समग्र समाचार सेवा लखनऊ, जून 6 —उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अभी से कमर कस ली है। यह कोई सामान्य स्थानीय चुनाव नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है, और यही कारण है कि भाजपा इसे संगठनात्मक विस्तार और जमीनी पकड़ मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रही है।
रणनीति का पहला चरण: परिसीमन और मतदाता सूची
भाजपा के रणनीतिकार इस बार चुनाव की नींव मतदाता सूची के पुनरीक्षण और पंचायतों के परिसीमन पर रख रहे हैं। प्रदेश संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह के मुताबिक, मंडल और जिला स्तर पर टीमें बनाई जाएंगी जो मतदाता सूची की खामियों को दुरुस्त करेंगी, नए मतदाताओं को जोड़ेगी और फर्जी नामों को हटवाने का प्रयास करेंगी। परिसीमन का मुद्दा भी अहम है, क्योंकि कई ग्राम पंचायतें अब नगर निकायों में शामिल हो चुकी हैं, जिससे सीमा निर्धारण का समीकरण बदला है।
यह तैयारी दर्शाती है कि भाजपा पंचायत चुनाव को सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति परीक्षण मान रही है। पार्टी यह भी मानती है कि समर्थित उम्मीदवारों की जीत से गांव स्तर पर संगठन का जनाधार बढ़ेगा, जो विधानसभा चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।
सहयोगी दलों का अलग रुख – भाजपा के लिए चुनौती
लेकिन भाजपा की इस एकजुट रणनीति में सबसे बड़ी दरार उसके अपने गठबंधन सहयोगी दलों से पैदा हो रही है। एनडीए में शामिल निषाद पार्टी, अपना दल (एस), और सुभासपा—इन तीनों दलों ने संकेत दे दिए हैं कि वे पंचायत चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ना चाहते हैं।
विशेष रूप से अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल की हालिया लखनऊ यात्रा के दौरान दिए गए बयान ने भाजपा को असहज कर दिया है। उन्होंने कहा कि अभी तक एनडीए में पंचायत चुनावों को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है और अगर कोई सहमति नहीं बनती, तो पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी।
यह स्थिति भाजपा के लिए कई स्तरों पर चिंता का विषय है। पहला, इससे ग्रामीण क्षेत्रों में एनडीए का मतदाता आधार बंट सकता है। दूसरा, इससे स्थानीय स्तर पर राजनीतिक असमंजस और कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। और तीसरा, यह संदेश विपक्ष को मजबूत करता है कि भाजपा गठबंधन में एकजुटता नहीं दिखा पा रही है।
पिछला चुनाव: सीटें कम, प्रमुख ज्यादा
2021 के पंचायत चुनावों में भाजपा को जिला पंचायत सदस्य के तौर पर 3050 वार्डों में सिर्फ 543 सीटें मिली थीं, जबकि सपा को 699 और बसपा को 357। लेकिन भाजपा ने राजनीतिक कौशल दिखाते हुए 75 में से 67 जिला पंचायत प्रमुख की सीटें जीत ली थीं। यह बताता है कि भाजपा का फोकस केवल जीतने पर नहीं, बल्कि सत्ता में पकड़ बनाने पर होता है। ऐसे में 2025 का पंचायत चुनाव न केवल स्थानीय स्तर की परीक्षा है, बल्कि गठबंधन की एकजुटता और पार्टी की संगठनात्मक क्षमता की कसौटी भी बनेगा।
निष्कर्ष: सेमीफाइनल की शुरुआती चालें
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से भाजपा न केवल 2027 की तैयारियों की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी देखेगी कि क्या वह गठबंधन धर्म को सफलतापूर्वक निभा पा रही है या नहीं। सहयोगियों का स्वतंत्र चुनाव लड़ना इस शक्ति प्रदर्शन को कमजोर कर सकता है। भाजपा के पास अभी समय है—या तो वह गठबंधन को साध ले, या फिर चुनाव को पूरी तरह अपने बूते जीतने की रणनीति पर चले।
भविष्य की राजनीतिक दिशा क्या होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल, भाजपा की यह शुरुआती सक्रियता इस बात का संकेत है कि पंचायत चुनाव अब केवल ग्राम प्रधानों का मामला नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई का ट्रेलर बन चुका है।