सियासत में क्या झटका, क्या हलाल?

राकेश अचल
सियासत बडी हरजाई है।कभी सिर बैठाती है तो कभी ऐसी रूठ जाती है कि मिट्टी में मिला देती है।धनतेरस पर मुझे धन के बारे में लिखना चाहिए था लेकिन मैं लिख रहा हूँ सियासी झटकों और सियासी हलाला के बारे में।
धनतेरस तो हर साल आती है।अपने साथ पुष्य नक्षत्र बी लाती है किंतु सियासी झटके हर साल नहीं लगते।सियासी झटके इलेक्शन के समय ही लगते हैं।कभी ईलेक्शन से पहले तो कभी इलेक्शन के बाद।झटके जोर के भी होते हैँ और धीमे भी।कुछ सहने लायक होते हैं तो कुछ असहनीय।
अब इजराइल में मौजूदा प्रधानमंत्री नेटनयाहू को जबरदस्त झटका लगा है।वे अल्पमत मे हैँ और कोई उनके साथ सरकार बनाने के लिए राजी नहीं हैं।यानि साहब क डिब्बा गोल।अब शायद जेल यात्रा करना पडे।लगता है कि नेटनयाहू को ईरानी बच की बदुआ लगी है। लाखों फिलिस्तीनियों की बदुआ लगी हैँ।

दुआ हो या बदुआ अपना असर दिखाती ही है। नेटनयाहू के मित्र अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी सबसे बडा झटका लगा है।वे घर के रहे न घाट के।न सीनेट में बहुमत है और न हाउस आफ रिप्रिजेंटेटिव्ह में।ट्रंप को लगे झटके से वे लोग भी हिलते दिखाई दे रहे हैं जो अब तक ट्रंप के भरोसेअपने देश की सत्ता चला रहे हैं।
सियासी भूडोल भी उस भूडोल की ही तरह होता है जो जमीन के नीचे होती हैं।भूडोल कभी विनाशक होता है तो कभी भयभीत करने वाला।इजराइल और अमेरिका में आए सियासी भूडोल की वजह से दुनिया में खलबली है।शेयर बाजार ऊपर -नीचे हो रहे हैं।कोई उबर रहा है तो कोई डूब रहा है।कुछ का सोया नसीब जाग रहा है।

सियासी भूडोल तो हमारे अपने मुल्क में भी खूब नजर आ रहे हैं।सत्य और सत्ता दोनो के बीच संघर्ष जारी है।नौबत तू- तडाक तक आ गयी है।लोग एक- दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे।सब एक-दूसरे को गद्दार,देशद्रोही कहते नहीं थक रहे।किसी को नानी याद आ रही है कोई बाप तक जा पहुंचा है।बेचारी जनता जहाँ थी उससे भी बुरे हाल में धकेली जा रही है।
असली सवाल ये है कि ये झटके की और हराम की सियासत कब तक चलेगी?भारत में अभी आम चुनाव में वक्त है,फिर भी दो महीने बाद आप यहाँ भी अमेरिका की ही तरह मध्यावधि चुनाव जैसे झटके महसूस कर सकते है।क्योंकि यहाँ भी 7 राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले है।इन चुनावों देशी और विदेशी कनेक्शन की भी पोल खुलने वाली है।

सियासत में धन का अपना महत्व है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्व सत्ता का है। यहां कुर्सी ही सबसे बड़ा धन है।जिसके पास कुर्सी है, उसके लिए सब कुछ शुभ है और जिसकी कुर्सी चली गई, उसके लिए अच्छे दिन भी बुरे दिनों में बदल जाते हैं।
सियासत में झटका भी लगता है और हलाल भी किया जाता है। फर्क इतना है कि झटका अचानक लगता है, जबकि हलाल करने की प्रक्रिया लंबी होती है।पहले राजनीतिक रूप से कमजोर किया जाता है, फिर समर्थकों को तोड़ा जाता है, फिर सहयोगियों को दूर किया जाता है और अंत में ऐसा राजनीतिक फैसला सुनाया जाता है कि बेचारा नेता अपनी ही पार्टी में बेगाना हो जाता है।
सियासत में हलाल होने के लिए विरोधी होना जरूरी नहीं है। कई बार अपने ही लोग यह पुण्यकार्य कर देते हैं। यहां दोस्ती और दुश्मनी दोनों की कोई स्थायी गारंटी नहीं है। सुबह जो नेता आपके साथ मंच साझा कर रहा होता है, शाम को वही आपकी कुर्सी के नीचे से जमीन खींच सकता है।

कभी-कभी तो राजनीति में ऐसा हलाला भी होता है कि कल तक जिसे अछूत बताया जाता था, आज उसी के साथ सत्ता का निकाह पढ़ लिया जाता है। विचारधारा को कुछ समय के लिए छुट्टी पर भेज दिया जाता है। पुराने आरोपों पर पर्दा डाल दिया जाता है और नई राजनीतिक मजबूरी को जनहित का नाम दे दिया जाता है। कल तक जो भ्रष्ट था, आज वह अनुभवी हो जाता है। जो अवसरवादी था, वह राष्ट्रहित में निर्णय लेने वाला नेता कहलाने लगता है।
सियासत में न कोई स्थायी दोस्त है और न स्थायी दुश्मन। स्थायी है तो सिर्फ सत्ता की भूख और कुर्सी की मोहब्बत। यहां सिद्धांतों का इस्तेमाल भी जरूरत के हिसाब से होता है। जब विपक्ष में होते हैं तो लोकतंत्र खतरे में दिखाई देता है और सत्ता में आते ही वही लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित नजर आने लगता है।

लेकिन जनता भी अब सब कुछ चुपचाप देखने वाली नहीं रही। वह कभी वोट की चोट से झटका देती है तो कभी सत्ता के अहंकार को आईना दिखा देती है। चुनाव के समय नेता जनता को अपने पक्ष में करने के लिए तरह-तरह के वादे करते हैं, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद जनता को ही समझाया जाता है कि उसने क्या सही किया और क्या गलत।

अमेरिका हो या भारत, लोकतंत्र का एक ही दस्तूर है। जनता जब चाहती है तो बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं को जमीन पर ला देती है। कोई चुनावी झटके से बच नहीं पाता। कोई सत्ता के हलाल होने से बच नहीं पाता।
इसलिए धनतेरस पर धन की पूजा करने वालों को यह भी समझ लेना चाहिए कि सियासत में सबसे अस्थायी धन सत्ता है। आज है तो कल नहीं भी हो सकती। लक्ष्मी चंचला हैं, लेकिन सियासी कुर्सी तो उनसे भी ज्यादा चंचला निकली।आखिर में सवाल यही है कि सियासत में झटका कौन दे रहा है और हलाल कौन हो रहा है? नेता, पार्टी या जनता?

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