पूनम शर्मा
अमेरिका में भारतीय समुदाय को लेकर हाल के महीनों में जो घटनाएं सामने आई हैं, वे किसी एक-दो अलग-थलग मामलों का नतीजा नहीं हैं, बल्कि एक सुनियोजित पैटर्न की ओर इशारा करती हैं। भारतीयों के प्रति बढ़ती नफरत, सार्वजनिक स्थानों पर अपमानजनक टिप्पणियां, सोशल मीडिया पर संगठित कैंपेन और यहाँ तक कि शारीरिक हमले—ये सब एक बड़े राजनीतिक और आर्थिक खेल का हिस्सा लगते हैं।
पिछले कुछ दशकों से भारतीयों की छवि अमेरिका में मेहनती, शिक्षित, कानून का पालन करने वाले और सफल प्रवासियों की रही है। डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल, स्टार्टअप फाउंडर और कॉर्पोरेट लीडर—इन भूमिकाओं में भारतीयों ने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी अहम योगदान दिया। लेकिन अब वही छवि, एक सुनियोजित नैरेटिव के तहत, उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा रही है।
क्यों निशाने पर हैं भारतीय?
इस टारगेटिंग के तीन प्रमुख कारण साफ दिखाई देते हैं। पहला, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका की शर्तों के आगे न झुकना। हाल के वर्षों में भारत ने अपने आर्थिक और रणनीतिक फैसलों में स्वतंत्रता दिखाई है—चाहे वह रूस से ऊर्जा खरीदना हो या चीन के साथ व्यापारिक संतुलन रखना। अमेरिका चाहता है कि भारत उसकी टर्म्स पर समझौते करे, लेकिन मोदी सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। यह रुख ट्रंप जैसे नेताओं को नागवार गुजर रहा है।
दूसरा कारण आर्थिक है। भारतीयों का अमेरिका के वाइट-कालर सेक्टर में दबदबा बढ़ा है। मेहनत, दक्षता और ओवरटाइम की आदत ने उन्हें अमेरिकी कर्मचारियों से आगे खड़ा कर दिया है। वहीं, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के प्रवासी वहां ब्लू-कालर या लो-एंड सर्विस जॉब्स में सीमित हैं। भारतीय उच्च आय वाले, सुरक्षित जॉब्स पर काबिज हैं, जो अमेरिकी स्थानीय युवाओं के लिए ईर्ष्या और असुरक्षा का कारण बन रहे हैं।
तीसरा, अमेरिका और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की आंतरिक कमजोरी। बैंकिंग सेक्टर दबाव में है, मिडिल क्लास की बचतें घट रही हैं, महंगाई बढ़ रही है और क्रिप्टो में अस्थिर निवेश ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। जब भी पश्चिमी देशों पर आर्थिक संकट आता है, वहां का राजनीतिक तंत्र किसी ‘आउटसाइडर’ को दोषी ठहराने लगता है—जैसे अतीत में यहूदियों के साथ हुआ। आज वही भूमिका भारतीय निभा रहे हैं।
सोशल मीडिया से सड़कों तक
न्यू जर्सी जैसे इलाकों में भारतीय त्योहारों के जश्न के दौरान सार्वजनिक अपमान, गालियां और धमकियां अब सामान्य होती जा रही हैं। ऑनलाइन कैम्पेन चलाकर भारतीयों को ‘देश छोड़ो’ संदेश दिए जा रहे हैं। यहां तक कि भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स को टारगेट करने के लिए सोशल मीडिया पर संगठित ट्रोल आर्मी सक्रिय हो चुकी है।
ये हमले केवल व्यक्तिगत पूर्वाग्रह का नतीजा नहीं हैं, बल्कि ऊपर से मिले संकेतों और राजनीतिक माहौल का हिस्सा हैं। जब शीर्ष नेतृत्व खुलकर या परोक्ष रूप से किसी समुदाय को ‘खतरा’ बताता है, तो निचले स्तर पर यह नफरत और हिंसा में बदलना तय है।
भारत बनाम चीन – दोहरा मापदंड
अमेरिका की इस नीति में सबसे बड़ा पाखंड यह है कि चीन के प्रति उसका रवैया भारतीयों से बिल्कुल अलग है। चीन से अमेरिका का व्यापार जारी है, वहां से ऊर्जा और कच्चा माल खरीदा जा रहा है, और खुले मंचों पर कोई सख्त बयान नहीं दिया जाता। लेकिन भारत पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ, वीज़ा पॉलिसी और प्रवासी समुदाय को निशाना बनाने जैसी चालें चल रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि असली लक्ष्य आर्थिक और राजनीतिक दबाव बनाना है, न कि किसी नैतिक सिद्धांत का पालन।
क्या होना चाहिए भारतीयों का जवाब?
पहली ज़रूरत है जागरूकता की—भारतीय समुदाय को यह समझना होगा कि यह अस्थायी या ‘आइसोलेटेड’ घटनाएं नहीं हैं, बल्कि आने वाले समय में इनकी तीव्रता बढ़ सकती है। जो प्रवासी यह मानते हैं कि उनके पास ग्रीन कार्ड या नागरिकता होने से वे सुरक्षित हैं, उन्हें इतिहास के सबक याद रखने होंगे।
दूसरा, भारत में अवसरों की तलाश। यह बात सच है कि भारत में अब भी प्रदूषण, ट्रैफिक, भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियां हैं, लेकिन साथ ही निवेश, स्टार्टअप, खेल, मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में नए अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। मोदी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा निर्यात और अंतरराष्ट्रीय निवेश के मोर्चे पर जो माहौल बनाया है, वह आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर रोजगार और उद्यमिता के मौके पैदा कर सकता है।
तीसरा, सामूहिक दबाव। जैसे चीन के उत्पादों के बहिष्कार का अभियान गलवान के बाद भारत में चला था, वैसे ही अमेरिका की नीतियों के खिलाफ भी प्रवासी भारतीयों और भारतवासियों को एकजुट होकर आवाज उठानी होगी। यह केवल प्रवासियों की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और आर्थिक हितों का भी सवाल है।
निष्कर्ष
आज स्थिति यह है कि पश्चिमी राजनीति में भारतीयों को एक ‘राइजिंग पावर’ के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, और यही उनकी ताकत को निशाना बनाने का बहाना बन चुका है। यह समय भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का नहीं, बल्कि ठोस रणनीतिक फैसलों का है—चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर।
दुनिया में चाहे आप कहीं भी हों, आपकी असली पहचान भारतीय है। और जब किसी देश में यह पहचान आपके लिए खतरे का कारण बन जाए, तो विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने का समय आ चुका है। अमेरिका में बढ़ते हमले एक चेतावनी हैं—और इसे अनदेखा करना भविष्य में और महंगा पड़ सकता है।