कपड़े पहन कर बाजार में गालियां बकते हुए निकल जाइये…. क्या है आप में इतना साहस । आप कहेंगे नहीं।

यदि नहीं तो मेरे पास आपके लिये फिर दूसरा मश्विरा है और वह है धैर्य, विवेकशीलता और स्वर्णिम मद्यम मार्ग का रास्ता। मुझे याद है समाचार पत्र में काम करते हुए अपने वे दिन, जब कोई आलेख छपने के बाद भी न कोई लाइक मिलता था न कमेन्ट मगर इसलिये निरन्तर लिखते थे क्योंकि जब कभी लोगों के बीच पहुंचने का अवसर मिलता,अपने लेखन की सार्थकता अथवा निरर्थकता स्वयं सिद्ध हो जाती थी। इसके लिये कठिन धैर्य की जरूरत होती थी। इतिहास गवाह है कि 19 वी. शताब्दी के आरम्भ में राजा राममोहन राय के आलेख जिस संवाद कौमुदी में छपते थे उसकी मात्र दो से तीन सौ प्रतियां प्रकाशित होती थीं मगर विचारों की मौलिकता, इरादों की मजबूती और लेखकीय विश्वसनीयता की बदौलत इस मामूली प्रसार संख्या ने सती प्रथा, बाल विवाह और महिला अधिकारों को लेकर देश भर में जबर्दस्त हवा बना दी थी। तिलक के केसरी ने मात्र साढे तीन सौ के आसपास प्रतियों से देश के युवाओं में आग फूंक दी।गांधी ने यंग इंडिया और हरिजन जैसे सीमित प्रसार संख्या वाले पत्रों मे लेख लिख कर देश को एक जगह इकट्‌ठा कर दिया। कहने का अर्थ सिर्फ यह है कि आपकी बात कितने लोगों तक पहुंची इसके बजाय महत्व इस बात का है कि कैसे लोगों तक पहुंची तथा किस रूप में पहुंची। इसके लिये जरूरत सिर्फ धैर्य और निरन्तरता की है। सोशल मीडिया की चकाचौंध से दूरी बना लेने के बजाय प्रबुद्धजन को इसी आकाश गंगा में अपना एक अलग संसार बसाना होगा, जहां के सभी निवासी शाश्वत मूल्यों, स्थापित परम्पराओं, नैतिक मर्यादाओं का स्वयं भी सम्मान करें और ऐसा करने वालों का हौंसला भी बढाएं।

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