“गहलोत की साजिश नाकाम, संजीवनी घोटाले में कोर्ट से बरी हुए शेखावत

बोले – बदनाम करने से तुम्हारा काम बनता है, तो एक अहसान और सही”

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समग्र समाचार सेवा
राजस्थान 25 जुलाई : राजस्थानकी राजनीति में एक बार फिर तलवारें खिंच गई हैं। केंद्रीय मंत्री और जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत ने संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव घोटाले के बहाने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर तीखा हमला बोला है। अपने एक बयान में शेखावत ने न सिर्फ गहलोत की मंशा पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी आरोप लगाया कि उनके पुत्र वैभव गहलोत का राजनीतिक भविष्य संवारने के लिए उन्हें झूठे आरोपों में फँसाने की साजिश रची गई।

संजीवनी केस: एक राजनीतिक हथियार?

गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि संजीवनी को-ऑपरेटिव घोटाले में उनका नाम जानबूझकर घसीटा गया, जबकि वे किसी भी रूप में इस घोटाले से जुड़े नहीं थे। उन्होंने दावा किया कि उच्च न्यायालय ने भी उन्हें दोषमुक्त माना है और यह सच्चाई खुद अशोक गहलोत भली-भांति जानते हैं। इसके बावजूद, उन्हें बदनाम करने और कानूनी शिकंजे में फँसाने की पूरी कोशिश की गई।शेखावत ने कहा –

“मुझे बदनाम करने से तुम्हारा काम बनता है तो चलो एक अहसान और सही…”
यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी केवल व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक व्यथा भी प्रकट करती है। वह यह इशारा कर रहे हैं कि यदि गहलोत की राजनीति या उनके बेटे की प्रासंगिकता मेरे अपमान से बच सकती है, तो मैं इस अपमान को भी ‘अहसान’ मानने को तैयार हूँ।

जनता बनाम परिवारवाद:

शेखावत ने जोर देकर कहा कि उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह है कि जोधपुर की जनता ने उन्हें अपार स्नेह दिया और उनके परिश्रम ने जनता के बीच इतनी लोकप्रियता दिलाई कि न सिर्फ वैभव गहलोत की चुनावी जमीन खिसक गई, बल्कि खुद अशोक गहलोत की राजनीतिक पकड़ भी कमजोर हो गई।

यह बयान स्पष्ट करता है कि शेखावत केवल कानूनी मोर्चे पर नहीं, बल्कि नैतिक और जनादेश के स्तर पर भी खुद को विजयी मानते हैं।

“पीड़ितों की वेदना से मत खेलिए”:

शेखावत ने गहलोत को सीधे शब्दों में नसीहत दी कि वे संजीवनी घोटाले के हजारों पीड़ितों की वेदना का इस्तेमाल अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए न करें। उनका कहना है कि यदि गहलोत सच में संवेदनशील होते, तो अपने मुख्यमंत्री काल में पीड़ितों के लिए कोई ठोस राहत योजना लाते। लेकिन इसके विपरीत, उन्होंने एक राजनीतिक प्रतिशोध के तहत झूठे मुकदमों की साजिश रची।

“यदि वे सरकार का मुखिया रहते हुए मुझे फँसाने के बजाए ईमानदारी से पीड़ितों को राहत पहुँचाने का प्रयास करते, तो पीड़ितों का कुछ भला अवश्य हो सकता था।”

गहलोत की प्रासंगिकता पर हमला:

अपने बयान के अंत में शेखावत ने बेहद तीखे शब्दों में गहलोत की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर भी सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि भाजपा की प्रचंड विजय के बाद गहलोत अपने ही दल में अप्रासंगिक हो गए हैं, और ऐसी स्थिति में वह केवल शेखावत का नाम लेकर खुद को पार्टी में “जिंदा” रखने का प्रयास कर रहे हैं।

“यदि मेरे नाम की माला जलाने से आपका अपनी पार्टी में कुछ भला हो जाए, तो इसे भी मैं अपना उन पर एक और अहसान ही मानूँगा।”

यह बयान केवल एक कानूनी प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक गहन राजनीतिक संकेत भी है। यह राजस्थान की सियासत में पारिवारिक विरासत बनाम जनादेश, प्रतिशोध बनाम सेवा, और झूठे आरोप बनाम कानूनी न्याय की टकराहट को दर्शाता है। गजेंद्र सिंह शेखावत अब न केवल कोर्ट से बरी हो चुके हैं, बल्कि राजनीतिक मोर्चे पर भी अपने विरोधियों को सीधी चुनौती दे रहे हैं।

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