‘दो-राष्ट्र सिद्धांत की सोच देश के लिए खतरा’: नागपुर में बोले मोहन भागवत, आत्मनिर्भरता और एकता पर दिया जोर
समग्र समाचार सेवा नागपुर, 6 जून : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गुरुवार को नागपुर में आयोजित ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग-2’ के समापन समारोह में संबोधित करते हुए देश की जनता से आत्मनिर्भरता और एकता बनाए रखने की अपील की। उन्होंने ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ की मानसिकता को देश की अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए खतरा बताया।
“जब तक दो-राष्ट्र सिद्धांत की सोच जीवित है, तब तक देश को खतरा है”
मोहन भागवत ने कहा, “देश को तब तक खतरा बना रहेगा जब तक दो-राष्ट्र सिद्धांत की सोच बनी रहेगी और जब तक दोहरी बातें बंद नहीं होंगी। युद्ध का स्वरूप बदल चुका है, तकनीक बदल चुकी है, लेकिन सच्चाई सामने लाती है कि कौन राष्ट्र के पक्ष में खड़ा है और कौन नहीं।” उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से उन विचारधाराओं की आलोचना की जो भारत की एकता को तोड़ने की कोशिश करती हैं।
आधुनिक युद्ध, साइबर खतरों और प्रॉक्सी वॉर की चेतावनी
भागवत ने वर्तमान समय में बदलते युद्ध के स्वरूप की ओर इशारा करते हुए कहा कि आज का युद्ध सिर्फ मैदानों में नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी लड़ा जा रहा है। “आज साइबर युद्ध, मीडिया प्रॉक्सी वॉर, और वैचारिक युद्ध का युग है। हमें तकनीकी आत्मनिर्भरता की आवश्यकता है। हम किसी को अपना दुश्मन नहीं मानते, लेकिन तैयार रहना ज़रूरी है। आत्मनिर्भरता ही एकमात्र रास्ता है।”
पहलगाम आतंकी हमले पर श्रद्धांजलि और देश की एकता की सराहना
हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले पर मोहन भागवत ने गहरा दुख व्यक्त किया और शहीदों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा, “हमारे जवानों की शहादत देश के लिए प्रेरणा है, लेकिन उससे भी अधिक सराहनीय है देश की जनता की एकजुट प्रतिक्रिया। यही भारत की असली ताकत है—जनता की आत्मा और उसकी जिजीविषा।”
धार्मिक विभाजन और हिंसा के विरुद्ध सख्त संदेश
भागवत ने समाज में बढ़ती असहमति और धर्म आधारित उकसावे पर भी चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि, “किसी भी स्थिति में समाज के किसी भी वर्ग को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहिए। हिंसा कोई समाधान नहीं है। हमें समझदारी से, शांति से, और सामाजिक समरसता के साथ आगे बढ़ना होगा।” उन्होंने यह भी कहा कि कुछ शक्तियाँ हैं जो समाज को बांटने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन भारत का सामाजिक ताना-बाना बहुत मजबूत है।
अतिथि वक्ता अरविंद नेताम का बयान: “संघ का योगदान अतुलनीय”
कार्यक्रम में पूर्व कांग्रेस सांसद और मुख्य अतिथि अरविंद नेताम ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा, “देश की एकता, अखंडता और सेवा कार्यों में संघ ने जो योगदान दिया है, वह आज तक कोई दूसरा संगठन नहीं दे पाया। सबसे बड़ी समस्या आज भी धार्मिक परिवर्तन (कन्वर्ज़न) की है, और इस मुद्दे पर सिर्फ संघ ही समाज को दिशा दे सकता है। संघ के सहयोग के बिना समाज कोई ठोस उपलब्धि नहीं पा सकता।”
नेताम ने संघ के सेवा कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि जब भी देश पर कोई संकट आया, संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा में आगे आए। “संघ की विचारधारा राष्ट्र को जोड़ने वाली है, न कि तोड़ने वाली।”
समापन संदेश: आत्मबल और राष्ट्रप्रेम ही असली शक्ति
कार्यक्रम के अंत में मोहन भागवत ने कहा, “देश की रक्षा सिर्फ सेना या सरकार से नहीं होती, बल्कि वह होती है समाज की आंतरिक शक्ति से—उसके नागरिकों के आत्मबल से। हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह देश के प्रति निष्ठा रखे, समाज में एकता बनाए रखे और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े। यही भारत को विश्वगुरु बना सकता है।”
मोहन भागवत का यह भाषण आज के भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ बाहरी और भीतरी चुनौतियाँ निरंतर उभर रही हैं। चाहे वह धार्मिक उन्माद हो, विचारधारात्मक टकराव हो या तकनीकी खतरे—संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि भारत को हर स्तर पर आत्मनिर्भर बनना होगा और एकता को सर्वोपरि रखना होगा।